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इस चक्रव्यूह को कौन तोड़ेगा

Tue, 30 Oct 2012 08:48 PM IST
सुदीप ठाकुर
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बात आठ दिसंबर 1998 की है। दिग्विजय सिंह लगातार दूसरी बार मध्य प्रदेश (अविभाजित) के मुख्यमंत्री बने थे। अपनी दूसरी पारी की शुरुआत उन्होंने बस्तर के मावलीभाठा गांव में एक आदिवासी सम्मेलन से की थी। इस गांव तक वह हेलीकॉप्टर से पहुंचे थे, जिसमें डॉ ब्रह्मदेव शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता बन चुके पूर्व मुख्य सचिव शरतचंद्र बेहार उनके सहयात्री थे। बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से 40 किमी दूर यह गांव 1992 में उस वक्त चर्चा में आया था, जब वहां एक निजी इस्पात संयंत्र का शिलान्यास किया गया था और इसके विरोध के कारण सत्तारूढ़ भाजपा के कार्यकर्ताओं ने ब्रह्मदेव शर्मा को लगभग निर्वस्त्र कर दिया था।
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नक्सलियों को अपना 'बिगड़ा बेटा' बताने वाले ब्रह्मदेव शर्मा ने इसी गांव से नाटे ना राज (गांव का राज) आंदोलन की अगुआई की थी। इस सम्मेलन में दिग्विजय सिंह ने ग्राम स्वराज की वकालत की और कहा था कि गांव वालों की मरजी के बगैर कोई फैसला नहीं किया जाएगा। तब मैंने वहां आए एक आदिवासी विधायक से यों ही बात करते हुए विकास और नेतृत्व पर कुछ सवाल किए थे। उनका जवाब था, सिर्फ सड़क, बिजली और लोहे का कारखाना यदि विकास का पैमाना है, तो मुझे कुछ नहीं कहना है। मुद्दा उनकी चेतना का है, क्या उसका विकास हो रहा है। मुद्दा विकास में आदिवासियों की हिस्सेदारी का है और उससे भी जरूरी निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी का है।  

डेढ़ दशक बाद हम देख सकते हैं कि विकास और नेतृत्व के सवाल पर आदिवासियों की क्या स्थिति है। उस सम्मेलन के बाद केंद्र और राज्य, दोनों जगह भाजपा और कांग्रेस, दोनों की ही सरकारें बन चुकी हैं, मगर आदिवासी क्षेत्रों के पिछड़ेपन में कोई अंतर नहीं आया है। बल्कि इस स्थिति का माओवादियों ने जमकर फायदा ही उठाया है। प्रकाश झा की रिसर्च टीम ने पता नहीं, कभी बस्तर का रुख किया या नहीं, पर यदि वह वहां जाती, तो उसे पता चलता कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में आदिवासियों की भागीदारी और नेतृत्व में उनकी हिस्सेदारी कितना बड़ा मुद्दा है। कोई भी राजनीतिक दल ईमानदारी से आदिवासियों के साथ इसमें साझा नहीं करना चाहता।
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छत्तीसगढ़ में 'आदिवासी एक्सप्रेस' के नाम से जब तब आदिवासी विधायक एकजुट होते रहे हैं, मगर कभी वे अपने दलों के खिलाफ बगावत नहीं कर सके हैं। राष्ट्रपति पद के चुनाव में पी ए संगमा की दावेदारी को भले ही गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन उनके साथ जितने भी आदिवासी सांसद या विधायक नजर आ रहे थे, उसके पीछे उपेक्षा से उपजी उनकी पीड़ा भी रही है। यही नहीं, माओवादी भी भोले-भाले आदिवासियों को अपना कैडर तो बनाना चाहते हैं, लेकिन उनके भी शीर्ष नेतृत्व में आदिवासियों के लिए जगह नहीं है। सस्ती वरदी और प्लास्टिक के जूते पहना आदिवासी रंगरूट कभी जान ही नहीं पाता कि उसके आकाओं के पास धन आ कहां से रहा है।

इसके पीछे कॉरपोरेट जगत की मिलीभगत तो नहीं है, जिसे किसी भी कीमत पर उसकी जमीन चाहिए? कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि आदिवासी जिस हाल में हैं, वह सत्ता के नियामकों और कॉरपोरेट के साथ माओवादियों के लिए भी सुविधाजनक है। यह ऐसा चक्रव्यूह है, जिसे प्रकाश झा अपनी बहुचर्चित फिल्म में नहीं तोड़ पाए हैं। प्रकाश झा की चक्रव्यूह में आप नक्सल रणनीतिकार कोबाड गांधी की गिरफ्तारी, नंदीग्राम और सिंगूर में हुए टाटा की नैनो कार फैक्टरी और विशेष आर्थिक क्षेत्र के खिलाफ कोटेश्वर राव की अगुआई में माओवादियों के आंदोलन, दंतेवाड़ा में हुए भीषण नरसंहार, जिसमें 76 जवान मारे गए थे और दंतेवाड़ा और जगदलपुर के आसपास टाटा और एस्सार के संयंत्रों के लिए जमीन अधिग्रहण या ओडिशा में आदिवासियों द्वारा वेदांता समूह के विरोध से संबंधित घटनाओं को देख सकते हैं। चक्रव्यूह पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान नक्सल प्रभावित इलाकों में हुई कुछ इन्हीं अति चर्चित घटनाओं का कोलाज बनकर रह गई है, जिस पर मल्टीप्लेक्स में बैठा दर्शक ताली तो पीट सकता है, मगर वह किसी तरह के विमर्श का हिस्सा नहीं बन सकता।
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