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मच्छरों की फौज

Tue, 22 Sep 2015 08:01 PM IST
अनुज त्यागी
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आम आदमी हो या मच्छर, दोनों को मसले जाने का जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त है। दोनों ही इसे अपनी किस्मत मान चुके हैं। मच्छर को बस इतनी समझ नहीं थी कि वह कभी हाथी नहीं बन सकता। लेकिन आदमी की तैयारी पहले से ही आम से खास बनने की थी। आदमी तो आदमी ठहरा, सो दे दिया मच्छर को धोखा। आदमी जो कहता है, वैसा बिल्कुल नहीं होता है। देखते ही देखते, आम आदमी खास हो गया। एक पल के लिए भी उसके मन में यह नहीं आया कि खास बनने की इस यात्रा में वह मच्छर को भी साथ ले ले। सोचा होगा, एक मच्छर क्या बिगाड़ लेगा! ज्यादा चिल्ल-पों की, तो मसल दूंगा।
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मच्छर के मन में जहर भरा है, उसकी कुंठा अब गुबार में बदल चुकी है। अब वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है। जिगरी दोस्त से धोखे ने उसके दिल पर चोट की है। जिसके साथ वह कभी चलो दिलदार चलो गुनगुनाया करता था, उसी की दगाबाजी ने उसे दिलजला बना डाला। अपने दुर्दिन में दोनों आपस में अपना गम बांट लिया करते थे। जमाने से जमाना उसे मसलता रहा, इसका उसे जरा भी मलाल नहीं था। इस दोस्ती ने उसे मच्छर सोसाइटी में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। बिरादरी ने उसको नाले से बेदखल कर दिया है, गंदगी के आस-पास फटकने नहीं देते।

बात झुग्गी-झोपड़ी या रेलवे स्टेशन तक सीमित नहीं है। घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही, सब भूल जाते हैं अपना कल। आम आदमी को मच्छर की तरह से मसलने वाली मसलपावर के खिलाफ परिवर्तन की ताल ठोकी गई। बीते कल के दर्द को यादों में संजोया भी गया। परिवर्तन वालों ने भी वायदा निभाया, आम से खास में बदल गए। दर्द वालों ने जो दर्द संजोकर रखा था, उन्होंने भी बांट दिया।
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अब दर्द का बोझ उतारकर हल्के हो गए हैं। इतिहास से सीखा होगा कि अतीत को भूल आगे बढ़ने वालों का ही विकास हुआ है। डेंगू का आतंक अतीत को भूलने वालों के लिए एक सांकेतिक घंटी है। कहीं ऐसे मच्छरों की फौज न खड़ी हो जाए।
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