साधो, इधर लखनऊ की तहजीब गुम होने के कगार पर थी। भला हो दिल्ली का, जहां पिछले दिनों सरकार बनाने के मसले पर राजनीतिक गलियारों में 'पहले आप, पहले आप’ सुनाई पड़ा, तो बांछें खिल उठीं। लगा कि लखनवी संस्कृति को कोई मिटा नहीं सकता। सभ्यताएं इसी तरह मर-मरकर भी अस्तित्व में बनी रहती हैं और हम हैं कि उनके खोने-डूबने का रोना रोते रहते हैं।
मेरे एक मित्र के परिवार में एक विचित्र प्रकार का संकट आ खड़ा हुआ। उस घर में पिता पुरातनपंथी पूजा पाठी हैं और बेटा आप का समर्थक। एक दिन बेटे और बाप में तनातनी हो गई। बेटा कहीं जलसे से लौटा, तो हाथ में पकड़ी झाड़ू आलमारी के ऊपर रख दी। बाप डांटने लगे। बेटे ने कहा, आप हमें नहीं जानते। मैं इस झाड़ू से दुनिया को बदल कर रख दूंगा। सुनकर बाप खामोश हो गए। फिर धीरे-से बोले, इस घर में आज से कोई मुझे आप नहीं कहेगा। यह शब्द अब मुझे चुभने लगा है।
अभी थोड़े दिन पहले तक चबूतरे पर घर के बुढ़ऊ झाड़ू लगाया करते थे, पर अब नई-नवेलियां खुलेआम हाथों में झाड़ू थामकर बुहारने लगी हैं। झाड़ू पहले सिर्फ बुहारती थी, आज इसे लोग सिर पर उठाए घूमने लगे हैं। जिसकी जगह घर के कोने में हुआ करती थी, उसे राजनीति ने सिर के ऊपर तान दिया।
मैं उस दिन घर की सफाई के लिए झाड़ू खरीद कर ला रहा था। मित्र ने रास्ते में रोककर बोला, बधाई हो। मैंने कहा, आपको भी नया वर्ष मुबारक हो। वह हंसकर बोले, मैंने झाड़ू देखकर बधाई दी है। क्या आप ‘आप’ में शामिल हो गए। मैंने एक बार झाड़ू और दूसरी बार उनकी ओर देखा। मित्र के चेहरे पर कुमार विश्वास टाइप हंसी थी और मैं दिल्ली की भाजपा इकाई मार्का उदास बना रहा। उस रोज कॉलोनी में एक आदमी को झाड़ू थामे देखकर मैंने कहा, आप हमारी गली में रोज क्यों नहीं आते? वह बोला, मैं जमादार नहीं हूं, आप की मीटिंग में जा रहा हूं। सुनकर मैं निरुत्तर हो गया।
झाड़ू अब टोपियों पर शोभायमान है। झाड़ू लोगों का ईमान है। वह राजनीति के सफाई कर्मियों की पहचान है। झाड़ू अब राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का दबा-छिपा अरमान है, क्योंकि झाड़ू अब चुनाव निशान है। यह झाड़ू का शुचितावाद है, जो दूसरों को सिर्फ कूड़ा-कचरा समझता है। उसकी दृष्टि में सामने का सब कुछ गंदा और घृणित है। यही झाड़ू का दर्शन है, जो इन दिनों राजनीतिक अतीत के सारे दर्शनों पर भारी पड़ रहा है।