फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गंगा के उद्गम में हरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी

Wed, 21 Sep 2016 09:05 PM IST
सुरेश भाई
विज्ञापन
सुरेश भाई - फोटो : amar ujala
विज्ञापन
नमामि गंगे के अंतर्गत गंगा की स्वच्छता और पारिस्थितिकी तंत्र के सुधार के लिए सरकार ने 30 हजार हैक्टेयर भूमि पर वनों के रोपण का लक्ष्य रखा है। दूसरी ओर गौर करेंगे, तो गंगा के उद्गम स्थल में गंगोत्री से हर्षिल के बीच देवदार के हजारों हरे पेड़ों की छंटाई करने के लिए शिनाख्त की गई है।
विज्ञापन


यह क्षेत्र अभी तक पिछले दिनों लगी भीषण आग से पूरी तरह नहीं उभर पाया हैं। धीरे-धीरे यहां की वनस्पतियां हरितिमा ओढ़कर सांस लेने लगी हैं। इसके बावजूद उनके ऊपर आरी-कुल्हाड़ी का वार करने की तैयारी चल रही है। यहां फैले 2300 वर्ग किमी क्षेत्र में गंगोत्री नेशनल पार्क भी है। 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के बाद चार हजार वर्ग किलोमीटर तक बढ़ाकर इसे इको सेंसटिव जोन के रूप में भी सरकार ने घोषित किया है। जिस इको सेंसटिव क्षेत्र में हरित क्षेत्र और कृषि क्षेत्र को बढ़ाने पर सरकार जोर दे रही है। वहां किसके इशारे पर वनों की शामत आई है? गंगा को निर्मल और अविरल रखने में वनों की महत्वपूर्ण भागीदारी है। इसके बावजूद पेड़ों के कटान पर रोक नहीं लग पा रही है।

इस क्षेत्र की शेष बची हुई जैवविविधता के बीच में एक पेड़ का कटान करना भी अति नुकसान देह होता है। पेड़ों के कटान और लुढकान से आग और भूस्खलन से प्रभावित यहां की नम धरती में भूमि कटाव की समस्या पैदा होती है। भूगर्भविदों ने बाढ़ और भूस्खलन के लिए अति संवेदनशील जोन चार और पांच के अंतर्गत इस इलाके को रेखांकित किया गया है। वैसे भी वर्ष 1977 से 2016 के बीच इस क्षेत्र में 30 बार से अधिक बाढ़ और भूकंप के हजारों झटके आ चुके हैं।वर्ष 1991 में आए भूकंप का केंद्र भी इसी क्षेत्र में था। यहां हर साल जंगलों में आग लगने से असंख्य पेड़ गिरते रहते हैं। जो बाढ़ के समय भागीरथी नदी में बहकर आते हैं। इन गिरे पड़े सूखे पेड़ों से अपेक्षित लाभ न मिलने के कारण ही हरे पेड़ों का कटान किया जाता है।
विज्ञापन


गौरतलब है कि बाढ़, भूस्खलन, भूकंप के लिए संवेदनशील होने पर भी गंगा के उद्गम में देहरादून और हरिद्धार के मानकों के बराबर ही मार्ग को चौड़ा करने की सरकार की योजना है। यह गंगोत्री नेशनल हाईवे के नाम पर ही है। ऐसी स्थिति में ग्लेशियर के मलबों के ऊपर खड़े पहाड़ों को थामने वाली वन संपदा के विनाश की तैयारी प्रतीत होती है। जिसके लिए असंख्य वन प्रजातियों के विदोहन की योजना हैं। वर्ष 1994-98 के बीच भी इस क्षेत्र में हजारों देवदार के हरे पेड़ों को काटा गया था। उस समय हर्षिल, मुखवा गांव की महिलाओं ने पेड़ों पर रक्षासूत्र बांध कर विरोध किया था। रक्षासूत्र आंदोलन की पहल पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने एक जांच टीम का गठन भी किया था, जिसके उपरांत दर्जनों वन कर्मी दोषी पाए गए थे।

गंगोत्री जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में वन्यजीवों की दुर्लभ प्रजातियां हैं। वनों के कटान के कारण वन्यजीवों का शिकार बहुत आसान हो जाता है। यहां के लोग यात्रा सीजन के छह माह तक ही गांव में रहते हैं। शेष सर्दी के महिनों में उत्तरकाशी, डूण्डा, मातली आदि स्थानों पर निवास करते हैं। ऐसी विषम परिस्थिति वाले क्षेत्रों में वनों का बेहिचक अंधाधुंध कटान को रोकना भी बहुत चुनौती पूर्ण हैं। देश में यह स्थिति केवल गंगा के उद्गम में ही नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, अरूणाचल, नगालैंड, असम, मिजोरम और मणिपुर आदि राज्यों के वनों की हजामत सड़कों के चौड़ीकरण, पर्यटन और जलविघुत आदि के लिए किया जा रहा है, जिस पर पुर्नविचार की आवश्यकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें