इसके अलावा तमिलनाडु में 23 अप्रैल और असम व पुदुचेरी में नौ अप्रैल को मतदान होंगे। तमिलनाडु में, सत्ताधारी द्रमुक, अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन और फिल्म स्टार टी एन विजय की नई पार्टी टीवीके के बीच त्रिकोणीय मुकाबले में काफी मजबूत नजर आ रही है। भाजपा टीवीके को राजग में शामिल होने के लिए मनाकर चुनाव को दो-ध्रुवीय बनाना चाहती है, पर अब उसमें रुकावट आती दिख रही है। नतीजतन, सत्ता-विरोधी वोट बंटने की संभावना है, जिसका फायदा द्रमुक को मिलेगा। लेकिन, इसमें एक पेच है। द्रमुक और उसकी सहयोगी पार्टी कांग्रेस के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हैं। हालांकि, कांग्रेस वहां छोटी पार्टी है, फिर भी द्रमुक को इसका ध्यान रखना होगा कि इस तनाव का असर नतीजों पर न पड़े। दोनों पक्षों के बीच टकराव पड़ोसी पुदुचेरी में सबसे ज्यादा स्पष्ट दिखाई देता है, जहां वे सीटों के बंटवारे के फॉर्मूले पर सहमत नहीं हो पाए हैं, जबकि नामांकन 16 मार्च को ही शुरू हो गए थे। दूसरी ओर, ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस और भाजपा के सत्ताधारी राजग गठबंधन ने सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप दे दिया है और अब वह पूरी तरह से तैयार है।
असम में, भाजपा के चतुर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा अपने मुख्य विरोधी, कांग्रेस को एक-एक कर खत्म कर रहे हैं। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा कुछ हफ्ते पहले ही भाजपा में शामिल हुए थे। अब, राज्य से पार्टी के तीन सांसदों में से एक प्रद्युत बोरदोलोई ने भी कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है।
लेकिन, सबसे ज्यादा विवादित चुनाव पश्चिम बंगाल का है। यह चुनाव मतदाता सूची को लेकर बड़े पैमाने पर फैले भ्रम और अफरा-तफरी के बीच हो रहा है, क्योंकि चुनाव आयोग मतदाता सूची के विवादित ‘विशेष गहन संशोधन’ (एसआईआर) को जल्दी पूरा करने में जुटा है। इस पूरी प्रक्रिया में एक और उलझन तब पैदा हो गई, जब पश्चिम बंगाल के लिए विशेष रूप से ‘विचाराधीन’ नामक एक अलग श्रेणी बना दी गई। इस सूची में उन मतदाताओं के नाम शामिल हैं, जिनकी पात्रता को चुनाव आयोग ने संदिग्ध माना है; ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनके नाम की वर्तनी, उम्र आदि में कुछ छोटी-मोटी विसंगतियां पाई गई हैं। यह सूची भी बहुत विशाल है। इसमें पूरे 60 लाख नाम शामिल हैं।
राज्य का सियासी माहौल पूरी तरह से गरमाया हुआ है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने एसआईआर प्रक्रिया को लेकर जबर्दस्त हंगामा खड़ा कर दिया है, और उसे ‘बंगाल-विरोधी’ बताया है। इन चुनावों की सबसे खास बात कोलकाता की भवानीपुर सीट पर होने वाला मुकाबला है, जहां भाजपा ने ममता बनर्जी के पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी को उनके खिलाफ मैदान में उतारा है। अधिकारी को उनके खिलाफ मैदान में उतारकर, भाजपा को उम्मीद है कि वह उन्हें भवानीपुर में ही उलझाकर रखेगी, ताकि वह राज्य भर में चुनाव प्रचार न कर सकें। मोदी सरकार ने चुनाव की तारीखों की घोषणा से ठीक पहले, आर एन रवि को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाकर भेज दिया, ताकि राजभवन में उनका एक भरोसेमंद आदमी मौजूद रहे, जो चुनावों और उसके बाद के हालात पर नजर रख सके। इसके अलावा, चुनाव आयोग ने भी भाजपा की उस मांग को मान लिया, जिसमें उसने दो चरणों में चुनाव कराने की बात कही थी। जिस दिन चुनाव आयोग ने तारीखों का एलान किया, उसी दिन उसने राज्य के पांच शीर्ष अधिकारियों का तबादला कर दिया, जिन्हें ममता बनर्जी का करीबी माना जाता है; इनमें मुख्य सचिव भी शामिल थे। ममता बनर्जी ने लगातार दो चुनावों में भाजपा को शिकस्त दी है। क्या ‘बंगाल बंगालियों के लिए’ का उनका नारा उन्हें फिर से जीत दिलाने में मदद कर पाएगा?
केरल चुनाव कांग्रेस के लिए ‘करो या मरो’ जैसा है। यह ऐसा राज्य है, जहां हर पांच साल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ और सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाला एलडीएफ बारी-बारी से सत्ता में आते-जाते रहते हैं। हालांकि, 2021 में एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर इस परंपरा को तोड़ दिया था।
इस बार कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ी हैं, क्योंकि हाल ही में उसने एलडीएफ को हराकर पंचायत और नगर निकायों में जीत हासिल की। लेकिन जीत का अंतर बहुत कम था, और कांग्रेस ने स्थानीय चुनावों में इतनी निर्णायक जीत हासिल नहीं की थी कि वह विधानसभा चुनावों में अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो सके। एक राष्ट्रीय ताकत के रूप में कांग्रेस अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में 99 सीटें जीतकर चौंकाने वाला प्रदर्शन करने के बाद, उसकी किस्मत अचानक से पलट गई। 2024-2025 में हुए एक भी विधानसभा चुनाव में वह जीत हासिल नहीं कर पाई, और गठबंधन सहयोगी के तौर पर भी उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। असम में हाल ही में हुए इस्तीफे और ओडिशा एवं बिहार में अभी-अभी संपन्न हुए राज्यसभा चुनावों में अपने विधायकों को अपने साथ बनाए रखने में पार्टी की नाकामी उस गिरावट की ओर भी संकेत है, जो पार्टी को अपनी चपेट में ले रही है। राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए उसे केरल में जीत हासिल करने की सख्त जरूरत है।
विडंबना यह है कि केरल में इसे सबसे बड़ी चुनौती एलडीएफ से नहीं, बल्कि भाजपा से मिल रही है, जो राज्य में अपनी पैठ बनाने के लिए सुनियोजित ढंग से काम कर रही है। भाजपा पूरी लगन से ईसाई समुदाय को लुभाने की कोशिश कर रही है, जो अब तक कांग्रेस का वफादार रहा है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम में हाल ही में मिली जीत से भाजपा को जबर्दस्त बढ़ावा मिला है। केरल में भाजपा को कोई भी फायदा कांग्रेस की कीमत पर मिलेगा, और अनजाने में इसका लाभ एलडीएफ को ही मिलेगा। भाजपा को अपने वोटबैंक में सेंध लगाने से रोकने की कोशिशों के अलावा, कांग्रेस पार्टी तीन शीर्ष नेताओं के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही होड़ के बीच अपनी एकता बनाए रखने के लिए भी जूझ रही है। उसने सांसद शशि थरूर से मिली चुनौती को सफलतापूर्वक बेअसर कर दिया, लेकिन यह देखना अभी बाकी है कि क्या यह पार्टी को जिताने के लिए पर्याप्त होगा।