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असम विधानसभा चुनाव: मुद्दे उलझे पर भाजपा को बढ़त

संजय हजारिका Published by: संजय हजारिका Updated Wed, 10 Mar 2021 06:56 AM IST
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नरेंद्र मोदी-सर्बानंद सोनोवाल (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

अपने पिछले आलेख में मैंने बोडो क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) चुनाव की राजनीति के बारे में विस्तार से विचार किया था और यह भी बताया था कि क्यों मुख्यभूमि को परिधि से जोड़ने वाला यह इलाका और यहां की 13 विधानसभा सीटें असम और पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। अब असम के उस बड़े क्षेत्र पर नजर डालते हैं, जहां मुख्य लड़ाई लड़ी जाएगी। यहां कुछ तथ्यों का जिक्र करना जरूरी है। असम में तीन चरणों में 27 मार्च, एक अप्रैल और छह अप्रैल को विधानसभा चुनाव होने हैं। 2016 की तुलना में इस बार मतदान केंद्रों की संख्या में 35 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2016 के चुनाव में भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों की सरकार बनी थी। कोरोना महामारी के कारण मतदान की अवधि एक घंटे बढ़ाई गई है। दिलचस्प है कि 18 से 19 वर्ष आयु वर्ग के 6.46 लाख नए मतदाता इस बार वोट डालेंगे। हर पार्टी और गठबंधन उन्हें लुभाने की कोशिश करेगा, लेकिन वे किस तरह मतदान करते हैं और मतदान करने के लिए किस हद तक बाहर निकलते हैं, यह मतदान के दिन ही देखने को मिलेगा।



इस खेल में दो बड़े गठबंधन हैं-पहले गठबंधन में भाजपा, बोडो क्षेत्र में यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) और असम गण परिषद (अगप) शामिल हैं। यह यकीन करना मुश्किल है कि अगप 1980-90 के दशक में राज्य की सबसे प्रमुख पार्टी थी, जो अब भाजपा की पिछलग्गू बन गई है। असल में अगप का पारंपरिक वोट भाजपा में चला गया, जिसे अब व्यावसायिक समुदाय द्वारा समर्थित पार्टी नहीं माना जाता। इस प्रक्रिया में अगप ने न केवल जनसमर्थन खोया, बल्कि विश्वसनीयता भी, जो किसी राजनीतिक पार्टी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। दूसरा गठबंधन कांग्रेस और बोडो क्षेत्र में बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के बीच है, इसके अलावा कांग्रेस ने मशहूर इत्र व्यवसायी बदरुद्दीन अजमल की मजबूत पार्टी ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के साथ भी गठबंधन किया है। भाजपा वर्षों से जोर देकर कहती आ रही है कि एआईयूडीएफ और कांग्रेस अल्पसंख्यक मतों के सहारे दशकों से वोट बैंक की राजनीति करती आ रही है। हालांकि ऐसा नहीं है, क्योंकि अजमल की पार्टी में हिंदू सदस्य भी हैं। फिर भी यह गठबंधन इस बात की संभावना नहीं रखता कि चुनाव में किस तरह से अपनी पर्याप्त छाप छोड़ें। अजमल की पार्टी से उम्मीद है कि वह निचले असम में अपने पारंपरिक जनाधार वाले क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करेगी, जहां अल्पसंख्यकों की आबादी ज्यादा है, जबकि कांग्रेस भी इस क्षेत्र और कुछ अन्य क्षेत्रों में बढ़िया प्रदर्शन कर सकती है। एक बड़ी पार्टी के रूप में कांग्रेस के लिए यहां सबसे बड़ी समस्या है-करिश्माई चेहरे, संगठनात्मक दबदबे और वित्तीय संसाधनों का अभाव, ताकि वह या तो नरेंद्र मोदी या भाजपा के दो स्थानीय कद्दावर चेहरों-मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और शिक्षा व वित्तमंत्री हेमंत विस्व शर्मा की बराबरी कर सके।


