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आवेदन ये प्रेम का

Sat, 07 Feb 2015 10:51 PM IST
अशोक `अंजुम'
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तुमने छेड़े प्रेम के, ऐसे तार हुजूर
बजते रहते हैं सदा, तन-मन में संतूर।
मधुमय बंधन बांधकर, कल लौटी बारात
हरी कांच की चूड़ियां, खनकी सारी रात।
आवेदन ये प्रेम का, प्रिये! किया स्वीकार
होंठों के हस्ताक्षर, बाकी हैं सरकार।
मिले होंठ से होंठ यूं, देह हुई झनकार
सहसा मिल जाएं कभी, बिजली के दो तार।
आमंत्रण देता रहा, प्रिया तुम्हारा गांव
सपनों में चलते रहे, रात-रात भर पांव।
प्रिये तुम्हारा गांव है, जादू का संसार
पलक झपकते बीततीं, सदियां कई हजार।
प्रिये तुम्हारे गांव की, अजब-निराली रीत
हवा छेड़ती प्रेम धुन, पत्थर गाते गीत।।
तोड़ सको तो तोड़ लो, तुम हमसे संबंध
अंग-अंग पर लिख दिए, हमने प्रेम संबंध।
कौन पहल पहले करे, चुप्पी तोड़े कौन
यूं बिस्तर की सलवटें, रहीं रात भर मौन।
धूल झाड़कर जब पढ़ीं, यादों जड़ी किताब
हर पन्ने पर मिल गए, सूखे हुए गुलाब।
खुशबू से मन भर गया, खिले याद के फूल
मैं तुम में गुम हो गया, तोड़े सभी उसूल।
रोम-रोम झंकृत करे, प्रिया तुम्हारी याद।
चलो अभी करते रहें, सपनों में संवाद।
सारे के सारे मिले, जो भेजे पैगाम
जब आईं हिचकियां, लिया आपका नाम।
कैसे लगे समाधि अब, कैसे कम हो भार
राग-रंग ले मेनका, खड़ी हृदय के द्वार।
कहना था हमको बहुत, शब्द हुए सब मौन
आंखों के संवाद को, देखें रोके कौन।
रात गई करवट लिए, हुई रसपगी भोर
खुली खिड़कियां, मन में उठीं हिलोर।
अरे वक्त! दे तो जरा, पल-भर को विश्राम
पगले लिखना है मुझे, पत्र प्रिया के नाम।
लोग लगे जब बांटने, पग-पग पर अंगार
मूरत निकला बर्फ की, तेरा-मेरा प्यार।
रथ के पीछे धूल थी, आंसू भीगे गाल
ख्वाबों में मिलते रहे, रेशम के रूमाल।
भोला देवर क्या करे, दौड़े सुबहो-शाम
छोटी भाभी मांगती, फिर-फिर खट्टे आम।
निभ पाता कैसे भला, तेरा-मेरा प्यार
तेरे-मेरे बीच थी `मैं' की इक दीवार।
आमंत्रण था आंख में, किंतु होंठ थे मौन
समय रुका किसके लिए, दोषी बोलो कौन।
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