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यहां शिमला से पीछे है मुंबई

Thu, 30 Mar 2017 06:55 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
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सुभाषिनी सहगल अली
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जब कभी कहीं घूमने जाती हूं, तो खूबसूरत इमारतों और प्राकृतिक सौंदर्य देखने से मन नहीं भरता। अब महिलाओं के लिए शौचालयों की खोज भी रहती है। अगर शौचालय दिख जाते हैं,  तो उनकी स्थिति का मुआयना भी जो जाता है। सफाई? पानी? बिजली? आसपास सुरक्षित वातावरण? यह सब इसलिए कि महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा शौच के लिए उचित व्यवस्था की उपलब्धता ने मन में घर कर लिया है। ग्रामीण इलाकों में बलात्कार, छेड़खानी, गालियों से अपमानित करने और बीमारी का बड़ा कारण है गरीब महिलाओं की वह मजबूरी, जो उन्हें शौच के लिए अंधेरे में घर से बाहर जाने के लिए मजबूर करती है।  केरल और त्रिपुरा जैसे कुछ ही राज्य हैं, जहां हर गांव के हर घर में शौचालय सीवर लाइन या गड्ढे से जुड़ा हुआ है। बाकी जगहों में, खासकर उत्तर भारत में, ऐसा कई वर्षों तक होने वाला नहीं है।
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शहरों में इस समस्या से निपटना आसान होना चाहिए, पर शहरों और कस्बों में महिलाओं की इस बुनियादी जरूरत को नजरंदाज किया गया है। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने हाल ही में अपने एक लेख में यह बात मानी है। उन्होंने मुंबई के शौचालयों की स्थिति पर छपी एक रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा है कि गरीब बस्तियों में शौचालयों की स्थिति इतनी जर्जर है कि उन्हें इस्तेमाल करना भी खतरनाक है। उन्होंने श्रीमती पिम्पले के साथ दो साल पहले घटी घटना का जिक्र किया। दो नाबालिग बच्चों की उस विधवा मां के पैरों के नीचे से शौचालय का पूरा फर्श ही खिसक गया और वह टंकी में गिरकर मर गई थीं। जबकि वह शौचालय तीन साल पुराना था। देबरॉय के अनुसार, मुंबई की बस्तियों में जर्जर शौचालयों के सुधार के तमाम दावे निरर्थक साबित हुए हैं।  वह कहते हैं कि ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ के पास बना सुलभ शौचालय इस हालत में है कि कोई महिला इसका इस्तेमाल नहीं कर सकती। मुंबई के अन्य सार्वजनिक स्थानों में भी महिलाओं के लिए शौचालय दुर्लभ ही हैं।

मुंबई की जब यह हालत है, तो देश के बाकी शहरों में शौचालयों की हालत की कल्पना की जा सकती है।  पर शिमला की तस्वीर कुछ अलग ही है! वहां की पहाड़ियों की तरह वहां के शौचालय भी लुभाने वाले हैं। पिछले पांच वर्षों से शिमला नगरपालिका के महापौर और उप महापौर के निर्देशन में; ये दोनों ही माकपा के हैं, बीस  नए शौचालय बने हैं और पहले से मौजूद 123 शौचालयों का नवीनीकरण हुआ है। नए शौचालयों में पांच ई-शौचालय भी हैं। शौचालयों की रोज सफाई होती है और वहां  बिजली और पानी का इंतजाम है। कभी-कभी पानी की कमी हो जाती है, लिहाजा एक टैंकर है। शिमला की कुल आबादी दो लाख है और रोज चालीस से पचास हजार पर्यटक इन शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं।  मेरे शहर कानपुर में, जिसकी आबादी पचास लाख है, कुल 350 सुलभ शौचालय हैं। इनकी हालत बहुत अच्छी नहीं है। यहां बिजली और पानी अक्सर नदारद रहता है।
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शिमला के महापौर और उप महापौर के काम ने औरों के लिए खतरा पैदा कर दिया है, इसलिए उन्हें जल्दी ही भूतपूर्व बनाने का इंतजाम कर दिया गया है। हिमाचल प्रदेश की विधानसभा में सत्ता पक्ष (कांग्रेस) और विपक्ष (भाजपा) ने कानून बदलकर इन पदों का चुनाव पार्षदों द्वारा कराने का फैसला ले लिया है। इसके बावजूद  शिमला के चमचमाते शौचालय उन दोनों की  ईमानदारी, निष्ठा और महिलाओं की बुनियादी जरूरतों के प्रति संवेदनशीलता का सबूत पेश करते रहेंगे।
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-माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य।
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