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ब्रिटेन में एक अनूठा गठबंधन

Sun, 19 Apr 2015 06:08 PM IST
के. विक्रम राव
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अगले महीने सात मई को होने वाले ब्रिटिश संसदीय चुनाव इस बार ज्यादा अनोखे परिणाम दे सकते हैं। 2010 में हुए चुनाव ने पैंसठ वर्षों बाद गठबंधन सरकार बनी थी, जो अब भी चल रही है। यह एक सियासी अजूबा था, क्योंकि इसका गठन कंजरवेटिव (रूढ़िवादी) तथा लिबरल (उदारतावादी) पार्टी की साझेदारी से हुआ था। पर इस बार मिल रहे संकेतों से ब्रिटेन में एक अचरज भरा प्रयोग अनुमानित है। एक निखालिस आंचलिक दल स्कॉटिश नेशनल पार्टी सत्ता की देहरी पर दिख रही है। अपने देसी परिप्रेक्ष्य में देखें, तो मानो कभी तृणमूल कांग्रेस अथवा अन्नाद्रमुक लोकसभा में इतनी सीटें हासिल कर लें कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन जाएं। यानी ममता बनर्जी या एम. पनीरसेल्वम प्रधानमंत्री हो जाएं। हालांकि ऐसा हुआ है, जब जनता दल के एच डी देवगौड़ा और इंदर गुजराल कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री बने थे।
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ब्रिटेन की राजनीतिक स्थिति पर बड़ी सटीक बात कही मशहूर आर्थिक पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने, कि अभी देश में ढाई पार्टियां हैं, लेबर (श्रमिक) तथा कंजरवेटिव और तीसरे पायदान पर है लिबरल पार्टी। लेबर पार्टी की श्रमिकोन्मुखी और जनपक्षधर मगर खर्चीली अर्थ नीतियों से नाराज होकर पूंजीवादी वर्ग के हमदर्दों ने एक विरोधी मंच बना लिया था। फलस्वरूप लेबर अलग-थलग पड़ गई। अगले माह परिदृश्य बदल सकता है। विभिन्न मीडिया अनुमानों तथा सर्वेक्षणों से यही आसार दिख रहे हैं कि हाउस ऑफ कॉमन्स (निचले सदन) की साढ़े छह सौ सीटों में स्कॉटलैंड की क्षेत्रीय पार्टी स्कॉटिश नेशनल पार्टी (एसएनपी) करीब पचास सीटें जीत सकती है। अभी इस प्रांत से कुल 59 में केवल छह संसदीय सीटें इस पार्टी के पास हैं। ऐसा इसलिए कि लेबर पार्टी स्थानीय जनता का प्रीतिपात्र रही है।

जनपक्षधर नीतियां अपना कर लेबर पार्टी इस क्षेत्र में कंजरवेटिव पार्टी के पूंजीशाहों को पराजित करती रही। पर कुछ माह पूर्व लेबर पार्टी ने स्वतंत्र स्कॉटलैंड का समर्थन नहीं किया था। इस कारण एसएनपी का जनाधार बढ़ा है। यानी मई के चुनाव में लिबरल पार्टी ढुलकेगी, लेबर पार्टी की सीटें कमतर होंगी तथा कंजरवेटिव पार्टी बारीक अंतर से कई सीटें खो सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो स्कॉटिश नेशनल पार्टी की बैसाखी के बिना सरकार बन ही नहीं पाएगी।
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यहां गौरतलब यह है कि अगला राष्ट्रनायक यानी प्रधानमंत्री कौन बनेगा। अब विश्व भर में वोटर केवल प्रत्याशी को नहीं, वरन उनके प्रमुख नायक के नाम पर वोट देता है। इसका ताजा उदाहरण भारतीय लोकसभा निर्वाचन में गत मई में देखने को मिला। 'अबकी बार' का नारा बुलंद कर वोटरों ने मोदी की सरकार बनवाई। ब्रिटेन के मौजूदा प्रधानमंत्री डेविड कैमरन का दावा है कि वह 10, डाउनिंग स्ट्रीट (भारत के 7, रेसकोर्स रोड का ब्रिटिश रूप) के दोबारा निवासी बन जाएंगे। जबकि विपक्षी लेबर पार्टी के नेता एड मिलिबैंड का मानना है कि मतदाता अब कल्याणकारी सरकार चाहते हैं। मिलिबैंड में भारत की रुचि भी है। इनके अग्रज डेविड पिछली बार विदेश मंत्री थे, तो अमेठी के दौरे पर आए थे और सांसद राहुल गांधी के साथ सिमरा गांव में (16 जनवरी, 2009) दलित शिवकुमारी की झोपड़ी में रात गुजारी थी। हालांकि उसी दिन दलित मुख्यमंत्री मायावती लखनऊ में जन्मदिन समारोह में करोड़ों रुपये बहा रही थी।

मगर आम अनुमान यही लग रहा है कि स्कॉटिश नेशनल पार्टी की आकर्षक चौवालीस-वर्षीया नेता कुमारी निकोला फर्गुसन स्टर्जन साझा सरकार की प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार हैं। कम से कम प्रधानमंत्री कौन बने, यह निर्णय उन्हीं के अधिकार क्षेत्र में है। एक बिजली मजदूर की बेटी निकोला शिक्षा, स्वास्थ्य तथा न्याय के क्षेत्रों में कार्यरत रहीं और स्वतंत्र स्कॉटलैंड की समर्थक हैं। वह मानती हैं कि उनका प्रांत प्राकृतिक संसाधनों में अमीर है, फिर भी विपन्नता आसमान छू रही है। सोलह साल की आयु में राजनीति में आकर निकोला ने अपनी पार्टी का जनाधार व्यापक बनाया है।

यदि वह प्रधानमंत्री बनीं, तो मार्गरेट थैचर के बाद इस पद पर दूसरी महिला होंगी। उनकी राय में लोकतंत्र में साझा सरकार एक महान अवसर है विकास और परिवर्तन का। गत सप्ताह चुनाव पूर्व टीवी संवाद में सात दलों के नेताओं के साथ प्रतिस्पर्धा में निकोला को दर्शक झूमकर देख रहे थे। खुद निकोला ने कहा है कि इस बार का चुनाव अभूतपूर्व होगा। बस बाट जोहिए एक पखवाड़े की।
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