सत्ता में रहने के दौरान राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी के साथ ही उनकी पार्टी मुस्लिम ब्रदरहुड सोचती थी कि उसने मिस्र की सेना को साध लिया है और शीर्ष जनरलों को बाहर जाने को मजबूर कर उनके उत्तराधिकारियों के साथ एक समझौते के करीब पहुंच रहे हैं, ताकि सशस्त्र बलों को सरकार की निगरानी के दायरे से अलग रखा जाए। मगर पिछले हफ्ते यह समझौता टूट गया।
बुधवार को राष्ट्रपति भवन के चारों ओर एवं सड़कों पर टैंकों और सैनिकों की तैनाती कर शीर्ष सैन्य अधिकारी जनरल अब्देल फतह अल सीसी ने बिना मुर्सी का नाम लिए ऐलान किया कि राष्ट्रपति को अपदस्थ कर संविधान को निलंबित कर दिया गया है।
इस तरह अपने पूर्ववर्ती होस्नी मुबारक की तरह मुर्सी भी इस सच से रू-ब-रू हो गए कि सेना को सिर्फ अपनी फिक्र है। यह कोई सैद्धांतिक नहीं, बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक कदम है। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन के मध्य-पूर्व विशेषज्ञ स्टीवन ए कुक बताते हैं कि मिस्र का सैन्य नेतृत्व किसी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक व्यवस्था में अपनी जगह बनाने में यकीन रखता है। इसके लिए वह किसी के भी साथ सौदा करने को तैयार है, लेकिन स्पष्ट है कि उसकी यह युक्ति अभी कामयाब नहीं हुई।
लोगों की इच्छा के नाम पर भले ही सेना राजनीति में अपने दखल को उचित ठहरा रही है, लेकिन लोकतंत्र के लिए उसने कभी जोर नहीं डाला। विश्लेषकों के मुताबिक, उसका प्राथमिक उद्देश्य है, राष्ट्रीय स्थिरता को बनाए रखना और मिस्र में अपने अक्षुण्ण विशेषाधिकार का संरक्षण करना। लेकिन जब लाखों लोग सड़कों पर राष्ट्रपति का विरोध कर रहे थे और ब्रदरहुड लगातार सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा था, उसी समय सेना ने मुर्सी को राष्ट्रपति पद से हटाने का फैसला किया।
सैन्य चेहरे के रूप में सीसी सामने आए, एक बहादुर अधिकारी, जिनका सीना मेडलों से सुसज्जित था और सिर पर एक टोपी थी। उन्होंने दोनों हाथों से डेस्क को थामकर राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता की बहाली है। कार्यवाहक नेता की घोषणा करते हुए उन्होंने सैन्य वर्चस्व के मुद्दे को दबा दिया। लेकिन सुलह और जख्मों पर मरहम लगाने वाले उनके शब्द इस वक्त की वास्तविकता को नहीं पलट सकते।
बीते ढाई वर्षों में यह दूसरा मौका है, जब सेना ने 'सिविलियन लीडर' को अपदस्थ किया। मगर इस बार सेना ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के जरिये निर्वाचित नेता को हटाया है। इस बर्खास्तगी ने मिस्र की सबसे शक्तिशाली संस्था के रूप में सशस्त्र बलों की हैसियत को रेखांकित किया है, बिल्कुल उसी तरह जैसे छह दशक पहले किंग फारूक का तख्तापलट कर और अब्दुल नासिर का मार्ग प्रशस्त कर उसने अपनी ताकत का इजहार किया था।
अरब जगत में मिस्र के पास सबसे बड़ी थल सेना है, जिसमें तकरीबन 4,50,000 जवान हैं। इनमें से अधिकांश तो जबरन भर्ती किए गए और निचले दर्जे के अधिकारी हैं, जिनके पास उन्नति के कम अवसर हैं। हालांकि दशकों से इसके दसियों हजार उच्च अधिकारियों ने अपने विशेषाधिकार की रक्षा की है। वे राज्य द्वारा पोषित अपने सामाजिक क्लबों, अस्पतालों, पार्कों एवं अन्य फायदों का उपभोग करते हुए एक विशिष्ट वर्ग के रूप में रह रहे हैं। उनमें से कई तो अपने पदों के कारण सरकारी ठेकों और व्यावसायिक सौदों के जरिये अमीर हो गए हैं। कुछ मामलों में यह ब्राह्मणवादी वंश व्यवस्था की तरह है, जिसमें पुत्र अपने पिता के पेशे को संभालता है और वे सभी एक बंद सामाजिक दायरे में रहते हैं।
2011 की क्रांति से पहले छह दशकों तक सेना के लोगों ने ही मिस्र पर शासन किया। तीन दशकों तक शासन करने वाले होस्नी मुबारक खुद भी वायुसेना के कमांडर थे और उन्होंने अपनी मर्जी से ही सेना को नियंत्रित किया। लेकिन उनके शासन के खिलाफ 18 दिनों के जनांदोलन के बाद सेना ने उन्हें सत्ता से हटाने का फैसला किया, क्योंकि देश की स्थिरता खतरे में थी। मुबारक का 'पालतू कुत्ता' कहे जाने वाले और उनके रक्षा मंत्री रहे फील्ड मार्शल मोहम्मद हुसैन तांतावी ने ही उन्हें बेदखल कर जेल में डाल दिया।
तख्तापलट के बाद तकरीबन एक वर्ष तक सेना ने मिस्र का शासन चलाया, पर सरकार की कमान सीधे हाथ में लेने से सैन्य अधिकारी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को लेकर जनता के आक्रोश के सीधे निशाने पर आ गए। सेना में अनेक लोग मुर्सी की इस्लामिक पृष्ठभूमि पर संदेह करते थे, क्योंकि क्रांति से पहले ब्रदरहुड को गैरकानूनी घोषित किया गया था। मगर उन्हीं लोगों ने पिछले वर्ष मुर्सी के सत्तासीन होने का स्वागत किया था और शासन की जवाबदेही से विदाई ली थी। मुर्सी ने भी सेना की दो मुख्य मांगें मान ली थीं। पहली मांग थी, मुबारक के शासन के दौरान किए गए अपराधों के लिए सैन्य अधिकारियों पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा और दूसरी थी, एक ऐसे संविधान का निर्माण, जिसमें सैन्य बजट को संसदीय निगरानी के दायरे से बाहर रखा जाए।
लेकिन आतंरिक संकट के बढ़ने के साथ ही सेना की धारणा बदलने लगी। अर्थव्यवस्था लगातार संकट में थी और ईंधन की कमी, विद्युत आपूर्ति की कमी के कारण जनाक्रोश बढ़ने लगा। सीसी ने कहा कि वह राष्ट्रपति के पास संकट को खत्म करने की कोशिश के लिए गए थे, लेकिन उन्हें बार-बार फटकारा गया। बहरहाल सीसी ने एक अनजान से जज को अंतरिम नेता घोषित कर दिया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया है कि उनके पास कितना अधिकार होगा या वही पर्दे के पीछे से देश को चलाएंगे।