देश की युवा जनसांख्यिकी एवं युवा बेरोजगारी की चुनौतियों को देखते हुए यह मध्यम एवं लंबी अवधि के लिए जोखिम भरा है। विशेष रूप से, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े कृषि प्रधान राज्यों में इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। सुस्ती की हकीकत सरकारी व कॉरपोरेट डाटा में सभी क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग और कॉरपोरेट आय में स्पष्ट दिखाई दे रही है, जो एक अनुमान के अनुसार चार साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। शहरी मजदूरी में लगातार गिरावट से स्थिति और भी खराब हो रही है, जिसका असर उपभोग पर पड़ रहा है। हालांकि, आंकड़ों ने देश के मुद्रा प्रबंधक को बहुत बेचैन नहीं किया है। बीते नौ अक्तूबर को रिजर्व बैंक ने दर्ज किया कि पहली तिमाही में विकास धीमा था, लेकिन दावा किया कि दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि 7.2 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। यह अनुमान गलत साबित हुआ है।
वित्तीय वर्ष के छह महीने बीत चुके हैं और वर्ष की पहली छमाही में जीडीपी वृद्धि छह प्रतिशत है। जाहिर है, 7.2 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि के लक्ष्य के लिए जरूरी दर चुनौतीपूर्ण है। कम वृद्धि से रोजगार सृजन में कमी आती है और निवेश और खपत में बाधा आती है। सुस्ती के बारीक विवरण स्पष्ट हैं। 2023-24 की दूसरी तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र 14.3 प्रतिशत से गिरकर 2.2 प्रतिशत पर आ गया है; खनन क्षेत्र, जो पिछले साल 11.1 प्रतिशत पर था, सिकुड़ गया है। 3.5 प्रतिशत पर कृषि, विनिर्माण से अधिक तेजी से बढ़ रही है। हाल के वर्षों में भारत की कहानी सार्वजनिक निवेश से प्रेरित रही है। साल-दर-साल के आधार पर, सरकार का अंतिम उपभोग व्यय इस साल की दूसरी तिमाही में 14 प्रतिशत से घटकर 4.4 प्रतिशत हो गया है। सकल स्थिर पूंजी निर्माण, जो नए निवेश का संकेत है, 11.6 प्रतिशत से घटकर 5.4 प्रतिशत हो गया है। प्रभावी रूप से सरकारी व्यय कम है। निजी क्षेत्र का पूंजीगत व्यय धीमा है। निजी उपभोग कम है, क्योंकि जीवनयापन का खर्च और भर्ती व कैंपस प्लेसमेंट में कमी के कारण रोजगार की अनिश्चितता के चलते उपभोक्ता अपनी इच्छाओं और क्षमताओं के अनुसार उपभोग नहीं कर पाते। कुल मिलाकर, नतीजा यह है कि विकास की दर मुद्रास्फीति की दर से पीछे चल रही है। कहावत है कि पैसा ही आर्थिक गतिविधि, निवेश, रोजगार सृजन, आय और उपभोग को बढ़ावा देता है। व्यय, निवेश, आय और उपभोग में कमी विकास को नीचे खींच रही है। मुद्रास्फीति की राजनीति ने विकास को कम कर दिया है।
सरकारी खर्च कम होने के कई कारण बताए गए हैं-चुनावों से लेकर चरम मौसम की घटनाओं तक। जाहिर है कि तर्कों में दम है, भले ही आंशिक रूप से ही क्यों न हो। खराब शासन आर्थिक सुस्ती का मुख्य कारण है। विश्लेषकों ने बताया है कि राज्य सरकारों ने रियायतों पर जरूरत से ज्यादा खर्च किया है। आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि मुफ्त सुविधाओं के लिए इस्तेमाल किए गए राजस्व व्यय में वृद्धि हुई है और परियोजनाओं पर कम खर्च हुआ है। इंडिया रेटिंग्स की हालिया रिपोर्ट बताती है कि इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आवंटित 11.11 लाख करोड़ रुपये में से लगभग 62,000 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए जा सके। एक तरफ तो खर्च नहीं किया गया पैसा है, दूसरी तरफ पैसे की लागत है। निजी उपभोग 61 फीसदी से ज्यादा जीडीपी में योगदान करता है और मांग को बनाए रखने के लिए पैसे तक पहुंच और कीमत, दोनों मायने रखते हैं।
अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता रिजर्व बैंक की कार्रवाइयों का खामियाजा भुगत रहे हैं - माइक्रो फाइनेंस संस्थानों पर कार्रवाई, व्यक्तिगत ऋण और उच्च ब्याज दरों पर कार्रवाई। आरबीआई को बहुत-सी बातों का जवाब देना है : जीडीपी वृद्धि के लिए उसके पूर्वानुमान से लेकर मुद्रास्फीति लक्ष्यों तक। जनवरी में, आरबीआई ने तर्क दिया कि खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति उसके दायरे से बाहर है, और अगस्त में उसने तर्क दिया कि उसे इसे कम करना होगा। इस बीच, खाद्य मुद्रास्फीति 18 महीनों से औसतन सात प्रतिशत से ऊपर रही है। नवंबर में, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 6.2 प्रतिशत और खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति 10.9 प्रतिशत पर थी। खाद्य मुद्रास्फीति सीपीआई का 45 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है और सबसे गरीब लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। ब्याज दरों में कटौती की जरूरत पर खूब चर्चा हो रही है। इससे मांग को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन आर्थिक सुस्ती से निपटना ब्याज दरों में कटौती से कहीं अधिक जरूरी है।
भारत की अर्थव्यवस्था तत्काल संरचनात्मक सुधार की मांग करती है। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों को समायोजित करने के लिए परिवारों को अपने बजट में बदलाव करने के लिए बाध्य होना पड़ा है। उच्च ब्याज दरों ने कीमतों को कम नहीं होने दिया है। इसका कारण मौसम की अनिश्चितताओं और मनमानी नीतियों के अलावा उपलब्धता, भंडारण, वितरण और प्रसंस्करण की अपर्याप्तता है। अनिवार्य रूप से भारत को जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं और अनाज के लिए एक राष्ट्रीय ग्रिड की आवश्यकता है, जैसे दूध के लिए है। यह सीधे राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में है। रोजगार सृजन के लिए सक्रिय निवेश प्रोत्साहन जरूरी है।
यह कोई रहस्य नहीं है कि श्रम कानून व्यवसाय को बाधित करते हैं। वे कंपनियों को बड़ी संख्या में लोगों को काम पर रखने से भी रोकते हैं। फिर भी 2019 में तैयार नया श्रम कानून कई राज्यों ने नहीं अपनाया है। बोझिल और पुरानी विनियामक आवश्यकताओं और अनुपालनों को मिला लें, तो नए और पुराने व्यवसाय डरे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि राजनीतिक वर्ग को इन कमियों का पता नहीं है। इसका पता चुनावी क्षेत्र के नवाचार से मिलता है। कटु सच्चाई यह है कि चुनावी बीजगणित रोजगार और विकास की तुलना में करदाताओं को दी गई रियायतों का पक्षधर है। 1990 के दशक में बिल क्लिंटन 'इट्स द इकनॉमी, स्टुपिड' के नारे पर सत्ता में आए थे। भारतीय संदर्भ में, आर्थिक सुस्ती का मूल कारण राजनीति है!