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अब पाक अधिकृत कश्मीर की बारी: पाकिस्तान के अस्तित्व का आधार कमजोर पड़ चुका है

आर विक्रम सिंह Published by: आर विक्रम सिंह Updated Sun, 29 Sep 2019 03:58 AM IST
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POK - फोटो : फाइल फोटो

बीते पांच अगस्त को संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने की घोषणा से इस भारतीय उपमहाद्वीप में घटनाक्रम की एक शृंखला प्रारंभ हो रही है। जब तक अनुच्छेद 370 कायम था, तो हमारी जद्दोजहद इसके समापन को लेकर थी।

अब हमें इससे आगे का वह परिदृश्य दिखना प्रारंभ हो गया है, जो अभी तक निगाहों से ओझल रहा था। किशनगंगा के पार पश्चिम और कारगिल-सियाचिन की पहाड़ियों से उत्तर की ओर हमें पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बालटिस्तान का वह इलाका दिखने लगा है, जो हमारी नीतिविहीन अकमर्ण्यता के कारण 1947 में पाकिस्तान के अधिकार में चला गया था। नेहरू जी का यथास्थिति को बनाए रखने का दुराग्रह हमारी सबसे बड़ी समस्या रहा है। युद्धशास्त्र व जियोपॉलिटिक्स के अध्येताओं के लिए यह बात आश्चर्यजनक है कि 1971 जैसी विजय के बाद भी हमारे नेता यथास्थिति के निर्वाह से बंधे रहे।



कश्मीर घाटी पीछे छूट चुकी है। 370 के समापन ने यथास्थिति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। यही पाकिस्तान और चीन की बेचैनी का सबब भी है। कश्मीर अब द्विपक्षीय विवाद से बाहर जाकर भारत गणराज्य का एक सामान्य राज्य हो चुका है। जब हम उत्तर दिशा में गिलगित-बालटिस्तान की ओर देखेंगे, तो हमें स्कर्दू के आगे हुंजा राज्य और हुंजा से लगा हुआ अफगानिस्तान का वाखान कॉरिडोर दिखाई देगा। अगर पाक-ब्रिटेन के षडयंत्रों के तहत ब्रिटिश अधिकारी मेजर ब्राउन के विद्रोह के कारण नवंबर 1947 में गिलगित बालटिस्तान पाकिस्तान के अधिकार में न चला गया होता, तो आज अफगानिस्तान के साथ हमारी 106 किलोमीटर जमीनी सीमाएं लगी होतीं और वाखान कॉरिडोर के माध्यम से हम अफगानिस्तान, ताजकिस्तान और मध्य एशिया के बहुत से देशों से जुड़े होते।

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POK - फोटो : फाइल फोटो
बीते पांच अगस्त को संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने की घोषणा से इस भारतीय उपमहाद्वीप में घटनाक्रम की एक शृंखला प्रारंभ हो रही है। जब तक अनुच्छेद 370 कायम था, तो हमारी जद्दोजहद इसके समापन को लेकर थी।

अब हमें इससे आगे का वह परिदृश्य दिखना प्रारंभ हो गया है, जो अभी तक निगाहों से ओझल रहा था। किशनगंगा के पार पश्चिम और कारगिल-सियाचिन की पहाड़ियों से उत्तर की ओर हमें पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बालटिस्तान का वह इलाका दिखने लगा है, जो हमारी नीतिविहीन अकमर्ण्यता के कारण 1947 में पाकिस्तान के अधिकार में चला गया था। नेहरू जी का यथास्थिति को बनाए रखने का दुराग्रह हमारी सबसे बड़ी समस्या रहा है। युद्धशास्त्र व जियोपॉलिटिक्स के अध्येताओं के लिए यह बात आश्चर्यजनक है कि 1971 जैसी विजय के बाद भी हमारे नेता यथास्थिति के निर्वाह से बंधे रहे।

कश्मीर घाटी पीछे छूट चुकी है। 370 के समापन ने यथास्थिति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। यही पाकिस्तान और चीन की बेचैनी का सबब भी है। कश्मीर अब द्विपक्षीय विवाद से बाहर जाकर भारत गणराज्य का एक सामान्य राज्य हो चुका है। जब हम उत्तर दिशा में गिलगित-बालटिस्तान की ओर देखेंगे, तो हमें स्कर्दू के आगे हुंजा राज्य और हुंजा से लगा हुआ अफगानिस्तान का वाखान कॉरिडोर दिखाई देगा। अगर पाक-ब्रिटेन के षडयंत्रों के तहत ब्रिटिश अधिकारी मेजर ब्राउन के विद्रोह के कारण नवंबर 1947 में गिलगित बालटिस्तान पाकिस्तान के अधिकार में न चला गया होता, तो आज अफगानिस्तान के साथ हमारी 106 किलोमीटर जमीनी सीमाएं लगी होतीं और वाखान कॉरिडोर के माध्यम से हम अफगानिस्तान, ताजकिस्तान और मध्य एशिया के बहुत से देशों से जुड़े होते।

