आखिरकार वह ऐतिहासिक पत्रिका अपने 80वें साल में खुद इतिहास बन गई, जिसके बारे में उसके प्रकाशक फिल ग्राहम ने कभी कहा था कि हम चाहते हैं कि हम हर हफ्ते इतिहास का 'फर्स्ट रफ ड्राफ्ट' यानी पहला कच्चा मसौदा पेश करें। 2012 के आखिरी दिन 'न्यूजवीक' का आखिरी प्रिंट संस्करण बाजार में आया।
कागज पर छपी 'न्यूजवीक' अब अतीत के पन्नों में समा चुकी है। उसका नया 'डिजिटल संस्करण' होगा 'न्यूजवीक ग्लोबल', जो फरवरी के अंत तक लांच हो जाएगा। 'न्यूजवीक' के इस 'देह-परिवर्तन' पर अमेरिका में 'डिजिटल वीडियो पत्रकार' की अवधारणा के जनक माइकल रोजेनब्लूम ने 'द गार्डियन' में बड़ी दिलचस्प, लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है।
वह लिखते हैं कि पृथ्वी के इतिहास में अब तक पांच 'मॉस इक्सटिंकशन' हुए हैं, सबसे पहला करीब 25 करोड़ साल पहले पर्मियन काल में (जब धरती पर ज्यादातर एंफीबियन यानी जल और थल दोनों में रहनेवाले उभयचर प्राणी बसते थे) और सबसे ताजा करीब साढ़े छह करोड़ साल पहले, जिसमें डायनासोर खत्म हो गए थे और अब हमारे सामने है प्रिंट के अंत का समय! रोजेनब्लूम तो यह तक कहते हैं कि टीवी वालों को भी बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है, प्रिंट के बाद विलुप्त होने की कतार में अगली बारी टीवी की ही है!
'न्यूजवीक' और 'टाइम', ये दोनों एक-दूसरे की कट्टरतम प्रतिद्वंद्वी थीं और खबरों की दुनिया में बेमिसाल मानी जाने वाली इन दोनों ही पत्रिकाओं ने न केवल अमेरिका की संस्कृति और जीवन-शैली को बहुत हद तक संचालित किया, बल्कि सारी दुनिया के राजनीतिक-सामाजिक लैंडस्केप, संघर्ष और विमर्श को बहुत गहरे प्रभावित किया।
17 फरवरी 1933 को महज 10 सेंट प्रति अंक के मूल्य से अपना प्रकाशन शुरू करनेवाली 'न्यूजवीक' ने पहले ही साल में 50 हजार की प्रसार संख्या पा ली, जो अगले सात-आठ सालों में बढ़ कर पांच लाख प्रतियों तक पहुंच गई। लोग आज भी 1963 के 'न्यूजवीक' के विशेष अंक 'द नीग्रो इन अमेरिका' को याद करते हैं, जब इस पत्रिका ने अमेरिका में काले लोगों की स्थिति का अध्ययन करने के क्रम में 12 सौ से ज्यादा इंटरव्यू करने के लिए 40 शोधकर्ताओं की टीम को काम पर लगाया था। इसके एक साल बाद अमेरिका में 'सिविल राइट्स एक्ट' आया।
इसी तरह, 1967 में वियतनाम युद्ध में अमेरिकी विफलताओं का कच्चा चिट्ठा खोल कर उसने अमेरिकियों की आंखें खोल दी थीं। ऐसी एक-दो नहीं, सैंकड़ों कहानियां हैं, जो 'न्यूजवीक' के साथ जुड़ी है और उनमें से एक बड़ी कहानी यह भी है कि बिल क्लिंटन-मोनिका प्रकरण का 'स्कूप' भी सबसे पहले 'न्यूजवीक' को ही मिला था, लेकिन पत्रिका के संपादक डर गए और यह कहानी नहीं छपी।
बाद में यह कहानी एक वेबसाइट पर अवतरित हुई और फिर दुनिया भर के मीडिया ने इसे लपका। बहरहाल अपनी तमाम उपलब्धियों और विफलताओं के साथ 'न्यूजवीक' के प्रिंट संस्करण ने हमसे सदा-सदा के लिए विदा ले ली है, क्योंकि पिछले पांच-छह सालों में पत्रिका की प्रसार संख्या आधी से ज्यादा घटकर करीब 15 लाख रह गई थी और न्यूज स्टैंड से कुल 40 हजार प्रतियां ही बिक रही थीं। पत्रिका की प्रधान संपादक टीना ब्राउन लिखती हैं कि 'हम प्रिंट को सायोनारा कह रहे हैं और उस डिजिटल माध्यम को गले लगा रहे हैं, जिसे एक दिन हमारे सभी प्रतिद्वंद्वियों को अपनाने पर मजबूर होना ही पड़ेगा।’
जाहिर है कि डिजिटल का दानव बड़ी तेज़ी से फैल रहा है और वह दिन दूर नहीं, जब सबकुछ उसकी मुट्ठी में होगा। कारण बहुत साफ है। डिजिटल माध्यम अपने पाठक को तमाम ऐसी सुविधाएं देता है, जो कागज दे ही नहीं सकता! कागज पर आप वीडियो तो नहीं दे सकते! अखबार कितना भी अच्छा छाप दें, वह इंटरैक्टिव तो नहीं हो सकता और चौबीसों घंटे अपने आपको लगातार अपडेट भी नहीं कर सकता! किताबों का भी यही हाल है। ई-बुक घर में कोई जगह नहीं घेरती! पर इसका यह मतलब यह नहीं कि अखबार, पत्रिकाएं और टीवी न्यूज चैनलों का बोरिया-बिस्तर रातों-रात उठ जाने वाला है। भारत जैसे देश तो अभी डिजिटल क्रांति में बहुत पीछे हैं, लेकिन दुनिया के बाकी हिस्सों में भी प्रिंट काफी समय तक जिंदा रहेगा।