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शब्दों पर संस्कृति का सफर

Mon, 18 Feb 2013 03:46 PM IST
ताहर बिन जेलन
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मैंने यहां के प्रतिष्ठित फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे की फ्रांस में उपलब्ध सारी फिल्में देखी हैं और साथ ही किताबों के मामले में मैंने अरूंधती रॉय, सलमान रूश्दी और हनीफ कोईराची को भी अच्छी तरह पढ़ा है। हालांकि इन लेखकों को विशुद्ध रूप से भारतीय नहीं कहा जा सकता है, पर इनकी लेखनी में भारतीयता की छाप स्पष्ट रूप से नजर आती है। इनकी किताबों में भारतीय मिट्टी और समाज की खुशबू महसूस की जा सकती है।
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यही हाल हनीफ के साथ भी है, जिनकी लेखनी में भारतीय समाज झलकता है, यद्यपि वह पाकिस्तानी लेखक हैं। इस पुस्तक मेले से कई संदेश मिले और सबसे बड़ा संदेश यह प्रचारित हुआ कि किताबें जरूरी होने के साथ-साथ संरक्षणीय भी हैं। मेले में युवाओं की भीड़ देखकर यह भी पता चला कि आज की युवा पीढ़ी ने किताबों का साथ नहीं छोड़ा है। और ऐसे आयोजन से उनका मनोबल भी बढ़ता है।

यह भी एक वजह रही कि मैं दिल्ली में आयोजित हुए इस पुस्तक मेले में शिरकत करने उत्साहपूर्वक आया। दिल्ली और पेरिस की संस्कृति में मुझे कई तरह की समानताएं दिखीं। किताबों के बाजार की बात की जाए, तो इनके लिए भारत एक बड़ा देश है, जहां फ्रेंच भाषा में लिखी किताबों का भी बड़ा बाजार उपलब्ध हो सकता है, बशर्ते लोगों को उनकी भाषा में उनकी पसंद की किताबें पढ़ने को मिले। जिसके लिए सबसे बड़ा माध्यम बनेगा, भारत और फ्रांस के बीच होने वाला साहित्यिक आदान-प्रदान। इससे दोनों देशों का विश्व साहित्य की बिरादरी में खास स्थान बनता है।
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भारतीय भी साहित्य पढ़ने में रुचि रखते हैं, पर पता नहीं वे फ्रेंच साहित्य क्यों नहीं पढ़ना चाहते? पर अगर हिंदी और उर्दू में फ्रेंच किताबों का अनुवाद किया जाए, तो भारतीय पाठक और फ्रांसीसी पुस्तकों के बीच की दूरी कम जरूर हो जाएगी। बात करें पुस्तकों के प्रकाशन की, तो फ्रांस में आज भी पब्लिशिंग हाउस नये मानक स्थापित कर रहा है। वहां छपी किताबों की प्रिंटिंग देखने लायक होती है। यही नहीं छपकर आने वाली किताबों की खूबसूरती देखते ही बनती है। हालांकि भारत में भी किताबों का कलेवर एवं कवर मनमोहक है। पर सच तो यह है कि मुझे भारत के प्रकाशन व्यवसाय के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

हालांकि मैं यह जानता हूं कि फ्रांसीसी भाषा की कई किताबों का अनुवाद होता है। ऐसे में मैं यह उम्मीद करता हूं कि इस पुस्तक मेला के बाद फ्रांसीसी साहित्य की ओर भारतीय प्रकाशकों का भी रुझान बढ़ सकता है, जो हमारे लिए खुशी का क्षण होगा। इसका कारण यह है कि मैं खुद भी महसूस करता हूं कि फ्रांसीसी साहित्य दुनिया भर में फैला हुआ है।

हर देश में लेखक अपने-अपने तरीके से साहित्य के बारे में सोचता है और कहीं-कहीं पर इसे जीवन का आधार भी माना जाता है। पर फ्रांस में कुछ ही लेखक ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने लेखन को अपने जीवन यापन का आधार बनाया है, जबकि अिधकांश लेखक ऐसे हैं, जो किताबें लिखने के अलावा दो जून की रोटी जुटाने के लिए दूसरा व्यवसाय भी  करते हैं। हालांकि इस मामले में मैं बेहद भाग्यशाली रहा हूं कि जब मुझे वर्ष 1987 में गॉनकोर्ट पुरस्कार मिला है, तब से मेरे जीवन का आधार लेखन ही है। मैं अब केवल एक लेखक हूं।
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