रंगमंच एक ऑर्गेनिक (जैविक) कला है और किसी भी जीवित इकाई को आप किसी समय में आबद्ध या कैद करके नहीं रख सकते। समय निरंतर बदलती हुई स्थिति है, जिसमें पुनर्सृजन तो संभव है, लेकिन दोहराव संभव नहीं है। यही कारण है कि तमाम तकनीकी अविष्कारों और तथाकथित विकास के बावजूद भी रंगमंच हमारे जीवन में अपना एक अलग महत्व रखता है और उसका यह महत्व हमेशा रहेगा।
यह कुछ वैसी ही बात है जैसे कि आप किसी से फोन पर बात करें या फिर आमने-सामने बात करें। आप देखेंगे कि आमने-सामने की बातचीत में जो आनंद होता है वह फोन पर की गई बातचीत से संभव नहीं होता। आमने-सामने की बातचीत में बातचीत के विषय के अलावा आपको व्यक्ति के हाव-भाव के जरिए उस व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व भी संप्रेषित होता चलता है। यह संप्रेषण उस बातचीत को एक अलग संदर्भ देता है। जहां तक फेसबुक, यू-ट्यूब या फिर अन्य डिजिटल माध्यमों का सवाल है, वो हमें अवास्तविकता की तरफ ज्यादा धकेलते हैं। वास्तविक जीवन से काटकर एक वर्चुअल दुनिया रचते हैं। जिसमें सत्य का आभास तो फिर भी हो सकता है, लेकिन सत्य नहीं।
रंगमंच चूंकि ऑर्गेनिक कला है, इसलिए वह जीवन से संप्रेषित और हमारे समय और समाज की वास्तविकता से परिपोषित होती है। सिनेमा के अविष्कार के साथ ही रंगमंच की प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठने लगे थे। लेकिन हम देख रहे हैं कि सिनेमा रंगमंच को अपदस्थ नहीं कर पाया। इसी तरह से आज जो टीवी, इंटरनेट आदि जो माध्यम पैदा हुए हैं, वह सब रंगमंच को किसी न किसी रूप में प्रभावित तो कर रहे हैं और करेंगे।
उदाहरण के लिए हमारी दृश्यात्मक-संवेदना को या कि रंगमंच में समय और स्थान के ट्रीटमेंट को, लेकिन उसकी प्रासंगिकता को कोई आघात नहीं पहुंचा पाएगा। रंगमंच के आगे चुनौतियां बहुत हैं। आमतौर पर कहा जाता है कि रंगमंच के लिए अब दर्शक नहीं हैं। लेकिन मेरे अनुभवों ने इस बात को बार-बार गलत साबित किया है। मेरा मानना है कि दर्शक हैं, रंगमंच नहीं है। रंगमंच का चरित्र किसी भी दौर में व्यावसायिक नहीं रहा है। अब तो उसकी कोई संभावना भी नहीं है।
रंगमंच अपने मूल स्वरूप में एक सामाजिक कर्म है और समाज ही उसे पोषित करता रहा है और करेगा। हम जिस राज व्यवस्था में रह रहे हैं उसमें राज्य का दायित्व है कि जैसे वह अपने लोगों के स्वास्थ के प्रति, उनकी शिक्षा के प्रति उत्तरदायी है, इसी तरह कलाकर्म की संभावनाओं को भी वह पोषित पल्लवित करने में अपना योगदान दे। लेकिन अकेले सरकारी अनुदानों और सहायता पर ही निर्भर रहना उचित नहीं है। समाज में भी रंगमंच के प्रति सक्रियता एवं समझ पैदा करना जरूरी है। इसके लिए आवश्यक है कि रंगकर्मी अपने समाज और उसके सरोकारों से सीधा जुड़े और ऐसे नाटक खेले जाएं, जो जनता को न केवल सहज समझ में आएं बल्कि उन तक जन-जन की पहुंच आसान हो।
रंगमंच में जनभागीदारी के लिए आवश्यक है कि रंगमंच किसी एक क्षेत्र या स्थान तक सीमित न रहे और वह अपना चरित्र घुमंतू रंगमंच का बनाए। हमारे देश में यह संभव है। हमारे यहां के मौसम और हमारी परंपरा भी इसके लिए पूरी संभावना लिए हुए हंै। मेरा तो बहुत वर्षों से सपना रहा है और आज भी है कि एक मोबाइल थिएटर की स्थापना की जाए। दो ट्रकों और एक बस के सहारे हर छोटे बड़े शहर और कस्बों में जन-जन तक पहुंचे। जैसे कि पहले लोक रंगमंच की मंडलियां या आज भी सर्कस कंपनियां करती हैं। यह अवश्य संभव है, सिर्फ आवश्यकता है एक शुरुआती संबल की।