वह मार्च, 1996 का समय था, पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की अपने ही चुने राष्ट्रपति फारूक लेघारी द्वारा भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्तगी से आठ महीने पहले की घटना। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि प्रधानमंत्री कार्यालय से बोरिया-बिस्तर समेटने के दो महीने पहले एक हृदयविदारक खबर आएगी, जब सितंबर में उनके प्रिय भाई मुर्तजा भुट्टो को कराची स्थित उनके घर के बाहर ही हत्या कर दी जाएगी। नंगे पांव अस्पताल के गलियारे में इधर से उधर भागतीं और फिर उसकी मृत्यु के बाद जमीन पर बैठकर सुबकतीं प्रधानमंत्री की तस्वीर मैं भूल नहीं सकती। जिस दिन रावलपिंडी में खुद बेनजीर की हत्या हुई, उस दिन भी उनकी कई महिला समर्थक और मित्र उन्हीं की तरह उस अस्पताल के फर्श पर दहाड़ें मारकर रो रही थीं, जहां उन्हें लाया गया था।
खैर, मैं मार्च 1996 की घटना पर लौटती हूं। लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम का माहौल काफी खुशनुमा था। बेनजीर पाकिस्तान के रंग में थीं, यानी वह हरी कमीज पहने हुई थीं और उनके सिर पर सफेद फ्रेंच दुपट्टा था। दमकते हुए चेहरे और मुस्कराहट के साथ उन्होंने श्रीलंकाई कप्तान के हाथों में वर्ल्ड कप की ट्राफी सौंपी। पाकिस्तानी क्रिकेटप्रेमियों ने तेज आवाज के साथ श्रीलंकाई क्रिकेट खिलाड़ियों का खैरमकदम किया, क्योंकि वे काफी लोकप्रिय थे और उस समय उनकी दुनिया के कुछेक मित्रवत, विनम्र एवं बेहतरीन क्रिकेट टीम के रूप में सराहना की जाती थी। आखिरी के कुछ ओवर का मैच देखने के बाद बेनजीर ने कहा था, 'श्रीलंकाई खिलाड़ी मैदान पर और मैदान के बाहर भी काफी भद्र हैं।'
बीते हफ्ते दशकों बाद अतीत के मास्टर ब्लास्टर, पूर्व सिंहली क्रिकेटर और अब के राजनेता सनत तेरन जयसूर्या के साथ एक खूबसूरत मुलाकात हुई और मैंने उन्हें याद दिलाया कि बेनजीर भुट्टों ने उनकी टीम के लिए क्या कहा था। हमारी मुलाकात भारतीय उप उच्चायुक्त जेपी सिंह के घर डिनर पर हुई थी, जो यहां नए आए हैं, लेकिन राजधानी इस्लामाबाद में उनके पहले से ही काफी दोस्त हैं।
जयसूर्या पाकिस्तानी टेलीविजन के मेजबान के रूप में शहर में मौजूद थे, जहां श्रीलंका में चल रहे पाकिस्तान बनाम श्रीलंका क्रिकेट मैच की कमेंटरी के लिए उनकी काफी प्रशंसा हो रही थी। बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया कि मैदान पर उन्होंने इमरान खान और पाकिस्तान के कुछ बेहतरीन तेज गेंदबाजों का सामना किया है। जब उनसे भारतीय गेंदबाजों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, असल में जब मैं खेल रहा था, उस समय भारत में उतने तेज गेंदबाज नहीं थे।
