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रुख और रणनीति दोनों बदले

Sun, 02 Apr 2017 09:13 AM IST
विभूति नारायण राय
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विभूति नारायण राय
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कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप मेहनत से गढ़ी अपनी छवि के खुद शिकार हो जाते हैं। कश्मीर में मोदी सरकार की नियति कुछ ऐसी ही लग रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान और शपथ लेने के फौरन बाद एक सख्त और गैर लचीला रुख रखने वाली छवि निर्मित करने की कोशिश की गई थी। पहले तो विश्व और खास तौर से दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में बड़ी भूमिका निभाने की महत्वाकांक्षा के तहत नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के दौरान इस इलाके के सभी राज्याध्यक्षों को न्योता गया, फिर ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं की गईं और अमेरिका, रूस, चीन तथा इस्राइल के साथ भारतीय संबंधों में आमूल-चूल परिवर्तन हुए। सरकार ने अपनी छवि कुछ-कुछ ऐसी गढ़ ली, जिससे यह आभास होने लगा कि भारत एक महाशक्ति बन गया है या काफी हद तक इस हैसियत के करीब पहुंच गया है। यही छवि कश्मीर के प्रकरण में मोदी सरकार के गले की फांस बन गई है।
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कार्यभार संभालते ही सरकार ने पाकिस्तान से संवाद का सिलसिला इस भ्रम के साथ शुरू किया कि अब उसकी बदली हैसियत से डर कर पाकिस्तान उसकी शर्तों पर बात करेगा। यह धारणा इस जमीनी यथार्थ के खिलाफ थी कि कोई भी पाकिस्तानी सरकार वहां की फौज, इस्लामी कट्टरपंथियों और वर्षों से कश्मीर को लेकर पाली-पोसी गई जन भावना के खिलाफ जाकर फैसला नहीं ले सकती। इसलिए पहली ही बैठक, जो दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच होनी थी, सिर्फ इस बिना पर स्थगित हो गई कि दिल्ली आने वाले पाकिस्तानी प्रतिनिधि मंडल के साथ हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं की बैठक प्रस्तावित थी। यहां यह भुला दिया गया कि पिछले कई दशकों से नई दिल्ली आने वाले किसी भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री/विदेश मंत्री अथवा वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं की बैठक एक सामान्य प्रक्रिया है। भारत की यह उम्मीद कि अब एक ‘मजबूत’  सरकार बन जाने के बाद यह औपचारिकता बदल जाएगी, सायास गढ़ी हुई उपरोक्त छवि का शिकार होना है। सिर्फ इसी अप्रिय वास्तविकता से बचने के लिए विभिन्न स्तरों की कई बैठकें भारत के बाहर करनी पड़ी।

कश्मीर के अंदर आज जो कुछ हो रहा है, उससे निपटने के लिए भी यह छवि काम नहीं आएगी। सख्त छवि गढ़ने के चक्कर में भारतीय सुरक्षा बल उस ट्रैप में फंस रहे हैं, जिसका बखूबी इस्तेमाल जिहादी-आतंकी दशकों से करते आए हैं। बडगाम में एक आतंकी के मरने के बाद पथराव करती उत्तेजित भीड़ पर गोलीबारी से तीन नागरिकों की मृत्यु की खबर पढ़ते हुए मुझे 1993-94 की घाटी याद आ रही थी, जब मैं भी इस लड़ाई का एक हिस्सा था। हमारे खिलाफ लड़ रहे आतंकियों की रणनीति का यह सामान्य-सा नियम था कि जब भी उनका कोई साथी मारा जाता, उनके समर्थक जनता को सड़कों पर निकाल लाते और उकसाने की वे सब कार्रवाइयां करते, जिससे सुरक्षाबलों को भीड़ पर फायरिंग करनी पड़ती। फिर कुछ लोग जख्मी होते या मरते और फिर अस्पताल या जनाजे में यही सब दोहराया जाता। सब कुछ एक दु:श्चक्र की तरह घटता। ऐसे में सुरक्षा बलों के सीनियर कमांडरों का सबसे बड़ा दायित्व अपनी फोर्स पर नियंत्रण रखना और उन्हें आतंकियों के खूबसूरती से बिछाए इस ट्रैप से बचाना होता था। दुष्कर तो था, पर नेतृत्व लगातार जवानों को नुकसान उठाकर भी धैर्य रखने के लिए प्रेरित करता रहता था। धैर्य खोने का मतलब दुश्मन की शर्तों पर लड़ना तथा फलस्वरूप सामान्य कश्मीरियों मंे भारत के लिए समर्थन और घटाना था।
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थल सेनाध्यक्ष विपिन रावत का हालिया बयान कि सेना पथराव करते नागरिक प्रदर्शनकारियों पर अधिकतम बल का प्रयोग करेगी, इसी छवि का कैदी बनने जैसा है। सेना की आम नागरिकों के साथ सख्ती अलगाववादियों को मजबूत ही करेगी। आज के हालात में 1993-94 के मुकाबले बुनियादी फर्क यह आया है कि सीमा पर बेहतर चौकसी के कारण घाटी में विदेशी जिहादी नाम मात्र के रह गए हैं – ज्यादातर सशत्र लड़ाके स्थानीय हैं। बुरहान वानी जैसे स्थानीय 'नायक' सीमा पार बैठे जिहादी कमांडरों को ज्यादा भाते हैं। सुरक्षा बलों की हर फायरिंग उन्हें उसी अंधे ट्रैप में ढकेल देती है, जिसका ऊपर जिक्र किया गया है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भले ही अभी पाकिस्तान के खिलाफ हैं, पर लंबे समय तक हम पाकिस्तान से अपनी शर्तों पर ही बात करने की जिद पर अड़े नहीं रह सकते और नागरिक प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग हमंे विश्व जनमत की निगाहों में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले राष्ट्रों की कतार में खड़ा कर देगा। पर इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले इस भ्रम से बाहर निकलें कि हम अचानक एक महाशक्ति बन गए हैं और अब सब कुछ हमारी शर्तों पर चलेगा। यह क्या कम है कि चीन समेत दुनिया की तमाम बड़ी ताकतें भारत-पाकिस्तान की सीधी बातचीत का समर्थन करती हैं और पाकिस्तान की मध्यस्थता करने की मांग ठुकराती रही हैं, पर यह कब तक चलेगा? विश्व बहुत दिनों तक दो परमाणु संपन्न पड़ोसियों के मध्य संवादहीनता नहीं स्वीकार करेगा।

यदि हम अपनी शर्तों पर बात करने पर अड़े रहे, तो कोई आश्चर्य नहीं कि कोई मध्यस्थ बिना हमारे मांगे अपनी सेवाएं देने के लिए आगे बढ़ आए। हमें पाकिस्तान से बातचीत शुरू करनी चाहिए और यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि उनका प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में हुर्रियत कांफ्रेंस से मुलाकात नहीं करेगा। यह काम तो भारत सरकार श्रीनगर से दिल्ली के बीच कहीं भी अपने कानूनों के तहत हुर्रियत नेताओं को गिरफ्तार करके कर सकती है। इसी तरह फौज को भी समझाना होगा कि अपने नागरिकों के साथ सख्ती करके हम जिहादियों की ही मदद कर रहे हैं। जरूरी है कि मोदी सरकार खुद की बनाई छवि पर यकीन करना बंद करे।   
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