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थोड़ा समय तो दीजिए

Sun, 15 Mar 2015 08:22 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
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केंद्र की सत्ता में करीब दस महीने गुजार चुकी नरेंद्र मोदी की सरकार ने कई फैसले किए हैं, जो चौंकाने वाले हैं। इनमें से सबसे संवेदनशील फैसला वह था, जो जम्मू-कश्मीर में चुनावी नतीजा आने के लगभग दो महीने बाद विचार-विमर्श के पश्चात लिया गया। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का भाजपा का फैसला आसान नहीं था, क्योंकि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं, और कई मुद्दों पर आंख से आंख मिलाकर बात नहीं करते। यही वजह है कि सरकार गठन के बाद समर्थकों ने जहां इसके भविष्य पर संशय जताया, वहीं विरोधियों ने इसे एक अवसरवादी फैसला कहा। पर ऐतिहासिक शपथ ग्रहण समारोह के करीब दो सप्ताह बाद स्थिति कैसी है?
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इस प्रश्न का जवाब पूरे मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की मांग करता है। सच यह है कि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा की सरकार बनने के साथ कम से कम तीन मुद्दे पुनर्परिभाषित हुए। एक तो यही कि पीडीपी के साथ सरकार बनाने का भाजपा का फैसला जम्मू-कश्मीर में उसकी अब तक की नीति से विचलन, और जनसंघ की सोच से पीछे हटने का भी सुबूत है।

यह याद करने लायक है कि 1953 में एक अभियान का नेतृत्व करते हुए जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की वहां पुलिस हिरासत में मृत्यु हुई थी। उसके बाद से यह नारा, जहां हुए बलिदान मुखर्जी; वह कश्मीर हमारा है, भाजपा और उसके सदस्यों की राजनीतिक सोच को प्रतिबिंबित करता है। मृत्यु से पहले, जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह भारत का हिस्सा बनाने के अपने राजनीतिक अभियान में मुखर्जी ने यह कहा था, एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।
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विगत एक मार्च को राज्य में जब पीडीपी और भाजपा सरकार के मंत्री शपथ ले रहे थे, तो वहां दो झंडे देखे जा सकते थे। यह विवाद फिर सामने आया, जब मुफ्ती सरकार ने झंडे के मुद्दे पर एक सर्कुलर जारी किया, हालांकि बाद में इसे वापस लेकर उसने विवाद खत्म भी कर दिया। इसके बावजूद यह गौरतलब है कि 1952 के दिल्ली समझौते के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर का अपना झंडा है। इस सच्चाई को स्वीकार कर भाजपा ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि समय के साथ वह बदल चुकी है।

इससे जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण घटनाक्रम खुद नरेंद्र मोदी से संबंधित है। यह साफ है कि जम्मू-कश्मीर के मामले में खुद मोदी अपनी विगत सोच से पूरी तरह पलट चुके हैं। यह याद करना प्रासंगिक है कि जनवरी, 1992 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के श्रीनगर के लाल चौक अभियान में नरेंद्र मोदी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। तब पार्टी ने आतंकवादियों की धमकियों की अनदेखी कर लाल चौक में तिरंगा फहराया था।

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के अभियान के दौरान भी मोदी ने मिशन 44+ पर जोर देते हुए कहा था कि राज्य में एक हिंदू मुख्यमंत्री समय की मांग है। आलोचना के बावजूद भाजपा ने ध्रुवीकरण पर जोर दिया, जिसका उसे लाभ भी मिला। पर सरकार में शामिल होने के लिए भाजपा ने लचीलेपन का परिचय दिया। यहां तक कि मुख्यमंत्री पद बारी-बारी से लेने की शर्त के बारे में भी पीडीपी से उसकी कोई बातचीत नहीं हुई।

गठबंधन सरकार का तीसरा घटनाक्रम पीडीपी का बहुत जल्दी अपने मूल मुद्दों पर लौट आना है। यह समझने की जरूरत है कि घाटी के मतदाताओं ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए पीडीपी को वोट दिया था। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पीडीपी को भाजपा के खिलाफ रुझान का ही फायदा मिला है। आखिर कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस को भी सीटें मिली हैं। लेकिन यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि जम्मू में वोटिंग कश्मीर-विरोध, और कश्मीर में जम्मू-विरोध की लाइन पर हुई।

चूंकि पीडीपी और भाजपा ही वहां पहली और दूसरी नंबर की पार्टी के तौर पर उभरीं, ऐसे में या तो ये दोनों सरकार बनाने के बारे में सोचतीं, जैसा कि उन्होंने किया, या सरकार न बनाकर सूबे को राज्यपाल शासन के अधीन जाने देतीं। हालांकि भाजपा विरोध के नाम पर पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस मिलकर सरकार बनाने की दिशा में सोच सकती थीं, लेकिन वह जम्मू के मनोभाव की उपेक्षा होती, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर ध्रुवीकरण को ही बल मिलता।

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन को न सिर्फ इस परिदृश्य में देखना चाहिए, बल्कि टेलीविजन के ब्रेकिंग न्यूज में दोनों के बीच तनाव को जिस तरह बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की कोशिश हो रही है, उससे भी बचना चाहिए। सरकार गठन के बहाने दोनों पार्टियों ने अपनी अतिवादी सोच से बाहर निकलकर उदारता का परिचय दिया है, तो यह केवल सूबे के लिए नहीं, पूरे देश के लिए स्वागतयोग्य है। इससे पीडीपी जहां खुद को राजनीति की मुख्यधारा के करीब ले आई है, वहीं भाजपा की सोच में आया बदलाव मोदी को इतिहास में जगह दिला सकता है। जाहिर है, ध्रुवीकरण की कोशिश से विकास का मोदी का सपना पूरा नहीं हो सकता।

यह तथ्य है कि इस गठबंधन सरकार के प्रति संघ के पूर्वाग्रह हैं। उसने अनुच्छेद 370 पर समझौते के प्रति अपनी अनिच्छा तो जताई ही है, वहां उकसावे वाले एकाध हालिया घटनाक्रमों ने भी उसकी चिंता बढ़ाई है। पर संघ यह देख पा रहा है कि मोदी ने जम्मू-कश्मीर में एक स्पष्ट लाइन ली है, और हड़बड़ी में नतीजा निकालने के बजाय गठबंधन की दोनों पार्टियों को थोड़ा समय देने की बात भी कही है। इसके बावजूद यह सरकार कोई फूलों की सेज नहीं है, क्योंकि न सिर्फ दोनों पार्टियां अलग-अलग क्षेत्रों से हैं, बल्कि वहां समुदायों के बीच द्वेष का भी पुराना इतिहास है। इस कारण दोनों समय-समय पर एक दूसरे को कमजोर कर अपनी मांग मनवाने की कोशिश कर सकती हैं।

सच तो यह है कि जम्मू-कश्मीर एक राजनीतिक समाधान मांगता है, जो वहां के सभी दावेदारों के साथ संवाद के बगैर संभव नहीं है। ऐसे में, आने वाले महीनों में पीडीपी और भाजपा को बेहद परिपक्वता का परिचय देना होगा। लोगों को भी न सिर्फ धैर्य रखना होगा, बल्कि छोटे-छोटे मुद्दों पर उत्तेजित होने से भी बचना होगा।
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