पर्यावरण बनाम विकास की बहस कभी खत्म न होने वाली लगती है। दोनों ही दर्जे के लोग अपनी-अपनी जिदों पर अड़े से लगते हैं। देश की कोई भी बड़ी योजना ऐसी नहीं, जिसमें इनमें तलवारें न खींच ली जाती हों। उत्तराखंड की ऑल वेदर रोड को ही देखिए, जो हमेशा से चर्चा में रही है।
इस महत्वाकांक्षी योजना में चारों धामों को एक सड़क से जोड़ने की कवायद की गई है और इसको जोड़ने के पीछे दो बड़े लक्ष्य माने गए हैं। एक बेहतर कनेक्टिविटी इन चारों धामों में यात्रियों की संख्या में इजाफा करेगी। आने वाले समय में इस तरह की सुविधाएं कई अन्य तरह के पर्यटन को भी जन्म देगी।
काफी हद तक तो सही भी है कि किसी भी तरह के पर्यटन में सबसे बड़ी भूमिका आवागमन की बेहतर सुविधाओं की होती है। शुरुआती दौर से ही इस योजना ने कई विरोध झेले हैं। ऑल वेदर रोड में जो वृक्षपातन हुआ और होना है, उनसे कई पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय सवाल भी खड़े होते हैं। ऐसे में पर्यावरणविद इसे विकास के नाम पर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ मानते हैं। और यही कारण है कि तमाम तरह के विवाद-चर्चा व जनहित याचिकाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश निर्गत कर एक समिति को इसकी जांच का जिम्मा तय किया।
ऑल वेदर रोड की बात हो या फिर देश के अन्य विकास कार्यों में होने वाली पर्यावरणीय क्षति की, पर्यावरणविदों के जहन में ऐसे सवाल कुलबुलाते रहते हैं। इनका सीधा विरोध सरकारों को झेलना पड़ता है और नुकसान भी उठाने पड़ते हैं। ऐसे मुद्दों पर सरकार की सबसे बड़ी कमी इसी रूप में देखी जा सकती है कि वह इस तरह की योजनाओं के निर्णयों से पहले कभी कोई बड़ी लोकचर्चा व सहमति नहीं जुटाती। ऑल वेदर रोड भी इसी तरह के विवादों में घिरी रही है, जब केंद्र की यह योजना राज्य सरकार के साथ जोड़कर शुरू की जा रही थी, तो इसकी घोषणा के साथ ही इसकी शुरुआत व संपन्न तारीखों का भी एलान कर दिया गया था।
इसके किसी भी पारिस्थितिकी पहलू पर कोई चर्चा नहीं हुई, जिससे पर्यावरणविदों को कष्ट हुआ व साथ में तेवर बिगड़ गए। सुप्रीम कोर्ट ने इसको अपने संज्ञान में लेकर एक कमेटी के गठन का आदेश दिया और इसके ऊपर एक रपट बनाने के भी आदेश दिए। सवाल यह है कि हम इस तरह की योजनाओं में किस तरह के रुख को अपनाएंगे? क्योंकि इनमें कहीं न कहीं बड़े लाभ के भी दावे होते हैं।
उत्तराखंड जैसा राज्य, जो आज 20 साल के बाद भी विकास के इंतजार में बैठा है, यहां कितनी ही योजनाओं को विवाद के कारण पीछे धकेल दिया जाता है। इन योजनाओं को राज्य की प्रगति के दृष्टिकोण से भी देखे जाने की कवायद होनी चाहिए। मसलन क्या पहाड़ों में सड़कों के निर्माण पर प्रतिबंध लग जाना चाहिए? अगर ऐसा है, तो क्या हम उन दूरदराज में बसे गांवों के प्रति न्याय कर पाएंगे, जो सड़कों के रास्ते ही विकास की राह जोहते हैं। उस पर्यावरण व प्रकृति के संरक्षण का क्या करें, जो हमें प्रागैतिहासिक या पाषाण युग में ले जाएं? ऐसे मामलों में हम सही दृष्टिकोण से नहीं देखते व दो वर्गों के बीच विवाद खड़ा कर देते है, वे जो विकास के पक्षधर हैं और एक जो किसी भी कीमत में पर्यावरण की क्षति झेल नहीं पाते है।
