फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

मुद्दा : क्या भयमुक्त हैं हमारे विद्यालय, अगर नहीं तो मनोदैहिक विकार का शिकार हो सकते हैं बच्चे

रवींद्र कुमार मिश्र Published by: शिव शुक्ला Updated Wed, 04 Dec 2024 06:56 AM IST

सार

विद्यालयों में भयमुक्त माहौल न मिलने की वजह से बच्चे मनोदैहिक विकार ‘साइकोसोमेटिक डिसऑर्डर’ का शिकार हो सकते हैं।        
 
विज्ञापन
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला


दबाव या दंड के बजाय, उन्हें समझाने और मार्गदर्शन देने से उनके मानसिक और भावनात्मक विकास में सहायता मिलती है। किसी मानसिक दबाव, दंड से अक्सर बच्चों में डर, चिंता और नकारात्मक भावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं, जो उनके विकास को प्रभावित करती हैं। बच्चे मनोदैहिक विकार ‘साइकोसोमेटिक डिसऑर्डर’ का शिकार हो सकते हैं। वे मन ही मन खुद को अकेला मान लेते हैं, जो उनकी शारीरिक समस्याएं बढ़ने का कारण बन जाते हैं। 


बच्चों की दिनचर्या को देखें। ज्यादातर विद्यालय, जो लगभग सूर्योदय के साथ प्रारंभ होते हैं, वहां अभिभावक बच्चों को जगाते हैं। बच्चों की नींद पूरी होती नहीं। बच्चे हड़बड़ी में नित्य कर्म से निवृत्त होते हैं, तरोताजा होते या नहीं, एक गंभीर सवाल है। शहर हो या गांव, उन नौनिहालों की सोचिए, जो प्रतिदिन वाहनों में आवागमन करते हैं, लंबी यात्रा करते हैं, बसों में ऊंघते, कक्षा में ऊंघते बचपन के उन्मुक्त जीवन और खेलों से वंचित रहते हैं। स्कूल या प्ले-स्कूल में एक तय फॉर्मेट है, जहां बच्चों की उन्मुक्तता सीमित-सी है, एकरस, नीरस जैसी है, वाहन, पाठ्यक्रम और लर्निंग आउटकम से बंधी है। बचपन वाहन, पाठ्यक्रम, आउटकम और स्कूल के बीच बंधा हुआ है। यदि इसे मशीनीकरण की उपमा दी जाए, तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। बच्चे के सीखने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात लर्निंग आउटकम में समाहित हो जाती। समग्र प्रगति पत्र (होलिस्टिक प्रोग्रेस रिपोर्ट) एक अन्य आयाम है भय पैदा करने का।  


गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा को लेकर शिक्षा का अधिकार यानी आरटीई-2009 में बच्चों को बिना रोके अगली कक्षा में भेजने की व्यवस्था के पीछे समझ यह थी कि परीक्षा बच्चों पर दबाव बनाती है, छलनी का काम करती है, बच्चों में भय पैदा करती है और बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। प्रारंभिक कक्षाओं के स्तर पर परीक्षा इस बात की वजह नहीं बननी चाहिए कि बच्चे शिक्षा से जी चुराने लगें। एक दलील यह कि बच्चे सीख नहीं पा रहे हैं और आगे की कक्षाओं के परिणाम प्रभावित हो रहे हैं, शिक्षा का अधिकार अधिनियम में संशोधन के साथ यह विचार खारिज कर दिया गया। आउटकम मापने पर जोर दिया जाने लगा और सीखना-सिखाना, गतिविधि आधारित शिक्षण, आनंददायी शिक्षण, लर्निंग रिकवरी जैसे शब्दों के जाल में सिमट गया प्रतीत होता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम और नई शिक्षा नीति में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा स्थापित करने की बात है। विडंबना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी एक सपना बनी हुई है। इसे लेकर कई राज्यों में हलचल तो है, लेकिन यह असेसमेंट्स में सीमित-सा हो गया है।


अगर हम इस धारणा के साथ चलते हैं कि प्रत्येक बच्चा अलग है, प्रत्येक बच्चे के सीखने के तरीके भिन्न हो सकते हैं, होते हैं, और मनोवैज्ञानिक पक्ष कहता है कि सीखना भय रहित बेहतर होता है, तो फिर प्रतिपल असेसमेंट्स की कितनी आवश्यकता है? असेसमेंट के फलस्वरूप बच्चों और अभिभावकों पर हो रहे मानसिक दबाव का अध्ययन करना चाहिए। यह भी अध्ययन हो कि इसके आधार पर चलने वाले तथाकथित लर्निंग रिकवरी कार्यक्रम कितने वैज्ञानिक हैं और तीन से अधिक वर्ष से पढ़ाई में अच्छा नहीं करने वाले या पढ़ाई छोड़ देने वाले के लिए लर्निंग रिकवरी कार्यक्रम कितनी उपयुक्त रणनीति है? क्या तीन या उससे अधिक साल की कमी को छह महीने से एक साल में पूरा किया जा सकता है, विशेषकर बड़े बच्चों में?


बच्चों के साथ सावधानी बरतना और उन्हें प्यार, देखभाल और समझ प्रदान करना, सीखने के पर्याप्त अवसर देना महत्वपूर्ण है। यह केवल उनके भले के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी अधिक लाभकारी है। बच्चे अपने व्यवहार से सीखते हैं और यदि उन्हें सकारात्मक उदाहरण और सही मार्गदर्शन दिया जाता है, तो वे अपने अनुभवों से बेहतर समझ बना सकते हैं, सीख सकते हैं। बच्चे देश का भविष्य हैं, सामाजिक परिवर्तन के माध्यम हैं, यह कथनी और करनी, दोनों में परिलक्षित होनी चाहिए।  -लेखक भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय में मुख्य परामर्शदाता रहे हैं

विज्ञापन
विज्ञापन
Next