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गॉड पार्टिकल खोजते-खोजते वैज्ञानिकों ने वर्ल्ड वाइड वेब की खोज कर ली और पूरी दुनिया की शक्ल बदल दी

क्षमा शर्मा Published by: क्षमा शर्मा Updated Sun, 29 Sep 2019 03:41 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixr8

वर्ष 2011 की बात है। मैं देख रही थी, सामने बर्फ से भरी चोटियां, और नीचे दूर-दूर तक पीले सरसों और ट्यूलिप के फूलों से भरे खेत। तभी एक गोल गुंबद- सा नजर आया। गाड़ी चलाते हुए बेटे ने कहा, यह सर्न है। सर्न! हाल ही में तो सर्न खबरों में छाया रहा है। यहां वैज्ञानिक गॉड पार्टिकल यानी वह कण खोज रहे थे, जो इस जगत के चराचर में सबके भीतर है। गॉड पार्टिकल खोजते-खोजते यहां वैज्ञानिकों ने वर्ल्ड वाइड वेब की खोज कर ली, जिसके जरिये चलने वाले कंप्यूटर और इंटरनेट ने पूरी दुनिया की शक्ल बदल दी। सर्न में तमाम यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका भी शामिल है। 2017 से भारत भी इसका सदस्य है।

स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर बसा सर्न पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों का एक सपना है। पीटर हिग्स और सत्येंद्रनाथ बोस ने जिस गॉड पार्टिकल की कल्पना की थी और जिसे हिग्स बोसोन नाम दिया गया, उसे एलएचसी (लार्ज हार्डन कोलिडर) और सीएमएस के जरिये वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला है। उस समय यहां से गुजरते हुए खयाल आया कि काश, यहां जा सकूं, दुनिया के सबसे बड़े प्रयोग को देख सकूं। तब यह तक कहा गया था कि इस प्रयोग से कहीं दुनिया नष्ट तो नहीं हो जाएगी। आखिरकार चार जुलाई, 2012 को वैज्ञानिकों ने गॉड पार्टिकल की खोज कर ली थी।



इसी साल विगत 19 अगस्त को, जब मैं स्विट्जरलैंड में थी, तो डॉ. अर्चना शर्मा ने मुझसे पूछा कि क्या आप सर्न देखना चाहेंगी?  मुझे सहसा अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। जिस जगह को देखने के सपने मैं पिछले आठ साल से देख रही हूं, उसे दिखाने की बात हो रही है। और कौन पूछ रहा है? वहां काम करने वाली एक वरिष्ठ और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक। झांसी की डॉ. शर्मा पिछले तीस साल से वहां हैं। मैंने कहा हां।

अगले दिन साढ़े बारह बजे वहां पहुंची, तो सर्न के बड़े गोल गुंबद पर लिखा दिखा- यूनिवर्स ऑफ पार्टिकल्स। सबसे पहले हम वहां गॉड पार्टिकल के प्रयोग से संबंधित एक प्रदर्शनी देखने गए। फिर आठ किलोमीटर दूर वहां, जहां एलएचसी, सीएमएस मशीन लगी हुई थी। अदभुत रास्ता था। बाएं हाथ पर दूर-दूर तक फैले पहाड़, जहां तक नजर जाए, हरे-भरे खेत। फलों से लदे पेड़। खेतों-पहाड़ों पर बने झोंपड़ीनुमा मकान। अभी सर्न की मशीन कूलिंग पीरियड में चल रही है। इसलिए वहां कुछ लोगों को ले जाया जा सकता है। 2021 के बाद जब तक मशीन काम करेगी, वहां कोई नहीं जा सकेगा।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixr8
वर्ष 2011 की बात है। मैं देख रही थी, सामने बर्फ से भरी चोटियां, और नीचे दूर-दूर तक पीले सरसों और ट्यूलिप के फूलों से भरे खेत। तभी एक गोल गुंबद- सा नजर आया। गाड़ी चलाते हुए बेटे ने कहा, यह सर्न है। सर्न! हाल ही में तो सर्न खबरों में छाया रहा है। यहां वैज्ञानिक गॉड पार्टिकल यानी वह कण खोज रहे थे, जो इस जगत के चराचर में सबके भीतर है। गॉड पार्टिकल खोजते-खोजते यहां वैज्ञानिकों ने वर्ल्ड वाइड वेब की खोज कर ली, जिसके जरिये चलने वाले कंप्यूटर और इंटरनेट ने पूरी दुनिया की शक्ल बदल दी। सर्न में तमाम यूरोपीय देशों के अलावा अमेरिका भी शामिल है। 2017 से भारत भी इसका सदस्य है।

स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर बसा सर्न पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों का एक सपना है। पीटर हिग्स और सत्येंद्रनाथ बोस ने जिस गॉड पार्टिकल की कल्पना की थी और जिसे हिग्स बोसोन नाम दिया गया, उसे एलएचसी (लार्ज हार्डन कोलिडर) और सीएमएस के जरिये वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला है। उस समय यहां से गुजरते हुए खयाल आया कि काश, यहां जा सकूं, दुनिया के सबसे बड़े प्रयोग को देख सकूं। तब यह तक कहा गया था कि इस प्रयोग से कहीं दुनिया नष्ट तो नहीं हो जाएगी। आखिरकार चार जुलाई, 2012 को वैज्ञानिकों ने गॉड पार्टिकल की खोज कर ली थी।

