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सेनाध्यक्ष अकेले फैसला नहीं लेता

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वीवीआईपी अगस्ता-वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद में दलाली लेने वालों में पहली बार एक पूर्व वायुसेनाध्यक्ष का नाम जोड़ा जा रहा है। सवाल यह भी है कि इस दलाली के दायरे में कौन-कौन हैं? इन तमाम पहलुओं पर एयर वाइस मार्शल (रिटायर्ड) कपिल काक से वेदविलास उनियाल ने बात की:-
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:- क्या वेस्टलैंड सौदे की जरूरत थी? कहा जा रहा है कि इस कंपनी के लिए टेंडर नियमों में बदलाव किए गए।

:- हेलीकॉप्टर तो हमें चाहिए ही थे। पिछले चालीस वर्षों से वीवीआईपी के लिए हम एम 18 हेलीकॉप्टर का उपयोग कर रहे थे। केवल राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए ही नहीं, बाहरी देशों के अति विशिष्ट लोगों के आने पर भी ऐसे दक्ष हेलीकॉप्टर का उपयोग होता है। इस दौरान जिस तरह की परिस्थितियां बनी हैं, उसमें सुरक्षा का सवाल अहम है। अगर हम ये नहीं खरीदते, तो हमारे पास हेलीकाप्टर थे ही नहीं। रही बात नियम बदलने की, तो इसमें पूरी जांच के बाद ही तथ्य सामने आ सकते हैं।

:- इस सौदे पर शक इसलिए भी गहराता है, क्योंकि जिस वेस्टलैंड को अमेरिका ने महंगा होने के कारण नहीं खरीदा, उसे हमने खरीदने का फैसला किया?

:- इसे इस तरह नहीं देखना चाहिए। यह महंगाई का मुद्दा नहीं है। ओबामा ने अपनी जरूरतों के आधार पर इसे नहीं खरीदा। अपने यहां जब ऐसे हेलीकॉप्टर खरीदने की बात हुई, तब तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र ने चिट्ठी लिखी थी कि इस मामले में और भी कंपनियों को देखा जाना चाहिए।
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:- देश में पहली बार एक पूर्वसेनाध्यक्ष पर दलाली के आरोप लग रहे हैं। हालांकि एसपी त्यागी कहना है कि जब यह सौदा हुआ, तब वह सेना से अवकाश ले चुके थे। ऐसे मामलों में अंतिम फैसला आखिर कौन करता है?

:- इस तरह की डील अकेला कोई सेनाध्यक्ष नहीं करता। लगभग 15-20 वरिष्ठ नेता, रक्षा मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, वायुसेना अध्यक्ष, एसपीजी आदि के सलाह-मशविरे पर फैसला लिया जाता है। इसमें सबके दस्तखत होते हैं। जहां तक बात पूर्व सेनाध्यक्ष पर आक्षेप की बात है, तो उम्मीद है कि सीबीआई हर पहलू को ध्यान में रखकर पड़ताल करेगी। जरूरी यह भी है कि इटली की अदालत में चल रही कार्यवाही और भारत की जांच में समन्वय हो। यह मामला इसलिए भी जटिल है कि हेलीकॉप्टर खरीद की सौदेबाजी की प्रक्रिया बहुत लंबी चली। इस दौरान चार रक्षा मंत्री बदले और छह वायुसेनाध्यक्ष। सरकारें भी बदलीं।

:- सैन्य खरीद में दलाली और कमीशन की बात बार-बार सामने आती है। क्या दलाली सौदे का हिस्सा है?

:- बिल्कुल। जब छोटे-छोटे सौदों में कमीशन खाए जाते हैं, तब रक्षा सौदों में क्यों नहीं, जो बड़े फायदे के हैं। यह बात तो पूर्व वायुसेनाध्यक्ष भी स्वीकार कर रहे हैं कि उनसे कोई दलाल मिला था। यह मामला भी तो इटली की अदालत में उठा है। रिपोर्ट के 64 पन्नों से सनसनी फैल गई है।

:- भाजपा इसे दूसरा बोफोर्स बता रही है। आपके क्या विचार हैं?

:- बोफोर्स 64 करोड़ रुपये का था, यह हेलीकॉप्टर सौदा 3,600 करोड़ का है। बोफोर्स में हम जानकारी नहीं ले सकते थे। इसमें जानकारी मिल सकती है। वैसे पैसा कभी चेक से नहीं दिया जाता। वह अंदर का लेन-देन होता है, इसलिए नजर नहीं आता। फिर भी अगर दोनों देशों ने तह तक जाने की कोशिश की, तो जांच में कई बातें सामने आ सकती है। बोफोर्स मामले में तो साफ था कि कई चीजें बाहर नहीं आईं। इस मामले में भी ऐसी ही आशंका है। एक पक्ष दूसरे को दोषी ठहराने का प्रयास करता रहेगा। देखना यह है कि हमारी कौन-सी कड़ी कमजोर हुई है, या पूरी चेन ही टूटी हुई है।
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