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कला: काल के पार कांसा, भारतीय मूर्तिकला की आधुनिक दृष्टि का बोध कराती एक प्रदर्शनी

डॉ. राजेश कुमार व्यास Published by: Pavan Updated Sun, 29 Mar 2026 07:14 AM IST

सार

पटना के बिहार संग्रहालय में 'टाइमलेस इन ब्रोंज' कला प्रदर्शनी में जिन कलाकारों की कृतियां प्रदर्शित हैं, उनमें भारतीय मूर्तिकला की आधुनिक दृष्टि का बोध होता है। इस संग्रह में ख्यात-विख्यात कलाकारों की दुर्लभ कलाकृतियों को खोज-खोज कर उन्होंने अपने यहां संग्रहित किया है। आधुनिक बिहार म्यूजियम भी उनकी ही कल्पना का वह रूप रहा है जहां कलाकृतियों के साथ उनसे जुड़े संवाद की भी पहल हुई है।
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काल के पार कांसा - फोटो : अमर उजाला


मध्यकाल के बाद रामकिंकर बैज, धनराज भगत जैसे कलाकारों ने मूर्तिकला के पारंपरिक भारतीय स्वरूप से परे संरचना की आधुनिक दृष्टि दी, पर यह विडंबना रही है कि आजादी के बाद मूर्तिकला में जो बदलाव आया है, उसके सर्जन सरोकारों में सलीके से या कहें सुनियोजित कुछ दृष्टि इधर कहीं लिखे में दिखाई नहीं देती है। पिछले दिनों पटना के बिहार संग्रहालय में ‘टाइमलेस इन ब्रोंज’ कला प्रदर्शनी देखते हुए यही सब मन में कौंध रहा था। कांस्य में ढले रूपाकारों की इस प्रदर्शनी को संग्रहालय के महानिदेशक और कला रसिक अंजनी कुमार सिंह ने क्यूरेट किया। महत्वपूर्ण यह भी रहा कि इसमें कांस्य प्रतिमाओं से जुड़ी आधुनिक दृष्टि की इतिहास यात्रा उद्घाटित हुई है। कांस्य प्रतिमाओं की ढलाई प्रक्रिया ‘लास्ट वेक्स प्रोसेस’ से जुड़े कलाकार राजकुमार पंडित की पहल पर यह प्रदर्शनी शिल्पांजलि आर्ट फाउंडेशन, जयपुर के सहयोग से संभव हुई। क्यूरेटर अंजनी कुमार सिंह ने प्रदर्शनी में देशभर के कलाकारों की मूर्तियों के इतिहास के साथ उनके सिरजे की प्रक्रिया से भी रूबरू करवाया है। मुझे लगता है, यह पहली बार हुआ है जब मिट्टी से कलाकारों द्वारा मूर्ति निर्माण, सांचे में उनको संजोने और फिर मोम से उसकी निर्माण प्रक्रिया के बाद अग्नि से कांस्य धातु को पिघलाकर ढलाई की प्रक्रिया को भी किसी प्रदर्शनी में पहली बार समझाया गया है।


अंजनी कुमार सिंह कहते भी हैं, ‘अग्नि, धातु और मानवीय श्रम की परिणति है कास्यं प्रतिमाएं। यह प्रदर्शनी कलाकारों की आधुनिक दृष्टि लिए तो है ही, इसमें कांस्य प्रतिमाओं की भारतीय परंपरा, दीर्घजीविता और सतत परंपरा से भी आप रूबरू हो सकते हैं।’ यह सच है, भारतीय कांस्य कला की सामयिक दृष्टि से साक्षात कराने वाली इस प्रदर्शनी में मूर्तियों को देखते हुए आप पारंपरिक रूढ़ियों से निकलकर आधुनिकता, यथार्थवाद और नए प्रयोगों में रूप की बदलती परिभाषाओं को बांच सकते हैं।


