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मलबों के नीचे दबी मानसिकता

Thu, 04 Jul 2013 08:44 PM IST
कुमार प्रशांत
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हादसे होते हैं और हादसों के मलबों में दबकर इतिहास बन जाते हैं। हादसे याद रहें और किसी जीवित संसार की तरह हमारे साथ चलते रहें, तो आदमी का जीना मुहाल हो जाए। उत्तराखंड का हादसा भी भुला दिया जाएगा। एक मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कह भी दिया है कि ऐसे हादसे में कितने मरे, गिनना असंभव है; दूसरे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कह दिया कि केदारनाथ मंदिर बनाने का काम गुजरात को सौंप दें, हम अत्याधुनिक-भव्य मंदिर बना देंगे।
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एक कह रहा है कि जो हुआ, उसे भूल जाओ और मैं जहां हूं, मुझे वहां बना रहने दो। दूसरा कह रहा है कि जो हुआ, उसे भूल जाओ और मैं जो अफीम बांट रहा हूं, उसका सेवन करो। फौजियों ने अपना असंभव-सा काम एकदम मूक रहकर पूरा कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे फौज को करना चाहिए था। अब जो बचा है वह मलबा है, हमारी सोच, व्यवहार और मानसिकता के छोटेपन का मलबा। यह कब कैसे साफ होगा, कोई कह नहीं सकता है।

राजनीतिक दलों में श्रेय हड़पने की और दूसरे को छोटा दिखाने की जो होड़ चली, वह कहीं अधिक दुर्गंधमय थी। सारे राहत अभियान का एक ही मकसद था कि वह जहां से चला, वहां एक अच्छा कार्यक्रम हो जाए, कुछ चेहरे सामने आ जाएं। एनजीओ नाम का जो नया प्राणी प्रकट हुआ है, उसने भी बहती गंगा में हाथ धोना सीख लिया है और दूसरों को सिखा रहा है। मेरी इस बात से कई लोग तुनक कर पूछेंगे- तो क्या राहत का कोई काम ही नहीं हुआ? हुआ, लेकिन जरूरत और क्षमता का 25 फीसदी।
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राहत और दान देने की एक ही कसौटी है, जो मदर टेरेसा के शब्दों में इस तरह सामने आती है- दो, लेकिन वहां से, जहां से देने में तुम्हारा अपना कुछ कम होता हो। और हादसे के शिकार लोगों की सेवा करने की एक ही कसौटी है, जो महात्मा गांधी ने कांग्रेस को तब सुझाया था, जब 1934 में बिहार में अभूतपूर्व भूकंप आया था। तब गांधी ने जेल में बंद राजेंद्र प्रसाद को अनुमति दी थी कि वह सत्याग्रही हैं फिर भी सरकार को जमानत की अर्जी दें और बिहार की पूरी कांग्रेस राहत कार्य के संचालन-संयोजन में लग जाए। उद्धार में उधार नहीं होना चाहिए और इसमें प्रातिनिधिक सेवा नहीं चलती है। जो भी हो नकद हो और जो भी करे खुद करे।

दलीय राजनीति और सत्ता की होड़ का यह कितना करुण व क्रूर चेहरा है कि नरेंद्र मोदी केदारनाथ से गुजराती तीर्थयात्रियों को निकालने के लिए अपना हेलीकॉप्टर लगाते हैं और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के तीर्थयात्रियों को निकालने की व्यवस्था करवाते हैं। शेक्सपीयर ने कभी सोचा नहीं होगा कि जिस एक शाइलॉक का पात्र रचने में उन्हें अपनी पूरी लेखकीय प्रतिभा लगा देनी पड़ी, सत्ता की राजनीति वैसे अनगिनत जीवित शाइलॉक बनाकर धर देगी। उत्तराखंड के मलबे के नीचे जिसे हमने दम तोड़ने के लिए छोड़ दिया, वह दूसरा कोई  नहीं हिंदुस्तान ही था।

यह हादसा प्राकृतिक था, क्योंकि प्रकृति के अपने नियम-कानून होते हैं और वह अपनी तरह से अपनी व्यवस्था में संतुलन बिठाती है। लेकिन प्राकृतिक घटनाओं को हमारे लोभ व छद्म ने भयंकरतम बना दिया है। उत्तराखंड का यह हादसा प्रकृति द्वारा एक बार फिर हमें यह समझाने की कोशिश है। हिमालय चाहिए, गंगा चाहिए, वहां की प्रदूषणमुक्त आबोहवा चाहिए, सरल निर्दोष जीवन शैली चाहिए, तो कृत्रिम सुविधाओं का आयोजन बहुत सीमित ही संभव है।

वह सीमित पर्याप्त होगा, अगर हम यह कर सकें। यह वैसी ही सच्चाई है, जैसी यह कि किसी महानगर की दौड़ती गाड़ियां और उड़ते विमान और पक्की सड़कें और जगमगाती बिजली की रोशनी और वातानुकूलित घर-दफ्तर और लिफ्ट-मालों का जंगल चाहिए, तो प्रदूषण दमघोंटू भीड़, गलाकाट स्पर्धा, अनिद्रा और तरह-तरह की अजनबी बीमारियां आदि आपको मिलेंगी ही। वे झूठे लोग हैं, जो कहते हैं कि हिमालय में विकास के लिए बड़े बांध और बड़ी विद्युत परियोजनाएं चाहिए। आपको यह सब चाहिए, क्योंकि आप महानगरों-नगरों की कृत्रिम चमक-दमक को बनाए रखने की विफल कोशिश में लगे हैं। इसी का नतीजा है कि महानगर का दम घुट रहा है और हिमालय जैसे क्षेत्रों का दम टूट रहा है।
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