सारी दुनिया सोने की चमक से चकाचौंध हो रही है। अब डॉलर का जादू नहीं चलता और सारी दुनिया इस पीली धातु के पीछे भाग रही है। सोने के भाव इतनी ऊंचाइयों पर जा पहुंचे हैं, जिसकी दस साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अब सोना सौंदर्य बढ़ाने के साधन के रूप में ही नहीं, बल्कि भविष्य सुनिश्चित करने के शक्तिशाली माध्यम के रूप में उभरा है। दुनिया भर के निवेशक इसमें धन लगा रहे हैं। इसने पिछले दिनों 30,000 रुपये प्रति दस ग्राम की सीमा तोड़ दी, तो स्वाभाविक-सा सवाल उठ रहा है कि क्या अब यह 40,000 रुपये के भी पार जाएगा? यह प्रश्न बाजार के जानकारों और विश्लेषकों के दिमाग को मथ रहा है।
वर्ष 1947 में, यानी स्वतंत्रता के वर्ष में जो सोना 80 रुपये प्रति तोला था, वह आज 31-32 हजार के बीच घूम रहा है। दो वर्षों में ही इसने 10,000 रुपये की छलांग लगाई है। इतना रिटर्न तो और किसी निवेश में नहीं मिला है। भारतीय सोने के हमेशा से दीवाने रहे और उन्होंने हमेशा सोना खरीदा। इस कारण से ही कई वर्षों तक भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा आयातक देश रहा है। हम हर साल करीब 1,000 टन सोना आयात करते हैं। लेकिन अब चीन सोना खरीदने वाले बड़े देश के रूप में उभरा है और वहां लोग बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे हैं, गहने बनाने के लिए नहीं, सिर्फ निवेश के लिए।
ऐसा नहीं है कि सोना सिर्फ भारत और चीन की खरीदारी से इतना चमका है। इसके पहले इस सदी की शुरुआत में वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमजोरी से बढ़ता चला गया। जिस डॉलर को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा माना जाता था, वह अपनी ताकत खो बैठा और उसके विकल्प के रूप में सोना सामने आया, जिसने सारी दुनिया के निवेशकों के साथ सटोरियों को भी अपनी ओर आकर्षित कर लिया। कई देशों के सेंट्रल बैंक डॉलर के बजाय सोना खरीदकर रखने लगे, ताकि डॉलर के दाम औंधे मुंह गिरने की स्थिति में वे अपनी रक्षा कर सकें। भारत भी उनमें था और उसकी नकल करते हुए चीन के सेंट्रल बैंक ने भी बड़े पैमाने पर सोने की खरीदारी की, जिससे इसकी कीमत बुलंदियों पर जा पहुंची।
लेकिन असली खेल तो अंतरराष्ट्रीय सटोरियों ने खेला। उन्होंने सोने की माया को जगाया, जिसका परिणाम हुआ कि अरबों डॉलर का निवेश सोने में हुआ। इन सटोरियों ने, जिनमें अमेरिका के बड़े-बड़े इंवेस्टमेंट बैंकर भी हैं, न केवल अरबों डॉलर लगाए, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि इसके दाम गिरने न पाएं। अरबों-खरबों के इस खेल में दांव बहुत ज्यादा का है, इसलिए इसके दाम को ज्यादा गिरने से रोका जाता रहा। एक और बात सोने के पक्ष में आ गई है कि अमेरिका-यूरोप के बाद अब चीन की अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ने लगी है, जिससे सोने की मांग फिर बढ़ने लगी है।
सोना खरीदकर रखना हमेशा से जोखिम भरा रहा है, लेकिन अब इसका भी समाधान निकल आया है, और वह है, ई-ट्रेडिंग के रूप में। यानी कंप्यूटर या फोन से आप सोना खरीदकर सोना खरीदने वाले फंडों में डाल सकते हैं, जो अपनी सुरक्षित तिजोरियों में इन्हें आपके लिए रखते जाते हैं। इसमें निवेशक को फायदा यह है कि दोबारा बिक्री करने पर गहनों की तरह उसे किसी तरह का नुकसान नहीं उठाना पड़ता है। इस ई-ट्रेडिंग के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने सोने में निवेश किया।
लेकिन सोना अब किन ऊंचाइयों पर जाएगा? दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं मंदी से उबरने के लिए जो प्रयोग कर रही हैं, उनसे उनकी मुद्राएं कमजोर पड़ती जा रही हैं। इसका सीधा असर सोने पर पड़ेगा, जो आने वाले समय में और महंगा होगा। जहां तक भारत की बात है, यहां भी सोना रुपये के गिरने से महंगा हुआ। इसके बाद एक और भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत में कई ऐसे पर्व-त्योहार होते हैं, जिनमें सोना खरीदना शुभ माना जाता है। अक्षय तृतीया, धनतेरस वगैरह ऐसे पर्व हैं, जिनमें भारत में बड़े पैमाने पर सोना खरीदा जाता है।
बड़ी-बड़ी कंपनियों ने सोने के धंधे में उतरकर उसकी मांग बढ़ाने में बड़ा योगदान किया है। भारतीय परंपरा के मुताबिक, बेटी की शादी में सोना देना अनिवार्य है और इस वजह से भी इसकी मांग बनी हुई है। इसके अलावा देश में 25 करोड़ लोगों का विशाल मध्यवर्ग तैयार हो गया है, जो खरीदारी करने को उत्सुक है। इसलिए अर्थशास्त्र का आपूर्ति तथा मांग वाला नियम यहां भी लागू हो रहा है।
लेकिन क्या इन हालात में सोना खरीदना बुद्धिमानी होगा? इस सवाल का जवाब हां और न, दोनों में है। सोना जिन ऊंचाइयों पर जा पहुंचा है, वहां हर वक्त एक जोखिम है। इस साल मई में भी यह गिरा था और इसने निवेशकों को एक झटका दिया था। यह एक ऐसी कमोडिटी है, जिसकी लगाम भारतीयों के हाथ में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के हाथ में है। अगर उधर कुछ हुआ, तो इधर भी धक्का लगेगा।
सोना हमेशा से महंगा इसलिए रहा है कि यह एक दुर्लभ वस्तु है। अब दुनिया की कुछ ही खदानों में इसका उत्पादन होता है और भारत में ऐसी खदान नहीं हैं। सोने का बेशुमार उत्पादन नहीं हो सकता है और इसकी मांग और आपूर्ति में भारी अंतर बना रहेगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि बड़े पैमाने पर सोना खरीदा जाए। बेहतर होगा कि जब इसके दाम में उल्लेखनीय गिरावट आए, तो इसकी खरीदारी की जाए। थोड़ा-थोड़ा और सुनियोजित ढंग से खरीदारी करके इसमें निवेश करना उचित रहेगा।