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अहिंसक आंदोलनों का दौर

भारत डोगरा Published by: Raman Singh Updated Tue, 18 Feb 2020 07:38 PM IST
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भारत डोगरा - फोटो : a

हाल के समय में देश-दुनिया, दोनों ही स्तरों पर अहिंसक आंदोलनों में उभार आया है। पिछले साल की ही बात करें, तो बोलिविया, चिली, लेबनान, इक्वाडोर, अर्जेंटीना, हांगकांग, इराक, ब्रिटेन आदि देशों में विभिन्न जनहितकारी मुद्दों पर अहिंसक आंदोलन देखे गए।



उदाहरण के लिए, बोलिविया में लंबे समय से राष्ट्रपति रहे इवो मोरालेस को अपने खिलाफ व्यापक जनांदोलन को देखते हुए इस्तीफा देना पड़ा। बोलिविया की तरह सूडान और अल्जीरिया में भी सड़कों पर उतरी जनता ने तानाशाहों को गद्दी से उतरने के लिए मजबूर कर दिया। अपने यहां सीएए और एनआरसी के खिलाफ जगह-जगह हुए और चल रहे अहिंसक आंदोलन भी इसका उदाहरण हैं। इनका स्वागत होना चाहिए। विश्व में अमन-शांति की जरूरत सदा रही है, लेकिन हाल के समय में वह जरूरत किसी भी अन्य दौर की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गई है। इसका एक प्रमुख कारण है हथियारों की बढ़ती विध्वंसक शक्ति। इस वजह से युद्ध भी पहले से कहीं अधिक विध्वंसक हो गए हैं। दो परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच मात्र दो-तीन दिनों के सीमित युद्ध से भी दो विश्व युद्धों से अधिक क्षति हो सकती है। बड़ी पर्यावरण समस्याओं के समाधान की खातिर विश्व स्तर पर सहयोग बढ़ाने के लिए भी जरूरी है कि युद्ध की आशंका न्यूनतम हो।


युद्ध की आशंका कम करने का दायित्व प्रायः उच्च नेतृत्व स्तर पर थोप दिया जाता रहा है। समाज उसी से शांति स्थापित करने की अपेक्षा करता है। लेकिन अब समय आ गया है कि जमीनी स्तर पर अहिंसा और भाईचारे के लिए काम किया जाए। हमारे आसपास के माहौल में बहुत सी हिंसा बिखरी हुई है, जिसकी अभिव्यक्ति कभी महिला-विरोधी हिंसा में होती है, तो कभी बच्चों पर हिंसा में, तो कभी दंगों में होती है। अन्याय और विषमता से ही बहुत सी हिंसा आरंभ होती है और इस तरह यह दोनों अति महत्त्वपूर्ण मुद्दे आपस में जुड़े हुए भी हैं। हाल के दौर में दुनिया के अलग-अलग देशों में लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद की, तो उसकी वजह शासकों की अन्याय और विषमतापूर्ण नीतियां ही थीं।


इस स्थिति में यदि विभिन्न स्तरों पर बहुत से अहिंसा व अमन के प्रयास निरंतरता से किए जाएं, तो इससे हिंसा को कम करने में बहुत मदद मिलेगी। विभिन्न समाजों में जो सांप्रदायिक, क्षेत्रीय, जातीय व नस्लीय हिंसा होती है, वह मनुष्य की आंतरिक हिंसा से कई स्तरों पर मिलकर कई बार अंतरराष्ट्रीय तनावों और युद्धों का कारण भी बनती है। विशेषकर दो पड़ोसी देशों में प्रायः दोनों ओर से इस तरह की पृष्ठभूमि बनती है कि स्थिति युद्ध या झगड़ों की ओर जाती है। जमीनी और बुनियादी स्तर पर निरंतर अमन व अहिंसा के प्रयास व प्रयोग होंगे, तो इससे युद्ध की आशंका कम करने और अंतरराष्ट्रीय अमन-शांति की संभावना को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी।


विश्व शांति केवल विश्व के बड़े नेतृत्व का मुद्दा नहीं है। अपितु यदि जमीनी स्तर पर अहिंसा और अमन के प्रयास होंगे, तो इससे भी विश्व शांति की संभावना और बुनियाद मजबूत होती है। हालांकि इस तरह के अनेक सार्थक प्रयास हमारे देश में समय-समय पर होते रहे हैं। लेकिन समाज पर इनका बहुत टिकाऊ असर नहीं हो पाता, क्योंकि इनमें समग्रता, निरंतरता और व्यापकता का अभाव है। इस तरह के प्रयास यदि समग्रता, निरंतरता व व्यापकता से हों, तो दुनिया भर में हिंसा कम करने में मदद मिलेगी।

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