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शुरुआत कब होगी

Tue, 30 May 2017 02:23 PM IST
चंद्रभान प्रसाद
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चंद्रभान
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वर्तमान अमेरिका का जन्म आधुनिक इतिहास की महानतम घटनाओं में से है। आज से चार सौ सात साल पहले करीब दो दर्जन यूरोपीय लोगों ने पूर्वी अमेरिका में , जिसे जेम्सटाउन के नाम से जाना गया, स्थायी तौर पर बसने के लिए झोपड़ियां  डाली थीं। ध्यान रहें, ईस्ट इंडिया का गठन वर्ष 1600 में हुआ था। यानी अमेरिका का जन्म ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद हुआ।
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दौलत, विज्ञान, तकनीक एवं सैन्य ताकत के प्रतीक वर्तमान अमेरिका ने अपने जन्म के साथ ही दुख, क्रूरता और अन्याय की भी एक दास्तान लिख डाली। वर्ष 1619 में अश्वेत दासों से भरा पहला जहाज जेम्सटाउन पहुंचा।

फिर तो दासों का अमेरिका पहुंचना जारी रहा। वर्ष 1617 में दास प्रथा की शुरुआत के साथ करीब डेढ़ करोड़ अश्वेतों को वर्तमान पश्चिमी अफ्रीका से खरीद कर अमेरिका भेजा गया। यह सिलसिला वर्ष 1807 तक चलता रहा। अमेरिका में दास प्रथा 1863 में कानूनी तौर पर समाप्त कर दी गई।
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दास प्रथा के दौरान अश्वेतों के साथ जो क्रूरतापूर्ण व्यवहार किए गए, उसकी मिसाल कम ही मिलती है।  जिन जहाजों पर अश्वेत दासों को लोहे  की जंजीरों से बांधकर रखा जाता था, उन्हीं जहाजों पर बाइबिल भी होती थी और ईसा मसीह के संदेश भी सुनाए जातें थे।  यूरोप  और अमेरिका के चर्च इस क्रूरता पर मौन थे। अमेरिका में तमाम गिरजाघरों को दासों के व्यापार से हुए मुनाफे से बनाया जाता  था।

दास प्रथा के दौरान मानवता को शर्मसार कर देने वाले ईसाइयों का जमीर हालांकि बाद में जगा। वर्ष 1985 में पोप जॉन पाल द्धितीय ने दास प्रथा के लिए अश्वेतों  से माफी मांगी थी। वर्ष 2006 में  द चर्च ऑफ इंग्लैड  ने भी इसके लिए माफी मांगी। माफीनामे की खबरें वहां से आज भी आती रहती हैं। कुछ श्वेत अमेरिकी तो दास प्रथा के प्रति पश्चाताप के लिए स्वयं को बेड़ियों से जकड़ लेते हैं।

भारत में भी अमेरिका जैसी कुछ समस्याएं हैं। यदि अमेरिका दास व्यापार, दास प्रथा तथा रंगभेद से जर्जर था, तो भारत जाति-व्यवस्था, जातिवाद, तथा छुआछूत से जर्जर है। कुछ शहरी भारतीय समझते हैं कि जातिवाद तथा छूआछूत अतीत की बातें हैं, अब सब ठीक हो गया है। यहां कुछ घटनाओं का जिक्र जरूरी है।

इसी साल 26 अप्रैल को मध्य प्रदेश के मानागांव के दलित सुबह उठते ही आश्चर्य में डूब गए थे, क्योंकि पेयजल के उनके एकमात्र स्रोत कुएं में सवर्णों ने रात के अंधेरे में किरासन तेल डाल दिया था। नतीजतन पानी प्रदूषित हो चुका था। इस हरकत का कारण भी था। दरअसल दो दिन पहले उसी गांव की एक दलित बेटी की शादी हुई थी। लड़की के पिता ने एक बैंड  पार्टी बुक की थी। गांव के सवर्णों तक खबर पहुंची, तो धमकियां आनी शुरू हो गई। दलित परिवार ने मुख्यमंत्री ऑफिस में गुहार लगाई। स्थानीय पुलिस ने  बारातियों को सुरक्षा प्रदान की। कोई अप्रिय घटना नहीं घटी, बल्कि एक नया इतिहास बन गया। पहली बार दलित उस संगीत का आनंद ले सके, जिस पर सवर्णों का ही अधिकार हुआ करता था।