पहले वर्ग के लोग विकास के नारों में अंधे होकर विवेकपूर्ण समझ व वैज्ञानिक पहलुओं को दरकिनार कर प्रकृति को अनदेखा कर देते हैं। वहीं दूसरी तरफ प्रकृति व पर्यावरणविदों में प्रकृति प्रेम इस हद तक उमड़ पड़ता है कि वे घर-गांव के अन्य जटिल मुद्दे, जो कहीं इस तरह के विकास से जुड़े हैं, नकार देते हैं। कभी-कभी तो विरोध मुख्य मुद्दे से भटक कर अंहकार व अड़ियल पेचों पर अटक जाता है। ये दोनों वर्ग अपने आप में विवेकशीलता का परिचय नहीं दे पाते।
एक तरफ विकास न होने के लिए हम सरकारों को घेरते हैं और इनकी अदला-बदली कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। असल में हम दोहरे चरित्र के लोग हैं और अवसरवाद से ग्रसित हैं। जिन गांवों में सड़क नहीं पहुंची, वहां मोबाइल, टीवी व अन्य गैजेट को हमने स्वीकार लिया, बल्कि खुद भी प्रयोग करते हैं। ऐसे में अविवेकपूर्ण विरोध को कैसे न्यायपूर्ण ठहराया जा सकता है! आप देश के किसी भी कोने के किसी भी गांव की प्राथमिकता को जांचें, तो सड़क ही पहले नंबर पर है, क्योंकि इससे ही चलकर विकास को गांव तक पहुंचना है।
जहां आज तक सड़क नहीं पहुंची, वहां शहरों के सारे उत्पादों ने गांवों को बड़ा बाजार बना दिया। गांवों की आर्थिकी को घुन की तरह चाटते शहरी उत्पादों का विकल्प ढूंढने का रास्ता ढांचागत विकास व सड़क ही संभव है। आत्मनिर्भरता के नारे आज हम जरूर लगा रहे हैं, पर सच यह है कि हमने अपने गांवों को इस तरह ढांचागत रूप से तैयार ही नहीं किया कि वे शहरों और दुनिया के दूसरे हिस्सों के उत्पादों की टक्कर ले सकें।
दुनिया भर में अपने ही देश में पहाड़ व सड़क नहीं हैं, पूरे यूरोप और चीन में पहाड़ ही ज्यादा हैं। वहां दूरदराज तक सड़कों का निर्माण उनकी प्रगति का कारण बना है। मतलब हमारी विदेश घूमने की पहली चाहत या डेस्टिनेशन यूरोप ही है, जहां सड़कों का जाल बिछा है और यह भी स्वीकारना हमारी मजबूरी होगी कि वे ही हमेशा ज्यादा बड़े पर्यावरण व प्रकृति प्रेमी हैं। असल में अंतर एक ही है कि वहां किसी भी बड़े निर्माण के लिए जनसंवाद जरूरी है। और लोग बढ़-चढ कर हिस्सा भी लेते हैं। इसलिए वहां संतुलित पहल होती है। फिर वहां सभी योजनाएं पारिस्थितिकी केंद्रित भी होती हैं। हमारे यहां पहले ऐसे संवादों से हम गायब ही रहते है, या फिर सरकार चुपके से इन्हें निपटा लेती है।
विकास विनाशी नहीं होना चाहिए, पर अगर इसे होना ही नहीं हो, तो फिर सरकार, समाज, सुविधाओं व व्यवस्थाओं की जरूरत नहीं हैं। अब विरोधों का नहीं, विकल्पों का समय है। सरकार हम ही बनाते हैं, यह दूसरी दुनिया से नहीं आती। इस पर नैतिकता के साथ नए सिरे से संवाद करने की जरूरत है, जो एक पक्षीय न होकर प्रगति व विकास में अंतर को समझे व आवश्यकताओं को न नकारे और विलासिताओं को अनदेखा भी न करे, तभी हम संतुलित समझ वाले समाज बन पाएंगे।