युवा भारतीय वीजा काउंसलर जनेश ने मुझे बताया कि भारत में जयसूर्या एक बड़े हीरो हैं और इस्लामाबाद जैसे ऊंघते हुए शहर के विपरीत अगर वह भारतीय शहरों में सड़कों पर निकलते, तो जल्द ही एक बड़ी भीड़ से घिर जाते। ठीक तभी रावलपिंडी एक्सप्रेस शोएब अख्तर ने, जो अपनी घातक गेंदबाजी के लिए मशहूर हैं और दुनिया के सबसे तेज गेंदबाज माने जाते हैं, कमरे में प्रवेश कर जयसूर्या का अभिवादन किया। मैदान पर और मैदान से बाहर भी अपने खराब व्यवहार और अंतहीन विवादों के कारण हमेशा परेशान रहने वाले शोएब परिचय के समय उदास और गंभीर लग रहे थे।
आम तौर पर मुस्कराते रहने वाले शोएब महत्वपूर्ण विकेट लेने पर हवा में हाथ लहराते हुए हवाई जहाज की तरह मैदान में उड़ान भरते हैं। लेकिन उस समय उनकी छवि ठीक इसके विपरीत थी। एक मैच में उनकी गेंदबाजी की गति 161 मील प्रति घंटे से अधिक थी। उसे शायद ही कोई भूल सकता है! मुझे यकीन है कि पाठक 1999 के उस मैच को नहीं भूले होंगे, जब शोएब ने कोलकाता में आठ विकेट लिए थे, और उन्होंने अपनी पहली गेंद में भारत के सदाबहार नायक सचिन तेंदुलकर और दूसरी गेंद में लोकप्रिय कप्तान राहुल द्रविड़ का विकेट लिया था। तेंदुलकर ने पहली बार शोएब अख्तर का सामना किया था और पहली ही गेंद पर उन्हें ड्रेसिंग रूम लौट जाना पड़ा था।
चर्चित शायरा किश्वर नाहीद जल्दी ही पार्टी से चली गई थीं, लेकिन जब मैंने बाद में उन्हें बताया कि पार्टी में शोएब भी आए थे, तो उनका जवाब था, वह बेहद डरावनी शख्सियत हैं और मैं उसे जरा भी पसंद नहीं करती। अगर वह मेरे सामने आते, तो मैं वहां से निकल जाती।
जैसे ही शोएब अन्य मेहमानों का अभिवादन करने गए, मैंने जयसूर्या से पूछा कि क्या उन्होंने कभी आपको मैदान पर परेशान किया है। उन्होंने कहा, 'कई बार। कोई भी परेशान हो सकता है, क्योंकि शोएब की गति इतनी तेज होती है कि आप कभी नहीं जान सकते कि गेंद कहां गिरेगी! आपको अपनी नजरें हमेशा गेंद पर टिकाए रखनी होती हैं, क्योंकि उनकी तेज गति और बाउंसर, दोनों बेहद खतरनाक होते हैं।' जयसूर्या युवा पाकिस्तानियों के बीच भी बेहद चर्चित हैं। वह अभी श्रीलंका के प्रांतीय परिषद और क्षेत्रीय विकास राज्य मंत्री हैं। उन्होंने बताया कि 'मैं तीस वर्षों के बाद जाफना गया था और वहां काफी बदलाव हुआ है। राजनीतिक रूप से श्रीलंका में चीजें बेहतर हुई हैं।'
कुछ समय पहले श्रीलंका में जब पाकिस्तान खेल रहा था, तब वहां उपद्रवी भीड़ ने उत्पात मचाया था। इस बारे में जब मैंने पूछा, तो उस प्रतिष्ठित खिलाड़ी ने कहा कि श्रीलंका में एक नई प्रवृत्ति उभर रही है। पाकिस्तान जब श्रीलंका में खेलता है, तब सभी श्रीलंकाई मुसलमान पाकिस्तान का समर्थन करते हैं, और जब पाकिस्तान जीत जाता है, तो स्टेडियम के बाहर वे स्वाभाविक रूप से अपने मुल्क का समर्थन करने वाले श्रीलंकाइयों से झगड़ा करते हैं।
यह वाकई अफसोस की बात है। सभी दर्शकों को दुनिया के इस सबसे महान खेल से मजहब को सख्ती से अलग रखना चाहिए, क्योंकि हममे से कइयों के लिए क्रिकेट अपने-आप में एक मजहब है और क्रिकेटरों के लिए तो पिच ही देवता हैं!
-लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं