अंतरिक्ष एजेंसियों की तैयारी
अंतरिक्ष एजेंसियां वर्ष 2030 तक मंगल ग्रह पर पहला मानव भेजने के लिए कार्य कर रही हैं। इंजीनियरों ने पहले ही चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने वाले यान को भेजने के लिए नए रॉकेट तैयार किए हैं। रॉकेट, चालक दल को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर भेजने में सक्षम होंगे। लेकिन अंतरिक्षयान को अपने अंतरग्रहीय उड़ान पथ पर विस्फोट करने के लिए एक अंतरिक्ष प्रणोदन प्रणाली की जरूरत पड़ेगी।
पृथ्वी से मंगल की यात्रा
पृथ्वी से मंगल तक की यह यात्रा सात से नौ महीने की होगी। आयन थ्रस्टर नाम का इंजन अंतरिक्षयान को बेहद कुशल और तेजी से चलाने के लिए प्लाज्मा व विद्युत चुंबकीय बलों का उपयोग कर सकता है। अगर कम ईंधन की जरूरत होती है, तो अंतरिक्ष यात्री भोजन, पानी व अन्य जरूरी सामग्री यान में ले जा सकते हैं, जिनकी मंगल ग्रह पर भविष्य में इन्सानी बस्तियों के लिए जरूरत पड़ेगी।
अंतरिक्ष यात्री मंगल पर पहुंचकर पूरे ग्रह का वैसे ही चक्कर लगाएंगे जैसे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी की कक्षा की परिक्रमा करता है। दल एक वाहन में मंगल की सतह पर उतरेगा, जिसे प्रवेश कैप्सूल कहते हैं। ग्रह के वायुमंडल में प्रवेश करने के बाद मंगल की सतह तक पहुंचने में इसे 10 मिनट से भी कम समय लगेगा। मंगल की दुर्गम सतह पर पहुंचकर चालक दल को दबावयुक्त और पर्यावरणीय नियंत्रित आवास में रहने की जरूरत होगी, क्योंकि मंगल का वातावरण पतला है, जो मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड से बना है, और सतह का तापमान बहुत ठंडा (-81 डिग्री फारेनहाइट) है।
अंतरिक्ष यात्रियों को करनी होंगी ये तैयारियां
इसके अलावा मंगल के पास पृथ्वी की तरह चुंबकीय क्षेत्र नहीं है। मंगल पर मानव बस्ती बसाने से पहले अंतरिक्ष यात्रियों को वहां पर खुद को जीवित रखने के लिए भोजन व पानी की व्यवस्था करनी होगी, जिसके लिए सब्जियां उगाने समेत ग्रीनहाउस का निर्माण और सोलर पैनल स्थापित करना होगा।
खैर, दुनिया भर के इंजीनियर जैसे-जैसे मंगल ग्रह पर उतरने के लिए जीवन सहायक प्रणालियों की तकनीकें विकसित कर रहे हैं, वैसे-वैसे इन्सान मंगल ग्रह पर कदम रखने के करीब तो पहुंच ही रहा है। मुमकिन है कि वे कदम आपके हों।