सरकार ने रेल बजट को आम बजट में समाहित करने का फैसला कर ही लिया। पिछले कुछ समय से इस पर बात चल रही थी। इस तरह हमारे यहां बयानबे वर्ष पुरानी एक परंपरा खत्म हो रही है। अंग्रेजों ने जिस समय अलग से रेल बजट का फैसला किया था, तब अपने देश में रेलवे का तेजी से प्रसार हो रहा था, और उसका बजट आम बजट से बड़ा होता था। एकवर्थ कमेटी की अनुशंसा पर वर्ष 1920-21 में अपने यहां रेलवे का पुनर्गठन हुआ, और इसके बजट को सरकार के आम बजट से अलग किया गया। यह परंपरा भारत के आजाद होने पर भी बरकरार रही। वस्तुतः 1951 तक रेल बजट आम बजट से बड़ा था। लेकिन धीरे-धीरे सरकार के कई उपक्रम मजबूत होते गए और आम बजट का आकार बड़ा होता गया। यह ठीक है कि रेल बजट का आकार अब बहुत छोटा होता है। इसके बावजूद रेल बजट का अपना महत्व तो था ही।
उसे आम बजट में समाहित कर देने का अर्थ है कि जैसे सालाना बजट में दूसरे क्षेत्रों में आवंटन होता है, वैसे ही अब रेलवे के लिए भी होगा। जबकि यह दौर रेलवे में कुछ सार्थक बदलाव का है। अगले कुछ वर्षों में रेलवे में पच्चीस-तीस लाख करोड़ रुपये के निवेश की बातें हो रही हैं। ऐसे में, और कुछ नहीं, तो कम से कम रेलवे की वित्तीय स्थिति पर तो पैनी नजर रखने की जरूरत है। रेलवे पर दो घंटे का बजट भाषण भले न हो, लेकिन सालाना दस मिनट का स्टेटमेंट तो हो। या नहीं, तो भारतीय रेल की स्थिति पर श्वेतपत्र लाए जाने का प्रावधान हो। लोगों को यह पता तो चलना चाहिए कि रेलवे की सेहत कैसी है।
यह सही है कि पिछले कुछ दशकों में रेल को लेकर राजनीति होती रही है। दशकों से रेल मंत्रालय के जरिये अपनी छवि चमकाने की कोशिश होती रही है। इसके जरिये अपने इलाके को ज्यादा से ज्यादा सौगात देने की प्रवृत्ति भी देखी गई है। रेल बजट को खत्म करने के पीछे यह एक वजह हो सकती है। इसके जरिये रेलवे को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने का संदेश दिया जा रहा हो, तो आश्चर्य नहीं। अलबत्ता जब आने वाले वर्षों में रेलवे की तस्वीर बदलने की गंभीर कोशिश हो रही है, तब इसे उपेक्षित करने का संदेश नहीं जाना चाहिए। कम से कम इसकी वित्तीय हालत पर नजर रखने की तो आवश्यकता है ही। इसी तरह सालाना नई ट्रेन न जलाए जाने के फैसले का भी समर्थन नहीं किया जा सकता।
देश भर में मीटरगेज पटरियों की जगह ब्रॉडगेज पटरियां बिछाई गई हैं। उनके लिए नई रेलगाड़ियां चाहिए। रेल पटरियों का विस्तार हो रहा है। जिन नए इलाके में पटरियां बिछाई गई हैं, वहां नई रेलगाड़ियों की जरूरत है। जिस अनुपात में रेल पटरियों का विस्तार होगा, उसी अनुपात में रेलगाड़ियां भी बढ़नी चाहिए। फिर रेल कोच फैक्टरियों में सालाना उत्पादन बढ़ रहा है। अगर नई रेलगाड़ियां नहीं चलाएंगे, तो फैक्टरियों से निकलकर आने वाले कोच का क्या होगा? इससे तो रेल कोच फैक्टरी का कामकाज हतोत्साहित ही होगा। नई ट्रेनों के संचालन से रेलवे की कमाई भी जुड़ी हुई है। नई ट्रेन न चलाने से रेलवे की आमदनी कम होगी।
पिछले दो वर्षों में सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं, जिनसे रेल सफर के महंगे होने का एहसास होता है। लेकिन जमीनी धरातल पर देखें, तो रेलवे की तस्वीर बदलने के लिए ये कदम जरूरी थे। ट्रेनों में साफ-सफाई बढ़ाने, ब्रांडेड भोजन की व्यवस्था करने और रेलयात्रियों के लिए दूसरी किस्म की सुविधाएं बढ़ाने को देश की बदलती स्थितियों से जोड़कर देखना होगा। देश में मध्यवर्ग का आकार निरंतर बढ़ रहा है। लोगों की आय बढ़ी है, और वे अपनी सहूलियत के लिए ज्यादा खर्च करने के लिए तैयार हैं। भारतीय रेल इस विराट मध्यवर्ग की उपेक्षा नहीं कर सकती। बेशक रेलवे का किराया बढ़ा है;न्यूनतम किराया भी बढ़ा दिया गया है। इससे ऐसा लगता है कि देश के गरीबों के लिए रेलवे का सफर महंगा हो गया है। लेकिन इस तथ्य को पूरी समग्रता में देखना चाहिए। ट्रेनों में न्यूनतम किराया अब पांच रुपये से बढ़ाकर दस रुपये कर दिया है।
सवाल है कि क्या सड़क मार्ग से इतनी दूरी पांच रुपये में संभव है। हकीकत यह है कि किराया बढ़ाने के बाद भी रेल से सफर करना बस से सफर करने की तुलना में सस्ता है। फिर किराये का बोझ हमेशा एसी में सफर करने वालों पर नहीं डाला जा सकता। इसका ध्यान रखना होता है कि एसी का किराया इतना भी न हो कि यात्री विमान से सफर करने का विकल्प चुनें। इससे तो रेलवे को ही घाटा होगा।
हां, इससे इन्कार नहीं कि रेलवे को उभरते मध्यवर्ग के साथ-साथ देश के आम लोगों का भी ख्याल रखना पड़ेगा। ब्रांडेड खाने के साथ-साथ जनता खाना और चालीस-पचास रुपये की थाली की गुणवत्ता और उपलब्धता पर भी नजर रखनी पड़ेगी। रेल के सफर में उभरते विराट मध्यवर्ग की सहूलियतों पर जितना ध्यान दिया जा रहा है, उतना ध्यान सामान्य यात्रियों पर भी देना होगा।
भारतीय रेल सिर्फ अमीरों की चिंता नहीं कर सकती। आम रेलयात्रियों की एक शिकायत सफर के दौरान पेयजल की अनुपलब्धता का है। अभी एक रिपोर्ट यह भी आई है कि रेलवे स्टेशनों पर उपलब्ध पेयजल दूषित है। पेयजल के मोर्चे पर होने वाली परेशानियां तुरंत दूर करने की जरूरत है। यात्रियों की सेहत के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। लेकिन रेलवे स्टेशनों पर या सफर के दौरान पानी की किल्लत को देश में पानी की स्थिति से जोड़कर भी देखना चाहिए। देश में भूजल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। जगह-जगह पेयजल के दूषित होने की शिकायतें आ रही हैं। रेलवे इससे अछूता कैसे रह सकता है? लेकिन रेलवे की छवि ऐसी भी नहीं बननी चाहिए कि वह सिर्फ अमीरों की चिंता करता है, आम यात्रियों की नहीं।