अपने इतिहास के बारे में तो हम कम जानते ही हैं, अपने साहित्य के प्रति भी हम अनभिज्ञ होते जा रहे है। बिना अपने साहित्य को जाने, बिना उससे प्यार किए, बिना उसे संजोकर रखने का काम किए, उसे अपनी अनमोल विरासत समझ लोगों और आगे की पीढ़ियों के साथ बांटे बिना हमारा जीवन नीरस बन जाएगा। साहित्य हमारी सांस्कृतिक जड़ों को सींचता है। अगर हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सूखने देंगे, तो सदियों की तपस्या से तैयार हमारी धरोहर के गायब हो जाने का खतरा पैदा हो जाएगा।
पद्मावत तुलसी के रामचरितमानस से कुछ दशक पहले लिखी गई थी। जानकार लोग इसे अवधी की सर्वश्रेष्ठ कृति मानते हैं। अवधी है भी बड़ी मीठी और आकर्षक भाषा। उसकी शैली, उसके मुहावरे और लोगों के जीवन के अनुभवों का वर्णन करने का उसका अद्भुत सामर्थ्य-इन सबका नतीजा है कि आज भी वह एक बड़े क्षेत्र की जीवित और जीवंत बोली है।
पद्मावत के उन बहुत साल पहले पढ़े अंश के बारे में सोचना शुरू ही किया था कि हिंदी के बड़े लेखक और प्राध्यापक पुरुषोत्तम अग्रवाल की अंग्रेजी में लिखी पुस्तक पद्मावत हाथ लग गई। जायसी, पद्मावत, अवधी के मीठे बोल और अग्रवाल जी का गहन अध्ययन-सबका मजा एक साथ पाने का मौका मिल गया। जायसी ने पद्मावत लिखने का का कारण बताया है, मुहम्मद यही कवी जोर सुनावा, सुना जो पेम पीर का गावा/जोरी लाइ रकत कै लेई, गाढ़ी प्रीति नैन जल सोई। वह कहते हैं कि उन्होंने एक प्रेम कहानी सुनाने का प्रयास किया है। उन्होंने अपने लहू से गोंद बनाया और अपने आंसुओं से उसे भिगोया। उनकी बस यही इच्छा है कि पढ़ने वाले उनको याद रखेंगे।
अभी तक तो लाखों पाठकों ने उनकी यह इच्छा पूरी की है। आगे क्या संजय लीला भंसाली की पद्मावती ही पद्मावत के रूप में मानी जाएगी या फिर फिल्म के बनने से जायसी की पद्मावत को जानने की इच्छा पैदा होगी? उत्तर देना कठिन है! पर जायसी को पढ़ने वालों को तरह-तरह के सुखों का अनुभव होगा। भाषा और शैली का सुख, तोता हीरामन से मिलने का सुख, पद्मिनी के सौंदर्य वर्णन का सुख, रतनसेन द्वारा पद्मिनी को पाने के जुनून को समझने का सुख। पद्मिनी इतनी सुंदर थीं कि उसे पहली बार देखने वाला अक्सर बेहोश हो जाता था, जैसे रतनसेन हो गए थे। लेकिन वह प्रतिभाशाली भी हैं। वेद और शास्त्रों की ज्ञाता हैं। तमाम विषयों पर बहस और चर्चा करने में चतुर हैं। सुंदर और प्रतिभाशाली होने का उन्हें घमंड नहीं है। वह बहुत बहादुर भी हैं और पति को छुड़ाने जोखिम उठाकर महल से निकल पड़ती हैं।
तमाम पुरानी गाथाओं और काव्यों की नायिकाओं से पद्मिनी बिल्कुल अलग हैं। वह अपने पति की संगिनी हैं, हर तरह से उनका बराबरी का दर्जा है। रत्नसेन भी प्यार के जुनून में उनकी खोज में सब कुछ गंवाने के लिए तैयार होते हैं, लेकिन उन्हें पाने के बाद पत्नी बनी प्रेमिका के साथ उनके प्रेम संबंध के साथ आदर, बातचीत और चर्चा करने का चाव और एक मजबूत दोस्ती का अंदाज भी जुड़ जाता है। पद्मिनी का चित्रण और उनके साथ रत्नसेन का रिश्ता, ये दोनों ही चार सौ साल पहले के ही नहीं, बल्कि सदियों बाद भी अवधी और फिर हिंदी साहित्य में बिल्कुल ही अलग हैं।
जायसी कहते हैं, मैंने यह कहानी तैयार की, ताकि कुछ निशानी छोड़ जाऊं। अब रतनसेन जैसे राजा कहां हैं और हीरामन जैसा ज्ञान पैदा करने वाला तोता कहां है? अलाउद्दीन सुल्तान कहां है और उसे पद्मावती के बारे में बताने वाला राघव चेतन कहां है? और वह अति सुंदर पद्मावती भी कहां हैं? इन सबमें कोई नहीं रहा, बस रही कहानी। फूल सूख जाने के बाद भी सुगंध रह गई है। जायसी की वाणी में अवधी की सुगंध है; अवध की सोंधी मिट्टी की सुगंध है; अवध की गंगा-जमुनी तहजीब की सुगंध है।