यह केवल सैयद अली शाह गिलानी के ही बस की बात है कि दो दिन के भीतर दो तरह के आदर्शवाद की दुहाई दे बैठें। पहले तो उन्होंने कश्मीर घाटी के त्राल कस्बे के पास भारतीय सेना के एक कर्नल और पुलिस के एक हेड कांस्टेबल की हत्या करते हुए मारे गए आतंकवादी को एक ‘शहीद’ के रूप में श्रद्धांजलि देकर पूरे भारत में अपनी थू-थू करवाई। फिर दो दिन के भीतर ही उन्होंने पाकिस्तान में 60 शिया मुसलमानों की हत्या को लेकर इस्लामाबाद की लकीर पर वहां के सुन्नी तकफीरी और खुराजी मौलवियों पर 'आतंकवाद का मसाला तैयार करने वाले जाहिल' जैसा मुलम्मा भी चिपका दिया।
गिलानी साहब उस ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के कई धड़ों में से एक के अध्यक्ष हैं, जिसका गठन पाकिस्तान सरकार की पहल पर 1993 में कश्मीर पर भारत विरोधी 23 संगठनों को एकजुट करने के लिए किया गया था। यह संगठन कई बार टूट चुका है और आज इसके तीन मुख्य धड़े हैं, जिनमें से एक के नेता गिलानी हैं, दूसरे के मीरवाइज उमर फारूक और तीसरे के शबीर शाह हैं। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के यासीन मलिक अपनी दुकान सबसे अलग होकर चलाते हैं।
त्राल की घटना गिलानी और हुर्रियत के उन नेताओं के लिए खुदाई नेमत बनकर आई, जो विधानसभा चुनाव में भारी मतदान के बाद से अजीबो-गरीब मातमपुर्सी में फंसे हुए थे। कश्मीरी जनता ने हुर्रियत की चुनाव बहिष्कार की सारी अपीलों के बावजूद कड़ाके की सर्दी और बारिश की परवाह किए बिना विधानसभा के चुनावों में ऐसे उत्साह के साथ हिस्सा लिया कि सारे रिकॉर्ड टूट गए। जनता के इस तमाचे की झेंप मिटाने के लिए कश्मीरी नेताओं और दिल्ली में उनके पैरोकारों ने कहना शुरू किया कि कश्मीरी जनता नरेंद्र मोदी और भाजपा को कश्मीर से बाहर रखने के लिए इतने उत्साह के साथ वोटिंग कर रही है।
इस झूठ के पैर तब उखड़ गए, जब परिणामों के बाद चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चला कि कश्मीर घाटी में जिन नौ सीटों पर भाजपा ने अपने उम्मीदवार भी नहीं खड़े किए थे, उनमें से सात सीटों पर घाटी के वोटरों ने सबसे ज्यादा मतदान किया। कुछ साल पहले तक कश्मीर में हुर्रियत का आतंक इतना गहरा था कि सरकार और चुनाव आयोग के लिए वोटरों को पोलिंग बूथ तक लाना भी दूभर हो जाता था।
लेकिन आज ज्यादातर हुर्रियत धड़ों के नेताओं का प्रभाव क्षेत्र अपने कस्बे और मोहल्लों तक सीमित रह गया है। ये नेता आए दिन सुरक्षा बलों पर कश्मीरी युवकों की हत्या के आरोप लगाते हैं। लेकिन घाटी की जनता यह देखकर बहुत आहत है कि पिछले तीस साल से इनमें से एक भी नेता का बच्चा पुलिस गोली का शिकार नहीं हुआ। होता भी कैसे? ये नेता खुद पुलिस की सुरक्षा में सलामत रहते हैं और इनके बच्चे लंदन, न्यूयॉर्क और बंगलूरू में ऐश से रहते हैं। और अब घाटी से आने वाले संकेत बताते हैं कि फरवरी के मध्य से पहले ही वहां पीडीपी और भाजपा की साझा सरकार की संभावनाएं प्रबल हो चुकी हैं। यह सब पीडीपी नेतृत्व को हुर्रियत नेताओं के अनुरोध और चेतावनियों की शृंखला के बाद होने जा रहा है। ऐसे में दिल्ली और घाटी के बीच यह नया गठबंधन कश्मीर के अलगाववादियों, खासकर हुर्रियत के लिए एक नए संकट का संकेत है।