अटल जी की कुछ यादें हैं, जो कभी नहीं भूल पाऊंगी। इतने सालों बाद भी मुझे उनका वह शेर जुबानी याद है, जो उन्होंने रामलीला मैदान में उस जलसे में कहा था, जिसमें इमरजेंसी के बाद विपक्ष के वे सारे राजनेता उपस्थित थे, जो कुछ दिन पहले जेलों से रिहा हुए थे। जनवरी 1977 की ठंडी शाम थी। बारिश हो रही थी। जलसा देर रात तक चला। लोग थक गए थे लंबे-लंबे भाषण सुन-सुनकर, लेकिन गीले मैदान में बैठे रहे सिर्फ अटल जी के लिए। अटल जी ने अपना भाषण शुरू किया इन शब्दों से, बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने। कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने। खुली हवा में जरा सांस तो ले लें। कब तक रहेगी आजादी कौन जाने। इन दो पंक्तियों ने जलसे का सारा माहौल बदल डाला। लोग खड़े हो कर तालियां बजाने लगे और पहली बार ऐसा लगा कि इंदिरा गांधी आने वाला चुनाव हार सकती हैं।
कुछ दिनों बाद जब विपक्ष का अगला जलसा हुआ दिल्ली के बोट क्लब पर, तो इंदिरा गांधी इतना घबरा गईं कि उन्होंने मंच ही तुड़वा दिया था यह कहकर कि बोट क्लब पर पक्का मंच नहीं बन सकता। इस जलसे में जगजीवन राम थे, जो कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। इंदिराजी की बुआ विजयलक्ष्मी थीं, पर इस जलसे से भी याद हैं मुझे सिर्फ अटल जी के शब्द। टूटे हुए मंच की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा, ‘खंडहर बता रहा है, इमारत बुलंद थी।’ इन शब्दों को सुनते ही सभा में हंसी की लहर फैल गई, जैसे लोगों को यकीन होने लग गया कि आपातकाल का भय अब नहीं रहा है।
अगली याद है गालिब अकादमी के उस सम्मेलन की, जिसमें प्रसिद्ध शायर हफीज जलंधरी पाकिस्तान बनने के बाद पहली बार भारत आए थे। अटल जी उस समय विदेश मंत्री थे और उनको बतौर मुख्य अतिथि सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था। यहां भी उनके कुछ चंद शब्दों ने न सिर्फ माहौल बदल दिया बल्कि हफीज साहिब को रुला भी दिया। वह शब्द थे, हम एक थे, हम एक हैं। सियासत ने हमारे बीच दीवार खड़ी कर दी है। मैं नहीं मानता कि दीवार को गिराया जा सकता है, पर क्यों न एक दो ईंटें खिसका दी जाएं, ताक-झांक तो हो।
अटल जी दिल से चाहते थे पाकिस्तान के साथ अमन-शांति का रिश्ता कायम करना। सो जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने मौका मिलते ही लाहौर जाना तय कर लिया और वह भी सड़क के रास्ते। वाघा बॉर्डर से पाकिस्तान में दाखिल हुए उस सुनहरी बस में बैठकर, जिसके साथ शुरू हुई थी दिल्ली और लाहौर के बीच में बस सेवाएं।
लाहौर में उन्होंने पंजाब के गवर्नर निवास के बाग में ऐसा भाषण दिया, जिसको सुनकर वहां उपस्थित पाकिस्तानियों को यकीन हो गया कि भारत का यह राजनेता वास्तव में शांति लाना चाहता है। उनके भाषण के बाद एक बुजुर्ग व्यक्ति मुझे मिला, जिसने अपना परिचय यह कहते हुए दिया कि वह पाकिस्तान के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं और नम आंखों से मुझे बताया कि उन्होंने बहुत सारे राजनेताओं के बहुत सारे भाषण सुने हैं, लेकिन कभी ऐसा भाषण नहीं सुना, जिसने उनको इतना प्रभावित किया हो।
उस शाम मुझे कई पाकिस्तानी दोस्त मिले, जिन्होंने आशा व्यक्त की कि वह दिन दूर नहीं है, जब सीमाएं मिट जाएंगी। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ ने कारगिल युद्ध की तैयारियां वाजपेयी के इस दौरे के फौरन बाद, या शायद पहले ही, शुरू न कर दी होतीं, तो अटल जी की अमन-शांति लाने की कामना उनके कार्यकाल में पूरी हो गई होती। अटल जी की कई नीतियों की मैं आलोचक रही हूं, लेकिन उनकी विदेश नीति सही थी। काश, सफल भी रही होती।