एक विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक काशी में आनंदमयी मां के सत्संग के लिए पहुंचे। वहां चर्चा शुरू हुई कि मानव को शांति कैसे प्राप्त हो? एक विद्वान ने कहा, वर्तमान समय में लोग भौतिक सुख-सुविधाओं को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। अतः यदि भौतिक समृद्धि हो जाए, तो शांति मिलने लगेगी।
दर्शनशास्त्र के प्रवक्ता ने कहा, यदि समाज में शिक्षा और ज्ञान का प्रसार हो जाए, तो शांति मिल जाएगी। तीसरे विद्वान ने इसका प्रतिवाद करते हुए कहा, क्या सभी शिक्षित और ज्ञानी शांति प्राप्त कर लेते हैं? बड़े-बड़े विद्वान भी अशांत देखे जा सकते हैं। शांति उसे ही मिल सकती है, जिसके पास सभी तरह की सुख-सुविधा उपलब्ध हो।
आनंदमयी मां सभी की बातें ध्यानपूर्वक सुन रही थीं। उन्होंने कहा, शांति न भौतिक सुख-सुविधाओं से मिलती है, न ज्ञान-विज्ञान से। धन और सुविधाएं शारीरिक सुख तो दे सकतीं हैं, किंतु आत्मिक आनंद नहीं दे सकतीं। शांति और आनंद केवल संयम और संतोष से ही मिलते हैं। असीमित साधन उपलब्ध होने पर भी यदि जीवन में संतोष नहीं है, तो शांति कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। जिसने इंद्रियों पर, इच्छाओं पर नियंत्रण कर लिया, वही शांति का आनंद उठा सकता है। आनंदमयी मां के श्रीमुख से शांति प्राप्ति का उपाय सुनकर सभी की जिज्ञासाओं का समाधान हो गया।