दो नए क्षेत्रीय दलों-रायजोर दल और असम जाति परिषद द्वारा बहुत अधिक सेंध लगाने की संभावना नहीं है। रायजोर दल के प्रमुख नेता किसान आंदोलनकारी अखिल गोगोई हैं, जो पिछले वर्ष नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का विरोध करने के चलते ज्यादातर समय जेल में ही रहे। असम जाति परिषद छात्र समुदायों का दल है, जिसका नेतृत्व पूर्व युवा नेता कर रहे हैं, लेकिन भाजपा-विरोधी वोटों को बांटने के अलावा उनके ज्यादा असर डालने की संभावना नहीं है। ऊपरी असम में 47 सीटें दांव पर हैं, जहां भाजपा को बढ़त है। यह चाय उत्पादक क्षेत्र कभी कांग्रेस का अभेद्य गढ़ हुआ करता था, जिसका चाय बगान मजदूरों के वोटों पर नियंत्रण था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां भाजपा को शानदार जीत मिली और 2016 के चुनाव में भी यह जीत बरकरार रही। कई वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा चुपचाप चाय बगानों में ठोस काम करने से नतीजा बदल गया। असल में प्रधानमंत्री मोदी की चुनाव पूर्व ज्यादातर रैलियां इसी क्षेत्र में हुई हैं। बराक घाटी कभी कांग्रेस तो भाजपा की तरफ झुकती नजर आती है, लेकिन बांग्लाभाषी बहुसंख्यकों और पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं के चलते इस क्षेत्र का बंगला चरित्र भाजपा के प्रति सहानुभूति रखता है। असल में ब्रह्मपुत्र घाटी में जिस सीएए का कड़ा विरोध हुआ, बराक घाटी में उसे व्यापक समर्थन मिला। और यह तथ्य है कि कांग्रेस पार्टी खुद दो नावों पर सवार है, ब्रह्मपुत्र घाटी में जहां उसने सीएए का विरोध किया, वहीं बराक घाटी में वह चुप रही, क्योंकि वह जानती है कि यह सिर्फ भावना का मसला नहीं है, बल्कि शरणार्थियों द्वारा भोगी गई वास्तविकता पर आधारित है, जिसने उसके अपने अनुयायियों को भी प्रभावित किया।


फिर भी एक अनसुलझा मुद्दा है, जो कई लोगों के लिए महत्वपूर्ण, गुस्से, भ्रम और भ्रामक राजनीतिक बहस का कारण रहा है-नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी)। इस तथ्य के बावजूद कि असम के 19 लाख लोगों का नाम इस सूची में नहीं है, एनआरसी मात्र इसी राज्य का मुद्दा नहीं है। इस पर काफी विवाद चल रहे हैं और मामला शीर्ष अदालत में है और विरोधी दलों द्वारा आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। असल में इस समय यह निश्चित नहीं है कि मौजूदा एनआरसी का क्या होगा। वैसे भी इस मुद्दे के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं-पहला यह कि इस सूची में शामिल नहीं होने वाले अधिकांश लोग बांग्लाभाषी हिंदू हैं, मुस्लिम नहीं, जैसा कि इसे आगे बढ़ाने वालों ने सोचा था। दूसरा एनआरसी में शामिल होने से वंचित रहने वाले सभी लोग वोट देने के हकदार हैं। 


यह विरोधाभास नहीं, बल्कि एक सही अर्ध-न्यायिक, लेकिन पूरी तरह से सांविधानिक प्रक्रिया है, क्योंकि पिछले सीईसी ओपी रावत ने 2018 में ऐसा घोषित किया था।

फिलहाल आगामी चुनाव पर एनआरसी का असर स्पष्ट नहीं है। हालांकि यह स्पष्ट है कि अवैध प्रवासन / पुनर्वास का सवाल 1980 के बाद से राज्य के अधिकांश चुनावों में एक भावनात्मक कारक रहा है और अब भी है, भले ही लोग इससे ऊब चुके हैं, क्योंकि यह काफी जटिल और समाधान से दूर है। 


(-लेखक कॉमनवेल्थ ह्यूमैन राइट्स इनीशिएटिव के निदेशक हैं।)

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