वह कल ही कह रहे थे, मैं तानाशाह नहीं हूं। जब खुद तानाशाह कह रहा हो कि वह तानाशाह नहीं है, तो मान लेने के सिवा चारा भी क्या है। यह तो तानाशाह की अति विनम्रता है। वरना आम तौर पर तानाशाह को यही बताने में मजा आता है कि वह कितना बड़ा तानाशाह है। मेरे पिता तो हर दिन नई-नई तानाशाही की खोज ही करते रहते थे। जिस दिन उन्हें पुरानी तानाशाही से काम चलाना पड़ जाता था, उस दिन सिर से पैर तक वह आम आदमी की तरह नजर आने लगते थे।
तानाशाह की पहली पहचान यही होती है कि वह होश-ओ-हवास में भी हंसता नहीं है। उसके चेहरे पर भाव स्थायी हो जाते हैं। वह दूसरे काम कब करता होगा, मुझे तो यही सोचकर घबराहट होने लगती है। अपने को चौबीस घंटे का तानाशाह बनाए रखना हंसी-खेल नहीं है। पूरा दम निकल जाता है! जरा-सी छूट दी नहीं कि गए काम से! लोग तो इंतजार में ही रहते हैं कि तानाशाह उनके जैसा मरघिल्ला हो जाए!
तानाशाह के मुंह पर अगर आप तानाशाह कह दो, तो वह और तानाशाही पर उतर आता है। वह टोह लेता रहता है कि उसकी इमेज कहीं बदल तो नहीं रही। तानाशाही में जरा-भी सेंध लगती देखता है, तो छवि सुधार में लग जाता है।
अकेले में तानाशाह क्या करते होंगे! जो काम दिन भर नहीं कर सके, वह करते होंगे या अगले दिन फिर से तानाशाह बनने का अभ्यास करते होंगे। आप लगातार खुश तो रह सकते हैं, पर हर समय तानाशाह बने रहने के लिए खटना पड़ता है, खुद को मारना पड़ता है।
कल्पना कीजिए कि आप खड़े हैं और कोई बच्चा आपको देखकर मुस्करा रहा है। फिर आप क्या करेंगे? मुस्कराएंगे ही न! बस, यही फर्क है! तानाशाह पूरी कोशिश करता है कि वह बच्चे के झांसे में न आए और अपनी बरसों से जमी-जमाई साख को कायम रखे। और जब कोई उसके मुंह पर सच कह दे, तो वह यह कहने से पीछे न हटे कि मैं तानाशाह नहीं हूं। ऐसा कवि देखा है, जो कविता लिखता हो और कहे कि मैं कवि नहीं हूं!