चीन का सी-पैक प्रोजेक्ट अस्तित्व में ही नहीं आता। अफगानिस्तान से इस संपर्क मार्ग के बाधित हो जाने से हमारे लिए ‘लुक वेस्ट’ की नीति पर अमल कर सकना ही संभव नहीं हो पाया। ये हमारी खुद की पैदा की गई समस्याएं थीं। नेतृत्व में रणनीतिक-भू राजनीतिक सोच के अभाव के कारण गिलगित-बालटिस्तान को वापस लेने पर पूरी शक्ति नहीं लगाई गई। आदर्शवादी नेहरू इन जमीनी सच्चाइयों से बहुत दूर थे।

भू-राजनीति समाजों, राष्ट्रों की अंतर्निहित शक्तियों, प्राकृतिक संसाधनों, राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं से उत्पन्न शक्तियों के अध्ययन का विज्ञान है। हमने देखा है कि प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत पश्चिमी शक्तियों ने किस प्रकार आटोमन साम्राज्य को अपने अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांटते हुए पश्चिम एशिया, अफ्रीका में नई सीमाओं, नए देशों का निर्माण किया था। इन देशों की सत्ता कबीलाई संस्कृतियों के हवाले कर दी गई थी, जिससे इनके संसाधनों का दोहन आसान हो जाए।

इसी तरह ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारत की पश्चिमोत्तर सीमाओं को सुरक्षित करने की दृष्टि से वर्ष 1893 में पख्तून क्षेत्रों को अस्वाभाविक रूप से बांटते हुए डूरंड रेखा खीची गई, जिसने पख्तून समाज को दो हिस्सों अफगानिस्तान और ब्रिटिश पश्चिमोत्तर फ्रांटियर राज्य में बांट दिया।

1947 में शीत युद्ध की आवश्यकताओं के मद्देनजर भारत के बिगड़े हुए सांप्रदायिक माहौल को साधते हुए नकली सीमाओं का एक देश पाकिस्तान खड़ा किया गया। पाकिस्तान दुनिया का अकेला देश है, जिसकी दोनों सीमाएं साम्राज्यवादी शक्तियों ने अपने हितों की रक्षा के लिए बनाई है। अफगानिस्तान में काबुल का दक्षिणी क्षेत्र पख्तून राष्ट्रीयता का इलाका पख्तूनिस्तान कहा जाता है। पाकिस्तान का नया बना राज्य खैबर पख्तूनख्वा, फाटा दक्षिणी अफगानिस्तान के पख्तून इलाके के साथ मिलकर पख्तून कबीलाई सार्वभौमिकता का स्वाभाविक राष्ट्र बनाते हैं।

दूसरा सबसे बड़ा जातीय कबीलाई वर्ग ताजिक समाज है, जिसका इलाका मुख्यतः उत्तरी पूर्वी अफगानिस्तान के ताजिकिस्तान देश की सीमा से लगा हुआ है। अफगानिस्तान की आबादी का 27 प्रतिशत भाग ताजिक है और वाखान कॉरिडोर इसी इलाके को गिलगित-बालटिस्तान से जोड़ता है। पख्तून, ताजिक वे समाज हैं, जिनकी राष्ट्रीयता को अभिव्यक्ति नहीं मिल सकी है।

पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण की भरसक कोशिशें कर रहा है। लेकिन यह मुद्दा खड़ा नहीं हो पाएगा। पाकिस्तान की अंतररराष्ट्रीय छवि भी एक आतंक प्रायोजक देश की है। आर्थिक स्थिति दयनीय है, वह युद्ध तो दूर सीमा पर आतंकवादी गतिविधियां चला सकने में सक्षम नहीं होगा। पाकिस्तान का कश्मीर अभियान एक निष्प्रभावी, असफल प्रोपेगैंडा होकर रह जाएगा। दूसरी ओर पाक अधिकृत कश्मीर स्वयं असंतोष की गिरफ्त में है।

पाकिस्तान के अस्तित्व के दो आधार रहे हैं, पहला कश्मीर और दूसरा इस्लाम। पहला आधार खिसक चुका है। जहां तक इस्लाम का सवाल है, दुनिया में इस्लाम 54 राष्ट्रों में विभाजित है, जिनके अपने अपने हित हैं। इस्लाम इन्हें अभी तक एक देश नहीं बना सका है। पाकिस्तान की जड़ों में हिंदू समाज से घृणा के बीज हैं। तात्पर्य यह है कि पाकिस्तान के अस्तित्व का आधार कमजोर पड़ चुका है। हमने 1991 में पाकिस्तान के उत्तर में विभाजित होते हुए सोवियत यूनियन को देखा है। पख्तूनिस्तान, बलूचिस्तान, आजाद सिंध भविष्य के देश हैं और यह भविष्य बहुत दूर नहीं है।
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