मूर्तिकला या दूसरी कोई भी कला रूप की यात्रा भर कहां होती है! वहां दृश्य में बहुत सारा अदृश्य भी तो बसा होता है। ‘टाइमलेस इन ब्रोंज’ में प्रदर्शित कलाकारों की कलाकृतियां इस दृष्टि से भारत की मूर्तिकला में आ रहे बदलावों के साथ आधुनिक जीवन शैली से जुड़े चिंतन का भी आकाश लिए है। मसलन सीमा कोहली के उस शिल्प को ही लें, जिसमें हिरनी पर योग मुद्रा करते योगी और रस्सी के सहारे दोनों के जुड़ाव को दर्शाया गया है। शिल्प अंर्तमन मथता है। हिरनी अपनी ही नाभि में स्थित कस्तूरी की सुगंध से मोहित हो जंगल-जंगल उसकी तलाश में भटकती है और अंत में प्राण गंवा देती है। उसे कहां पता होता है कि सुगंध का स्रोत उसके भीतर ही है! मृग संग योग मुद्रा के शिल्प में सीमा अपने शिल्प में स्त्री-पुरूष संबंधों के आलोक में आत्मज्ञान से जुड़ी समझ को जैसे रूपांतरित करती है। टी.वी. संतोष ने अतीत होती वस्तुओं से जुड़ी ध्वनियों में वर्तमान के स्वर संजोए हैं, तो टूटू पटनायक ने वास्तु और मूर्तिकला के अंत:संबंधों को अपने शिल्प में व्याख्यायित किया है। सुदर्शन शेट्टी इस दौर के महत्वपूर्ण कलाकार हैं। उनकी कलाकृति लोप होते जीवन मूल्यों में गति का विरल निरूपण है। निष्क्रिय वस्तुओं में यंत्रों के मेल से उन्हें जीवंत बनाते हैं। गणेश गोहिन ने पेरिस को की सांझ को अपने शिल्प में जीवंत किया है तो जी.आर. इरन्ना के रचे पेड़ और वीर मुंशी की श्रापनेल शृंखला में हाथ से बने कागज के जीवनानुभवों का कांस्य रूपांतरण लुभाता है।


राजकुमार पंडित का शिल्प भी अलग से आकृष्ट करता है। एक दृष्टि में सिंहासन पर किसी महाराजा की मूर्ति सी दिखाई देनी वाली कलाकृति पर गौर करेंगे तो उसमें जीवन से जुड़ी जटिलताओं, विडम्बनाओं और अंतर्मन त्रासदी को व्यंजित किया गया है। कलाकृतियों की ढलाई कर उन्हें सुंदर रूपाकार देने वाले श्रम-आलोक में यहां कलाकार की अंतर्मन व्यथा-कथा को जैसे राजकुमार ने रूपायित किया है। राजेन्द्र टिकू, तारा सभरवाल, दीपाली दारोज, रियाज कोमू, एल.तल्लुर, कोटेश्वर चन्द्रेश, अजय कानवाल, अरूण कुमार एच.जी, भुवनेश गोवादा, गिरिजेश कुमार सिंह, जगन्नाथ पंडा, मनीषा पारेख, मंजूनाथ कामथ, निधि खुराना, राजशेखरन नैयर, शतरूपा भट्टाचार्य, सुनील गावडे, विकास प्रताप सिंह, विपुल कुमार आदि की कलाकृतियां यथार्थ में निहित अमूर्त का विरल रूपायन है। यहां हिम्मत शाह के हेड्स के भी विरल कांस्य रूपाकार हैं। हिम्मत शाह अपनी कलाकृतियों में टेक्सचर में उभरे रूपाकारों में मानव-मस्तिष्क की जैसे थाह लेते रहे हैं। यहां उनकी दो ऐसी ही कलाकृतियां अंजनी कुमार सिंह ने प्रदर्शित की है।


यह महज संयोग नहीं है कि बिहार संग्रहालय के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह ने समकालीन भारतीय मूर्तिकला से साक्षात कराती इस प्रदर्शनी को क्यूरेट किया है। उनके पास कलाकृतियों का अपना व्यक्तिगत निजी संग्रह है। इस संग्रह में देश के लगभग सभी कलाकारों की महती कलाकृतियों को उन्होंने संजोया है। अलका पाण्डे ने बाकायदा उनके इस संग्रह को क्यूरेट कर ‘प्लूरल इंडिया’ शीर्षक से पुस्तक भी प्रकाशित की है। देश-विदेश के भांति-भांति के पेड़-पौधों के संग्रह से शुरू हुई उनकी कलाकृति-संग्रह यात्रा में एक निजी संग्रहालय ‘हिम्मत’ भी उन्होंने स्थापित किया है। अपने इस संग्रह में ख्यात-विख्यात कलाकारों की दुर्लभ कलाकृतियों को खोज-खोज कर उन्होंने अपने यहां संग्रहित किया है। आधुनिक बिहार म्यूजियम भी उनकी ही कल्पना का वह रूप रहा है जहां कलाकृतियों के साथ उनसे जुड़े संवाद की भी पहल हुई है।


बहरहाल, ‘कालजयी कांस्य’ में 36 समकालीन भारतीय मूर्तिकारों की कला को प्रदर्शित किया गया है। आस्था और विश्वास से जुड़ी प्रतिमाओं के इतिहास से जुड़ी हमारी संस्कृति की आधुनिकी में विचार-विरासत की यह बढ़त है। असल में यह जीवन मूल्यों में आ रहे बदलाव, यांत्रिकी से बदलती दुनिया और मानव-मन के भांति-भांति के रूपाकारों में समाई मूर्ति-कला की आधुनिक भारतीय दृष्टि है।
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