इस हफ्ते की समस्या क्या है? बारिश और ओले? पाकिस्तान में कादरी? कांग्रेस का चिंतन या डीजल पर भारतीय जनता पार्टी का बयान? कुछ लोगों का मानना है कि इन सबसे बेहतर उस खोज के बारे में सोचना होगा, जो बताती है कि कभी मंगल पर यमुना से लंबी नदी बहती थी। हमारे साथियों ने देश की प्रमुख नदियों की लंबाई भी किलोमीटर में पाठकों तक पहुंचा दी है, ताकि आपको मंगल वाली नदी का अनुमान करने में आसानी रहे।
यह सनातन तरकीब है। जब आप धरती पर मुश्किल में पड़े हों, तो आसमान की हलचल दिखाकर डमरू बजा दिया जाए। जब आपके घर में तीन दिन से नल सूखा पड़ा हो तब पानी की व्यवस्था से बेहतर है कि आपको देश की नदियों और जल की बचत पर प्रवचन पिलाया जाए। एक बार एक आदमी ठंड से ठिठुरता हुआ, दुनिया छोड़ रहा था तो चिंतकों ने उसे ज्ञान दिया, 'वैश्विक पर्यावरण में तापमान में अंतर आ रहा है। इसलिए बर्फीले प्रदेश, अधिक बर्फीले होते जा रहे हैं, गर्म प्रदेश अधिक गर्म। तुम्हारी इस ठिठुरन का रहस्य ओजोन की परत से भी अधिक महत्वपूर्ण है।'
वह आदमी मर गया, पर इनका चिंतन अभी तक बिक रहा है।
तो, आदमी मरता है, चिंतन जिंदा रहता है। चिंतन जिंदा रहता है तो चिंतकों का धंधा चलता रहता है। चिंतक न हों तो हम मामूली ठिठुरन से मर जाएं। इस ठिठुरन में ओजोन परत की महानता शामिल हो जाए तो मृत्यु असाधारण हो जाए। मृत्यु तो होनी ही है, सिद्धांत के लेप से उसका स्तर ऊपर उठाने में क्या मुश्किल है?
एक और सज्जन हैं। उनसे जब भी मैं कहता हूं फलां किताब अद्भुत है, तो वे रद्दी के भाव का उतार-चढ़ाव बताने लगते हैं। मैंने एक बार उन्हें रद्दी के भाव बताना शुरू किए, तो वे किताब के एक-एक अक्षर में न्यूटन के सिद्धांत का वजन विश्लेषित करने लगे। मैं समझ नहीं पाया कि वे सिद्धांत को किस तरह से आरोपित कर रहे हैं। या तो रद्दी का विचार सही है या न्यूटन का सिद्धांत। उन्होंने कहा, 'सिद्धांत की खासियत बताने के लिए मैं ऐसा कहता हूं। यह साबित करने के लिए ऐसा कहता हूं कि एक ही चीज विचार से रद्दी हो जाती है और दूसरे ही क्षण अमूल्य। बस इरादा तय होना चाहिए।'
अक्सर जब देश में महंगाई का चक्र तेज होता है, तो देशभक्ति के नारों की दुकानें बढ़ जाती हैं। आप सोचते होंगे, देशभक्ति के लिए आदमी को रोटी न मिलने की कीमत पर भी जान देने को तैयार रहना चाहिए। वे सोचते है, अगर यह आदमी बिना रोटी के जिंदा रह सकता है, तो इस चमत्कार की कभी मार्केटिंग का रास्ता खोज लेना चाहिए। आप रोते रहते हैं, वे बेचते रहते हैं।
मैं मंगल पर यमुना से लंबी नदी की खोज पर हर्षित हो सकता हूं और इस तरह कह सकता हूं कि हमारी सरस्वती भी एक दिन खोज लेंगे।
सरस्वती खोज कर क्या करेंगे? जो गंगा का किया, वही करेंगे। ज्यादा हुआ तो वैसा करेंगे जो यमुना का दिल्ली के पुलों के नीचे किया है। तब हम खोजेंगे कि मंगल पर यमुना से भी गंदी नदी बहती थी। इसके बाद सब प्रसन्न होंगे और कहेंगे, मंगल वाले हमसे नीचे थे। हम उनसे कम गंदी नदी वाले निकले। अहा! इस उपलब्धि का आनंद मनाएं।
अभी अभी जयपुर से कांग्रेस चिंतन शिविर के बाहर चना जोर गरम बेचकर लौटे एक फेरी वाले से मुलाकात हुई। बेहद प्रसन्न। पांव जमीन पर नहीं टिक रहे थे। मैंने कहा, क्या बहुत अच्छा धंधा हुआ? खूब चना जोर गरम बिका? दोहरे भाव में बिका?
उसने कहा, 'अजी चना जोर गरम की बिक्री की बात छोड़िए वह तो होती रहेगी। इस मेले में न सही, दूसरे मेले में सही। असली बात यह है कि हमें पता चल गया कि देश आगे कैसे बढ़ेगा और जब देश आगे बढ़ गया तो मैं भी आगे बढूंगा। आगे बढूंगा तो ज्यादा चना जोर गरम बेचूंगा। ज्यादा चना जोर गरम बेचूंगा तो बच्चों की फीस भरूंगा। फीस भरी तो वे पढ़-लिखकर बड़े बनेंगे। बड़े बने तो जिंदगी बन जाएगी।'
यह कहकर वह आगे बढ़ गया। उसकी आवाज से 'चना जोर गरम' गायब हो गया था।
सिद्धांत इसी तरह जीतता है। वह पेट की मामूली समस्या से हटाकर राष्ट्रीय समस्या पर ले जाता है। चिंतक कहते हैं, आदमी देश को आगे बढ़ाने के नारे में 'चना जोर गरम' भी भूल जाए तो चिंतन सार्थक हो।
मुहब्बत बड़ी अच्छी चीज होती है। फिर भी अंततः सब कहते हैं, मुहब्बत की झूठी कहानी पर रोये।
चिंतन ऐसी ही चीज है। मंगल की यमुना से अपनी यमुना की लंबाई नापते रहो। बाद की झूठी कहानी पर जो रोये, सो रोये।
और अंत में,
जिंदगी पिज्जा की तरह होती है। चौकोर बॉक्स में आती है। खोलो तो गोल निकलती है। खाना शुरू करो तो तिकोनी। जिंदगी ऐसी ही है दिखती कुछ है, होती कुछ है और स्वाद कुछ और देती है। इसका मजा लीजिए।