इसी साल विगत 19 अगस्त को, जब मैं स्विट्जरलैंड में थी, तो डॉ. अर्चना शर्मा ने मुझसे पूछा कि क्या आप सर्न देखना चाहेंगी?  मुझे सहसा अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। जिस जगह को देखने के सपने मैं पिछले आठ साल से देख रही हूं, उसे दिखाने की बात हो रही है। और कौन पूछ रहा है? वहां काम करने वाली एक वरिष्ठ और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक। झांसी की डॉ. शर्मा पिछले तीस साल से वहां हैं। मैंने कहा हां।

अगले दिन साढ़े बारह बजे वहां पहुंची, तो सर्न के बड़े गोल गुंबद पर लिखा दिखा- यूनिवर्स ऑफ पार्टिकल्स। सबसे पहले हम वहां गॉड पार्टिकल के प्रयोग से संबंधित एक प्रदर्शनी देखने गए। फिर आठ किलोमीटर दूर वहां, जहां एलएचसी, सीएमएस मशीन लगी हुई थी। अदभुत रास्ता था। बाएं हाथ पर दूर-दूर तक फैले पहाड़, जहां तक नजर जाए, हरे-भरे खेत। फलों से लदे पेड़। खेतों-पहाड़ों पर बने झोंपड़ीनुमा मकान। अभी सर्न की मशीन कूलिंग पीरियड में चल रही है। इसलिए वहां कुछ लोगों को ले जाया जा सकता है। 2021 के बाद जब तक मशीन काम करेगी, वहां कोई नहीं जा सकेगा।

सिक्योरिटी जांच के बाद हम अंदर पहुंचे। वहां लॉबी में ही एलिजाबेथ आ पहुंची। वह अमेरिकी हैं। उन्होंने सबसे पहले हमें इस प्रयोग के बारे में एक फिल्म दिखाई। इससे पहले अर्चना कह ही रही थीं कि यह दुनिया अनंत है। अपने वेदों में भी इस बारे में कहा गया है। फिल्म देखने के बाद हमें जगह-जगह ले जाया जा रहा था और प्रयोग के विभिन्न स्तरों के बारे में बताया जा रहा था। हर बात हमें चकित करती थी। एलएचसी, सीएमएस में एक सेकेंड में चार करोड़ अणु एक-दूसरे की तरफ दौड़ते हैं, पर टकराते बहुत कम हैं। अर्चना ने इसका उदाहरण दिया कि यदि आप एफिल टावर (फ्रांस) से स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी (अमेरिका) की तरफ कोई सुई फेंकें, तो उसके वहां पहुंचने की जितनी संभावना है, वैसी ही स्थिति यहां है। रेडिएशन से बचाने के लिए हमें हेलमेट पहनाए गए थे।

पूरी दीवार पर दुनिया भर के उन वैज्ञानिकों के चित्र लगे थे, जिन्होंने इस प्रयोग में सहयोग दिया और इसकी सफलता के लिए जीवन खपा दिया। अर्चना भी उनमें से एक हैं। उऩके विभाग में पांच सौ वैज्ञानिकों की टीम काम करती है। वैसे यहां दुनिया भर के पांच हजार से ज्यादा वैज्ञानिक काम करते हैं। हम बाहर की तरफ आए। वहां हरे रंग की एक बड़ी लिफ्ट लगी थी। लिफ्ट से हमें चौरासी मीटर नीचे जाना था। लिफ्ट से उतरने के बाद तीन मंजिल नीचे सीढ़ियों से उतरना पड़ा। जब हम एलएचसी, सीएमएस के सामने पहुंचे, तो उसकी विशालकायता देखकर दंग रह गए। इस मशीन को नीचे उतारने के लिए विशेष क्रेन बनाई गई थी। यहां आकर मनुष्य की असीमित शक्ति का पता चलता है। 
      
धरती से लगभग सौ मीटर नीचे, दो हजार दो सौ टन की मशीन देखकर दो तरह की बातें मन में आती हैं। एक तो इससे मनुष्य की प्रकृति की जीतने की ताकत का एहसास होता है। दूसरा खयाल आता है कि जो चीज प्रकृति में घट चुकी है, उसे जानने को मनुष्य कितना बेचैन है कि अपने सारे संसाधनों को उस तरफ झोंककर दौड़ रहा है। ब्रह्मांड में मात्र पांच प्रतिशत ही हम हैं। बाकी संसार में क्या है, उसके बारे में कुछ पता नहीं है। इसलिए उसे डार्क मैटर कहा जाता है।

इस मशीन से जो डाटा मिलता है, उनमें से निन्यानबे प्रतिशत के बारे में जानने की फुर्सत अभी वैज्ञानिकों को नहीं है। उनके पास इतने संसाधन और समय नहीं है। वे तो बस एक प्रतिशत पर काम करते हैं। और इस एक प्रतिशत की जानकारी से भी ऐसे परिणाम निकल रहे हैं, जिनकी मानवता के लिए बड़ी उपयोगिता है। इनमें एक है कैंसर का इलाज। अर्चना का कहना है कि वह यहां से प्राप्त कैंसर के नए इलाज की तकनीक से सज्जित एक सेंटर भारत में खोलना चाहती हैं, जिससे अपने यहां के लोगों को इसका लाभ मिल सके।   
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