इसी साल 22 अप्रैल को राजस्थान के हिंडोली  थाना क्षेत्र में तनाव पैदा हो गया। खतरे को भांप  प्रशासन हरकत में आया। भारी पुलिस बंदोबस्त के चलते गांव में  पहली बार एक दलित दूल्हा घोड़े की सवारी कर सका। हालांकि हरियाणा में हिसार के  धानी-रिवासा गांव का दलित दूल्हा उतना भाग्यशाली नहीं रहा। घोड़े की सवारी कर रहे दूल्हे एवं बारातियों पर सवर्णों ने हमले कर दिए। पुलिस पहुंची और घायलों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

इन तमाम घटनाओं में दलितों का क्या दोष था? यह चिंतन करने का विषय है कि सवर्णों ने इस तरह की जाति-व्यवस्था बना रखी है कि दलितों को तलवार जैसी नुकीली मूंछ रखने तक का अधिकार नहीं था। इसी साल जनवरी में जौनपुर के लोहरागांव के एक दलित रघुनाथ ने इस लेखक को बताया कि  आपातकाल के दौरान उनके पिताजी ने नुकीली मूंछ उगानी शुरू कर दी थी। बात सवर्ण जमींदार तक पहुंची, तो उन्होंने धमकी दी कि आपातकाल खत्म होते ही तुम्हारी मूंछ मुड़वा दूंगा। यानी आपातकाल के दौरान दलितों को थोड़ी राहत मिल गई थी। अलवर के मिलकपुर गांव के दलित चिरंजी कहते हैं,  दलितों को नए कपड़े पहनने का अधिकार नहीं था, ऐसे में नुकीली मूंछ रखने का सवाल ही कहां उठता था।

अमेरिका में ईसाइयों तथा अश्वेतों की कहानी के समानांतर भारत में सवर्णों बनाम दलितों की कहानी को रख दें, तो फर्क समझ में आ जाएगा। सहारनपुर के एक गांव घड़कौली में एक दलित जाति ने खुद को ग्रेट बताते हुए एक साइनबोर्ड लगाया है, जिस पर  सवर्ण समाज क्षुब्ध है। अमेरिका में बीती सदी के साठ के दशक में एक बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा हो गया था, जिसकी टैग लाइन थी-ब्लैक इज ब्यूटीफुल। उस पर अमेरिका के श्वेत समाज ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि  समर्थन में तालियां बजाईं। वह नारा दक्षिण अफ्रीका तक आ गया और वस्तुतः पूरी अश्वेत दुनिया तक पहुंच गया।

अब यह मत पूछें कि दलित जाति ग्रेट कैसे है। यह जाति मेहनत की कमाई खाती है, तमाम अभावों के बावजूद इस जाति के लोग भिक्षावृत्ति नहीं करते। इस जाति ने तमाम लड़ाइयां लड़ी हैं। गुरु रविदास ने हिंदुत्व के गढ़ काशी में ब्राह्मण विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। द्वितीय विश्वयुद्ध में इस जाति की रेजीमेंट ने हिटलर की सेनाओं के छक्के छुड़ा दिए थे।

श्वेत ईसाई दास घृणित दास प्रथा के लिए अश्वेत समाज से माफी मांग चुके हैं। पाप और पुण्य में विश्वास करने वाला सवर्ण समाज दलितों के प्रति कब खेद प्रकट करेगा? अमेरिकी  ने ब्लैक इज ब्यूटीफुल जैसे सामाजिक आंदोलन का साथ दिया था। दलित समाज अपनी पहचान के लिए जो आंदोलन कर रहा है, देखना है कि उसमें उसे सवर्ण समाज का कितना साथ मिलता है।
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