हम लखनऊ में रहते हुए बीच-बीच में कानपुर चले जाया करते थे। कारण यह था कि कानपुर डीएवी कॉलेज में हम कुछ समय के लिए विद्यार्थी रहे थे। कानपुर से निकलने वाले `दैनिक प्रताप' में हमारी पहली रचना छपी थी। मगर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि हमारे मामा गोपीकृष्ण तिवारी, वहां के एल्डरमैन थे।
कानपुर का सबसे ज्यादा चर्चित अड्डा था वहां का शर्मा रेस्त्रां, जो अपनी पूरी-भाजी के स्वाद के लिए सुप्रसिद्ध था। वहां धनकुट्टी नाम वाली बस्ती में रहते थे पं. देवेंद्रनाथ शास्त्री। जो अंधे आशुकवि थे। पहले तो कविता लिखना ही अपने को स्वाहा करना है, दूसरे आशुकवि। हमने अपने जीवन में केवल दो ही कवियों को आशुकवि के रूप में पाया। पहले देवेंद्रनाथ शास्त्री और दूसरे सीतापुर के वंशीधर शुक्ल।
अस्तु एक सुबह जब हम कानपुर पहुंचे तो गोपी मामा `शर्मा रेस्त्रां' जा चुके थे। हम `शर्मा रेस्त्रां' पहुंचे ही थे कि कवि बालकृष्ण शर्मा `नवीन' रेस्त्रां से निकल रहे थे। मामा जी ने नवीन जी को रोककर जब परिचय करवाना चाहा, तो नवीन जी ने कहा, `अरे तुम क्या गोपी के भांजे हो? तुमने बीते वर्षों में जब दिल्ली में बनारसीदास चतुर्वेदी के घर कविता पढ़ी थी, तब यह नहीं बताया कि तुम गोपी के भांजे हो। चलो अब जब कभी दिल्ली आना, तो मिलना।'
यह कहकर नवीन जी रेस्त्रां से बाहर निकल गए। गोपी मामा के पास उस समय, उन्नाव के श्री विश्वंभरदयाल त्रिपाठी के परिवार के एक कोई सज्जन बैठे थे। जिन्हें न केवल निराला जी के विषय में वरन् नवीन जी के स्वतंत्रचेता स्वभाव के विषय में गहरी जानकारी थी।
उनकी ये पंक्तियां तो लगभग हर काव्यप्रेमी को कंठस्थ थीं-प्राणों के लाले पड़ जाएं, त्राहि-त्राहि अंबर में छाए/ कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए। वे बुजुर्ग सज्जन (त्रिपाठी जी) कहने लगे, `नवीन और निराला में कई समानताएं हैं। दोनों के उपनाम अपने ही ढंग के हैं। दोनों घर फूंक तमाशा देखने वालों में हैं। दोनों ने काव्य रूढ़ियों को तोड़ा है।'
गोपी मामा ने कहा, `नवीन जी ने जब `प्रताप' का कार्यभार संभाला, तब वे (मामाजी) केवल विद्यार्थी थे। हां, इतना जरूर याद है कि `प्रभा' नामक एक पत्रिका उन दिनों बड़ी लोकप्रिय थी। त्रिपाठी जी बोले, `लोकप्रिय ही नहीं, निराला जी की पहली कविता छापने का श्रेय भी नवीन जी को जाता है। यह बात शायद ही किसी को पता हो कि गणेश शंकर विद्यार्थी निराला की कविता प्रकाशित करने के पक्ष में नहीं थे। नवीन जी ने निराला जी की जो कविता `प्रभा' में छापी थी, उसका शीर्षक था `जन्मभूमि'।
नवीन जी ने निराला की जो दूसरी कविता सन 1921 में छापी, उसका शीर्षक था 'अध्यात्म पुरुष'। निराला जी की ये दोनों रचनाएं उनकी कृति `अपरा' में संकलित हैं। यह बात भी कम लोगों को ज्ञात है कि 'अध्यात्म पुरुष' रचना पढ़कर ही आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अद्वैत आश्रम रामकृष्ण मिशन की गतिविधियों में गहरी रुचि लेनी शुरू की थी। यही नहीं, वे मिशन के तत्कालीन अध्यक्ष माधवानंद से भी मिलने अल्मोड़ा गए थे।
