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अब न वसंत है न पलाश

Mon, 18 Feb 2013 03:39 PM IST
अशोक वाजपेयी
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लगभग पचपन बरस पहले एक कविता लिखी थी:
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‘वसंत दिन’
आज का दिन पूरा का पूरा एक वसंत है
कल पत्ते नहीं थे और कल मर चुके होंगे,
आज का दिन पूरा का पूरा एक वसंत है
और तुम एक वृक्ष हो,
अपनी हर उग सकने वाली पत्ती के
और अपने हर खिल सकने वाले फूल के साथ
और सिर्फ इतनी झुकी हुई
कि मैं उठ कर छू ले सकता हूं।

कविता में कितना वसंत और कितना प्रेम है यह अलगाना मुश्किल है सिवाय यह याद करने के कि उस युवावस्था में कई बार प्रेम और वसंत पर्यायवाची हो जाते थे। सागर एक छोटा शहर था, जहां हम रहते थे। वहां प्रकृति और शहर के बीच वैसी दूरी न थी जैसी कि दिल्ली में हैं, जहां हम अब रहते हैं। यहां की दौड़-भाग में कुल दो मौसम ही होते लगते हैं, गर्मियां और जाड़े। कम गर्मी, ज्यादा गर्मी या फिर कम ठंड और ज्यादा ठंड। गर्मियां ज्यादा लंबी। बीच में कभी कभी वसंत भी आता ही होगा पर अधिकतर अलक्षित ही जाता है।

कम से कम हमारे महानगरों में मानों छह ऋतुओं का होना बंद सा हो गया है। वसंत पंचमी नाम का त्योहार न आए तो यह तो पता ही न चले कि वसंत आ गया। साहित्य में भी, कम से कम इधर लिखे जा रहे साहित्य में वसंत की न कोई छवि है न ही कोई रूपक बाकी बचा है। यह कहना बहुत अनुचित न होगा कि अब के साहित्य में वसंत नहीं आता। हम वसंतहीन साहित्य रच रहे हैं। यह आकस्मिक नहीं है।
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वसंत अब अधिक से अधिक स्मृति है। पिछले साहित्य की दब सी रही अनुगूंज। उससे जिस उल्लास और आनंद का संबंध था वे भी अब रोजमर्रा की जिंदगी की आपाधापी और मारकाट में गायब हो चुके हैं। साहित्य में फूलों-पत्तियों और पक्षियों को देखकर मुदित होने का अवसर ही नहीं है।

हमारी जो भी सच्चाई है, वह कितनी हमारी और कितनी दूसरों द्वारा रची-थोपी सच्चाई है इसमें हम फिलवक्त न भी जाएं, उसमें वसंत, उल्लास और किसी तरह की रसमयता की जगह नहीं बची है। तर्क यह है कि हमारे हिस्से और आस-पास इतना दुख/तकलीफ/हिंसा/अन्याय/अत्याचार आदि है कि उनके रहते वसंत आदि से अभिभूत होने का मतलब व्यर्थ का चोचला संवेदनहीन ऐश्वर्य आदि है।
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सागर में वसंत के आसपास पलाश में फूल आते थे, जो आगे चलकर अधिक उग्र रक्तिम और प्रफुल्ल हो जाते थे। वे वसंत के अग्रदूत होते थे। दिल्ली में न वसंत, न पलाश। पर आप दिल्ली में हैं तो गंगूबाई हंगल या उल्लास कशालकर का गाया राग वसंत सुनकर संतोष कर सकते हैं कि आपने वसंत को किसी तरह अपने को छूने दिया। उससे अधिक वसंत अब न आप के हिस्से है न आपके भाग्य में। शमशेर बहादुर सिंह कह चुके हैं-‘जो नहीं है उसका गम क्या वह नहीं है।’
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