नरेंद्र मोदी के हर काम में आनंद भाव देखने वालों को बौद्धिकता के पुराने खिलाड़ियों ने सोशल मीडिया के जरिये संज्ञा दी है - 'भक्त'! यह भक्त, अब टॉप ब्रांड में तब्दील होने के लिए अपनी कोर वैल्यू को रिसाइकल कर रहा है। उसने अब तक एकतरफा चल रहे विमर्श को बुरी तरह हिला दिया है। लिहाजा, या तो राष्ट्रवाद को बौद्धिक गाली की तरह उछाला जा रहा है, या फिर पगड़ी की तरह पहना जा रहा है। स्थायी विचार पर पुनर्विचार का यह विकट अवसर, बिलाशक मोदी की वजह से उपस्थित हुआ है।
नरेंद्र मोदी ने मध्य वाम की राजनीति को झकझोरते हुए कुछ गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इसी वजह से उनके सत्ता में तीन साल खासी उत्तेजना के साथ देखे जा रहे हैं।
दक्षिणपंथ की समस्या यह है कि उसके यहां बौद्धिक तर्कशास्त्रियों का अकाल है, जबकि वामपंथ का हिसाब इससे ठीक उलट है। वहां तर्कों का, सपनों के साथ करिश्माई संबंध स्थापित किया जाता है। भारत में पूंजीवादी-समाजवाद का दिलचस्प संस्करण तैयार हुआ है। इसमें इस हद तक लचीलापन है कि सुविधा के हिसाब से सत्ता में साझीदार बदल जाते हैं, मगर तर्क की मूंछ ऊंची फरफराती रहती है। कहने को उत्तर प्रदेश की पार्टी, जातिविहीन समाज के स्वप्नदर्शी लोहिया के भरोसे समाजवादी है, लेकिन जाति विशेष का खानदानी हुक्का गुड़गुड़ाता रहता है। भाजपा के दोस्त नीतीश कुमार, चुनाव लड़ने से रोके जा चुके लालू के साथ सरकार बना लेते हैं, तो सब कुछ स्पष्ट होते हुए भी जाति की गोलबंदी के बजाय इसे सांप्रदायिकता के विरुद्ध जीत की तरह चलाया जा सकता है। इसी गोलमाल में याकूब मेमन, अफजल, कसाब, कश्मीर, गोधरा, अहमदाबाद घोंट कर पिला दिए जाते हैं। अकेले साम्यवादी, जो राजनीतिक रूप से चाहे जिस स्थिति में हों, कभी खोखली पड़ चुकी कांग्रेस के भरोसे या दक्षिणपंथी बहुसंख्यक कट्टरता विरुद्ध अपने स्थायी कार्यक्रम के आते-जाते साथियों के चलते बौद्धिक माहौल बनाए रखते हैं। यह ऊर्जा खास तरह के राइडर का काम भी करती है। (हालांकि कुछ लोग, भारतीय मानस में कबीर के दोहों से राम को अलग नहीं किया जा सकता, यह बात भी बड़ी देर के बाद समझने को राजी हुए।) भ्रष्टाचार और परिवारवाद के साथ व्यवस्थित लाभार्थियों के जाल के चलते जर्जर होती कांग्रेस ने इसे अपने लिए हमेशा उत्तम अवसर माना। उसके एक मुख्यमंत्री तो इतने निपुण थे कि उन्होंने दो संस्कृति प्रेमी आईएएस अफसर लगाए। एक कलावादी खेमे को संभालता था। दूसरा कलावादियों के घोर जनविरोधी रूप पर क्रुद्ध प्रगतिशील साथियों से राब्ता बनाता था। इस तरह रामनवमी भी मन जाती थी और जनवादी शक्तियों को प्रणाम भी हो जाता।
यह राजनीतिक परिदृश्य, आम आदमी की मूलदशा पर पैंतरेबाजी के लिए तब तक उत्तम रहा, जब तक कि कुछ सयानों ने सिद्धांतों के नाम पर वोटों की चालाकियों का प्रमेय खुद सिद्ध न कर लिया। वी पी सिंह के मंडल ने अल्पसंख्यकों-पिछड़ों के राजनीतिक समूह की आकांक्षाओं को रूप दे दिया और कांग्रेस, 'यूपीए' में बदलकर रह गई। पर उसकी अदा मध्य-वाम के नाम पर चल रही राजनीति के खून में उतर गई। वह सत्ता की संभावनाओं के हिसाब से बदल-बदलकर भिन्न रूपों में पैंतरे दिखाती रही है। भाजपा के पास भारतीय राजनीतिक और सामाजिक इतिहास की प्रमुख घटनाओं का ऐसा परिप्रेक्ष्य था, जो सुस्पष्ट, सुविचारित और लक्ष्यबद्ध परंपरा की रंगत से संयुक्त था। समय के साथ उसके वैचारिक विरोधियों ने, खुद के अंतर्विरोधों से उसे स्वयमेव प्रासंगिक बना दिया। मोदी ने मध्यवर्गीय राजनीति के खांटी भारतीय चरित्र को पहचाना और बारीकी से उस आत्मा का आह्वान किया, जो 'कल्याणकारी राज्य' के भव्य अतीत की स्मृतियों को भी जागृत करती थी। सिर झुकाकर आसमान की ओर देखने की मुद्रा का नया अनुभव रचती थी।
इसने अपनी प्रासंगिकता साबित कर दी है और इसी वजह से कई लोगों में अप्रासंगिक होने का भय भर दिया है। वह शुद्ध दक्षिणपंथ की स्थापना नहीं है। न यह कॉरपोरेटों की कोई नई सत्ता है। (जो अंबानी-अडाणी की दुहाई देते हैं, वे बेहतर जानते हैं कि कांग्रेस को अपनी दुकान इनमें से ही एक ने बताया था।) दरअसल यह पस्त पड़े, निराश, एकतरफा तर्कों तथा अनंत भ्रष्टाचारों के बावजूद बौद्धिक वैभव से हड़काए जा रहे त्रस्त तंत्र का प्रतिकार मात्र है।
हां, इस अवसर को नरेंद्र मोदी ने रणनीतिक कौशल से अपनी शक्ति में बदल लिया है। चूंकि कथित मध्य-दक्षिण की यह पहली पूर्ण सत्ता का अवसर था, इसलिए घर्षण बहुत है। तीन सालों में नई योजनाओं, जोखिम लेने वाले फैसलों तथा अचानक हैरत में डाल देने वाली मुद्राओं का विरोधियों पर लगभग 'आतंक' है। घोटालों के न होने तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई गति दिखाई देने से यह शक्ति बढ़ी है। यदि यह दौर कायम नहीं रहा, तो 'दक्षिणपंथ' की कथित कामना का यह आखिरी दौर होगा।
पर यही बात मोदी विरोधियों को खाए जा रही है। यदि यह आभा मौजूदा सत्ता कायम रख पाती है, तो क्या होगा? क्या दक्षिणपंथ पूर्णकाम हो जाएगा? इसका उत्तर उनके खुद के अतीत और वर्तमान में है। वे महज प्रशांतकिशोर की अदला-बदली से क्रांति प्रकट नहीं कर सकते।
आरती और विलाप के बीच, अब इस्लामी राजनीति, दलित उद्वेलन और जातीय ध्रुवीकरण का तेज मसाला तैयार होगा। यह बड़ी परखी हुई रसोई-प्रक्रिया है। मोदी को बस इसी की काट चाहिए।
उसके लिए मित्रो, अभी इंतजार करना होगा।