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किसकी चादर में दाग नहीं

Mon, 29 Oct 2012 11:35 AM IST
सीताराम येचुरी
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दशहरे के दिन बुराई के रावण को जलाए हुए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, लेकिन एक विडंबना छिपाए नहीं छिप रही। यह विडंबना आज की सचाइयों में निहित है। रावण के तो दस ही सिर थे, भ्रष्टाचार के रावण के असंख्य सिर हैं, और आए दिन नए-नए सिर उग रहे हैं। रावण के अंत के रूप में बुराई पर अच्छाई की जैसी जीत हुई थी, हमारी वर्तमान व्यवस्था से भ्रष्टाचार का अंत करने की लड़ाई में ऐसी जीत की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती।
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इसके विपरीत दरबारी पूंजीवाद जबर्दस्त तरीके से फूल-फूल रहा है और तरह-तरह के ऐसे जहरीले फल दे रहा है, जो देश-समाज में अमीरी-गरीबी की खाई को लगातार चौड़ा कर रहा है। कांग्रेस और भाजपा, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में जुटी हुई हैं।

लेकिन ये दोनों ही पार्टियां नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था और तथाकथित आर्थिक सुधारों के उस ढांचे को खड़ा करने के लिए जिम्मेदार हैं, जिसने भ्रष्टाचार और घोटालों को नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है। इस नव-उदारवादी रास्ते के चलते ही देश में दरबारी पूंजीवाद की फसल खड़ी हो गई है।
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करोड़ों की लूट बदस्तूर जारी है। पिछले तीन साल में ही 2-जी स्पेक्ट्रम, कोयला खदान आवंटन, राष्ट्रमंडल खेल, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी आदि दर्जनों घोटाले सामने आए हैं। ऐसे में रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े नए खुलासे भी उतना नहीं चौंकाते। मौजूदा सरकार बेशक कठघरे में है और इनमें से अनेक घोटालों के उसे जवाब देने हैं।

लेकिन यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि इनमें से कई घोटालों की शुरुआत तो राजग के समय में ही हो चुकी थी। अनेक घोटाले तो ऐसे हैं, जिनकी पूरी जांच ही अभी तक नहीं हो पाई है, ऐसे में दोषियों पर मामला चलने तथा उन्हें सजा दिलाए जाने का सवाल ही कहां उठता है।

वैसे भी दोषियों को सजा दिलाने के मामले में हमारा रिकॉर्ड दयनीय है। अपने यहां जिन इक्का-दुक्का शीर्ष नेताओं को भ्रष्टाचार के लिए सजा दिलाई जा सकी है, उनमें से एक महत्वपूर्ण नाम भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का है। भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी भी अब आरोपों के घेरे में हैं। जहां कांग्रेस गडकरी पर हमलावर है, वहीं भाजपा अपने अध्यक्ष को बेगुनाह साबित करने पर तुली हुई है।

उसका कहना है कि उसके अध्यक्ष किसी भी जांच के लिए तैयार हैं, बशर्ते वह स्वतंत्र तथा निष्पक्ष हो। भाजपा कर्नाटक में घोटाले के लिए पहले ही कठघरे में थी। इनमें अन्य चीजों के अलावा देश के प्राकृतिक संसाधनों के अवैध खनन का घोटाला भी शामिल है। इन्हीं आरोपों के चलते उसके मुख्यमंत्री को पद से हटना पड़ा था। अब उन्होंने अपनी ही पार्टी नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठा लिया है।

उधर भाजपा ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और अब हिमाचल के मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद पाले बैठे वीरभद्र सिंह को निशाना बनाते हुए कांग्रेस पर जवाबी हमला तेज कर दिया है। अभी वहां राज्य विधानसभा के लिए चुनाव अभियान चल रहा है। वीरभद्र सिंह पर आयकर रिटर्न में संपत्ति का गलत ब्योरा देने तथा बीमा पॉलिसी के जरिये पैसों के हेरफेर करने का आरोप है। भाजपा ने मांग की है कि इन आरोपों की एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) से जांच कराई जाए। इससे पहले वीरभद्र सिंह को कथित तौर पर रिश्वत लेने संबंधी रिपोर्टों के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटा दिया गया था।

कई वर्ष पहले हिमाचल प्रदेश से आनेवाले एक केंद्रीय मंत्री बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार का केंद्र रहे थे। इसलिए, मौजूदा भाजपा अध्यक्ष की तरह क्या वीरभद्र सिंह भी परंपरा को ही आगे नहीं बढ़ा रहे? सचाई यह है कि मौजूदा नव-उदारवादी आर्थिक सुधारों ने मनी लांड्रिंग, सट्टेबाजी और संदिग्ध सौदों के लिए फ्लड गेट खोल दिए हैं, जिनके जरिये नियमित रूप से व्यक्तिगत लाभ के लिए अवैध तरीके से धन और कई तरह के अन्य संसाधन हथियाए जा रहे हैं।

ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह सब हमारी जनता के लिए एक बेहतर जीवन स्तर की कीमत पर किया जा रहा है। भ्रष्टाचार के इन मामलों को सिर्फ नैतिक मुद्दा नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह दिन-दहाड़े डाकेजनी के बराबर है। इसलिए दोषी राजनेताओं को उनके भ्रष्टाचार की सख्त सजा मिलनी ही चाहिए, चाहे वे कितने ही बड़े और पहुंच वाले क्यों न हों।

इसे इस तरह भी सोचना चाहिए कि जिन पैसों की लूट हुई है, उन्हें अगर सामाजिक तथा सार्वजनिक कल्याणकारी कदमों के लिए खर्च किया गया होता, तो देश की उस आम जनता को सचमुच लाभ पहुंचता, जो आज नाना प्रकार के आर्थिक बोझ तले पिस रही है।

इसलिए, समसामयिक भारतीय वास्तविकताओं में इस तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष ‘बुराई’ पर ‘अच्छाई’ की जीत का नैतिक सवाल भर नहीं है। इस संघर्ष में सफलता का सीधा परिणाम यह होगा कि हमारी जनता को बेहतर जीवन मुहैया कराया जा सकेगा और उनका रहन-सहन बेहतर हो सकेगा।

इस संघर्ष में किसी भी सफलता की शुरुआत तभी हो सकती है, जब यह संघर्ष उन नव-उदारवादी आर्थिक सुधारों के मौजूदा रास्ते के खिलाफ केंद्रित हो, जो ऐसे घोटालों के उद्गम बने हुए हैं। भ्रष्टाचार के इस रोग को तब तक समाप्त नहीं किया जा सकेगा, जब तक मौजूदा अर्थनीति की दिशा को पूरी तरह पलटा नहीं जाता। लेकिन मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि वह इस दिशा में कुछ सोचेगी?
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