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और सिर्फ तितली- प्रदीप सौरभ

Sat, 28 Mar 2015 09:54 PM IST
अमिय बिंदु
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आधी दुनिया की बात उसके अधिकारों की तंग गलियों से गुजरते हुए अक्सर उसकी मुक्ति की ओर मुड़ जाती है। इस पर बात करते हुए अक्सर एकपक्षीय तरीके से करार दिया जाता रहा है कि उन्हें मुक्ति का अधिकार नहीं है। आधुनिक समय में भी इस बात पर तमाम तरह की चर्चाएं होती रहती हैं, नए-नए समाधान सुझाए जाते हैं, लेकिन यह प्रश्न अभी भी पुरुषवादी समाज के गले में अटका हुआ है। पुरुष समाज के इसी जटिल प्रश्न से रू-ब-रू होने का एक मौका मिला उपन्यासकार प्रदीप सौरभ को।
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उनके चौथे उपन्यास ‘और सिर्फ तितली’ में स्त्री-पुरुष संबंधों की विविधता और उसके ताने-बाने को प्रस्तुत किया गया है।  उपन्यास की नायिका है तान्या मैम। एक बेटी, बहन, प्रेमिका, सखी और शिक्षिका के विभिन्न रूपों में तान्या मैम को पेश किया गया है, लेकिन इन सबके बीच उपन्यास के कथानक में उनका मुख्य व्यक्तित्व शिक्षिका के रूप में उभरकर आता है। तान्या मैम के व्यक्तित्व के बीच पब्लिक स्कूलों के रूप में ऐसी खिड़की खुलती है कि उपन्यास का कथा विन्यास एक वृहत्तर वितान पा लेता है पब्लिक स्कूलों का दमघोंटू माहौल, उन्मुक्तता की ओर उन्मुख उनका स्वातंत्रय दर्शन और मनुष्य के चरित्र में आई गिरावट को निकालते हुए उपन्यास आधुनिक जीवन की विसंगतियों को उभारता चलता है।

उसमें कश्मीर के अलगाववाद और आतंकवाद की गंध और विभाजन के दौर की सड़ांध बच्चों की तोतली जुबान में मौजूद है। इतना ही नहीं प्राथमिक शिक्षा का पतन और अध्यापक- शिष्य के रिश्ते में आई गिरावट के साथ-साथ शिक्षा के मूल्यविहीन और संस्कारहीन होते जाने की कड़ियां भी धीरे-धीरे इसी खिड़की से होकर खुलती जाती हैं। एक्सपीरियएन्सल लर्निंग के नाम पर पब्लिक स्कूलों में चलने वाली पतित गतिविधियों से नायिका का सामना इस प्रकार होता है कि वह अपने आपको रोक नहीं पाती। यह उपन्यास पब्लिक स्कूलों की मैनेजमेंट द्वारा किए जाने वाली करतूतों और कारगुजारियों को भी उजागर करता है और इन सबके सम्मुख खड़ी तान्या मैम अपने को तितली की तरह बेबस पाती हैं जिसकी उड़ान इतनी सीमित होती है कि वह चाहते हुए भी आदमखोर चील को अपने भीतर समाए रह जाती है।
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इस उपन्यास में तान्या मैम की खोज भरी जिंदगी हमें यशपाल के नायिका प्रधान उपन्यास ‘दिव्या’ की भी याद दिलाती है। उपन्यास का कथानक आधुनिक जीवन की बहुत सी विसंगतियों की ओर इशारा करता है और बिना कोई समाधान दिए आगे बढ़ जाता है। समाधान को इतना महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता यदि कथा के विभिन्न आयाम इन विकृतियों को प्रश्नगत कर सकें। कथा की पृष्ठभूमि दिल्ली जैसे महानगर और बिहार से होकर पाठकों को सिंगापुर जैसे वैश्विक देशों तक की सैर करा लाती है। इस दौरान जीवन में आए बदलावों को भी लेखक रेखांकित करता चलता है। कथानक का सूत्रधार नायिका तान्या से इस कदर प्रभावित है कि वह पूरी कथा में उसे तान्या मैम ही संबोधित करता है। प्रदीप सौरभ गंभीर कथाकार हैं।

यह उनका चौथा उपन्यास है और उनके हर उपन्यास में किसी न किसी सामाजिक समस्या को गहरे से रेखांकित किया गया है। उपन्यास को एक ही बैठक में पढ़ा जा सकता है, लेकिन अंत तक पहुंचते हुए कुछ सवाल जेहन में गहराई तक जगह बना लेते हैं। मसलन क्या स्त्री मुक्ति का प्रश्न आधुनिक समाज के लिए भी अनसुलझा रह जाएगा? क्या अब कभी पब्लिक स्कूलों के शैक्षणिक तिलिस्म को तोड़कर नन्हे-मुन्नों का बचपन नहीं लौटाया जा सकेगा? पठनीयता के लिए यह उपन्यास हिंदी साहित्य में लंबे समय तक याद किया जाएगा।
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और सिर्फ तितली
प्रदीप सौरभ, वाणी प्रकाशन,
मूल्य-250 रुपये
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