हम सभी इस तथ्य से अवगत हैं कि निराला जी ने माइकेल मधुसूदन दत्त और कवींद्र रवींद्र के कुछ अंश अनूदित कर हिंदी के रचनाकारों को उनसे अवगत कराया था। नवीन जी ने पूरे उत्साह के साथ ये अनुवाद `प्रभा' में छापे थे। निराला जी के अनुरूप ही नवीन की देहयष्टि भी खासी आकर्षक थी।
वे स्वयं लिखते हैं -इतनी विस्तृत इतनी चौड़ी ही इस मानव की छाती / जिसे निरखकर स्वयं सृजन भी कहे सखी मेरी छाती/ निराला जी पर साहित्यिक संकट के बादल भी कम नहीं छाए। `मनोरमा' `मतवाला' आदि पत्रिकाएं जब उन्हें दंभी कह रही थीं, तब नवीन जी ही उनकी रक्षा के लिए आगे आए थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि महाकवि निराला नवीन जी को 'बड़े भैय्या' कहकर बुलाने लगे।
निराला की अनामिका की प्रथम समीक्षा भी नवीन जी ने ही छापी थी। हम यह पहले कह आए हैं कि प्रगतिशील आंदोलन की शुरुआत लखनऊ से ही हुई थी। यही वह वक्त था, जब निराला की 'राम की शक्ति पूजा' का प्रकाशन हुआ था। मगर मामा जी का ध्यान विशेष रूप से अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए त्रिपाठी जी ने कहा, `प्रगतिवाद का सही-सही प्रारूप और उसकी शुरुआत का श्रेय नवीन जी को जाता है' जिसका प्रकाशन भी `जूठे पत्ते' शीर्षक से सन 1936 में ही हुआ।
नवीन पहले-पहल जब जेल गए, तो हिंदी कवियों में यह मात्र नवीन हैं, जो लखनऊ के कारागार में पंडित नेहरू के साथ थे। सन 1939 में जो साहित्य सम्मेलन काशी में हुआ था, उसमें मालवीय जी, रामचंद्र शुक्ल, बच्चन, रामविलास शर्मा, काका कालेलकर, अमृतलाल नागर सहित नवीन और निराला जी भी सहभागी थे। वहां निराला ने नवीन की यह कहकर अवहेलना की कि श्रेष्ठ रचनाकार राजनीति की तंग गली में नहीं जाता।
उनका कटाक्ष किस पर था, यह तो कह पा सकना मुश्किल है, मगर उनकी टिप्पणी का विरोध करते हुए नवीन ने कहा, `राष्ट्रभक्ति राजनीति में जाना नहीं है।' शायद रामविलास ने पूछा भी था कि `आप नवीन को लताड़ते क्यों नहीं।' इस पर निराला ने जो नवीन को 'बड़े भैय्या' कह चुके थे बोले, `नवीन सत्ता लोभी नहीं, देश पर मर मिटने वालों में हैं।'
कालांतर में हम जब दिल्ली आ बसे, तब कई बार हमें उनके पास बैठने का सुअवसर बनारसीदास जी के यहां हुआ। स्वभाव से नवीन जी सौंदर्य प्रेमी थे। वे स्वयं भी इतने सुंदर थे कि महिलाएं उनके प्रति सहज ही आकृष्ट हो जाती थीं। एक दिन सुना नवीन जी ने अपनी टाइपिस्ट लड़की, जो उम्र में उनसे बहुत छोटी, इतनी छोटी कि नवीन जी की उम्र की तुलना में आधी से भी कम थी-से विवाह कर लिया। ठीक से याद नहीं, विवाह के कितने अंतराल के बाद यह भी सुना कि उस सिंधी लड़की ने आत्महत्या कर ली।