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मौसम: बेजुबान जानवरों की भी फिक्र हो, वन्यजीव अभयारण्यों के भीतर जल स्रोतों का निर्माण और रखरखाव जरूरी

जयसिंह रावत
Updated Fri, 21 Jun 2024 06:36 AM IST

सार

पारे के 50 डिग्री छूते ही मनुष्य तो एसी-कूलर के सहारे काम चला रहा है, लेकिन ऐतिहासिक गर्मी वन्यजीवों के लिए काल बनी हुई है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : एएनआई


इस साल दिल्ली कुछ इलाकों में अधिकतम तापमान 50 डिग्री के पार पहुंच चुका है। राजस्थान में बीएसएफ के एक जवान द्वारा रेत में पापड़ तलने का वायरल वीडियो सारे देश ने देखा। सेंटर फॉर सांइस ऐंड एन्वॉयरनमेंट(सीएसई) के अनुमान के अनुसार, गर्मी से जून की शुरुआत तक देश में कम से कम 219 लोगों की मौत हो गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ये गर्म लहरें अब लंबी, तीव्र और लगातार होती जाएंगी। ये विकट परिस्थितियां वन्यजीवों तथा पादप प्रजातियों के लिए भी समान रूप से घातक हैं। भारत एक उष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्र है, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। यह स्थिति निरंतर गहरा रही है। असहनीय गर्मी से मनुष्यों के साथ ही जीव-जंतुओं की मौतें भी बढ़ रही हैं। हिमालय से लेकर महासागर तक विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार की जीव और पादप प्रजातियां रहती हैं। इनमें कुछ जीव और पादप ऐसे हैं, जो अत्यंत ठंडे या बर्फीले इलाके में रहते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं, जो गर्म इलाकों में जीवित रह सकते हैं। लेकिन गर्मी और ठंड के संतुलन की जो प्राकृतिक व्यवस्था है, उसमें गड़बड़ी या असंतुलन हो जाने से जीवधारियों के साथ ही पादपों का जीवन भी संकट में पड़ जाता है।


गर्मी बेजुबान वन्यजीवों के लिए गंभीर संकट पैदा करती है। कई जानवर, विशेष रूप से वे, जो अत्यधिक गर्मी के अनुकूल नहीं हैं, अधिक गर्मी से पीड़ित होते हैं। अत्यधिक गर्मी से निर्जलीकरण और हाइपरथर्मिया जैसी समस्याओं से उनकी मृत्यु तक हो जाती है। वन्यजीव अक्सर गर्मी से बचने के लिए रात में अधिक सक्रिय हो जाते हैं, जिससे उनके भोजन और सहवास का पैटर्न बाधित हो सकता है। जल स्रोत सूखने से उनके लिए पानी की कमी होती है, जिस कारण जानवरों को पानी की तलाश में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे शिकार और मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा बढ़ जाता है। उच्च तापमान और वर्षा की कमी से वनस्पति भी सूख जाती है, जिससे शाकाहारी जानवरों और उन पर निर्भर मांसाहारी जानवरों के लिए भोजन की उपलब्धता कम हो जाती है। जंगलों से बाहर बस्तियों में भीषण गर्मी से तोते, गौरैया, नीले कबूतर, खलिहान उल्लू, काली चील, पतंगे, भारतीय भेड़िया, सांप, छिपकली, नेवले, शाही, चूहा, सियार, सिवेट, बंदर और गिलहरी जैसे कई जीव प्रभावित होते हैं।


गर्म तापमान परजीवी और रोगजनकों में भी वृद्धि करता है। लंबे समय तक गर्मी के तनाव से जानवरों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है, जिससे वे संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। कुछ ऐसे जीव होते हैं, जिन पर गर्म लहरों का ज्यादा असर होता है। पक्षी विशेष रूप से शुष्क क्षेत्रों में गर्मी के गंभीर जोखिम का सामना करते हैं। उनमें निर्जलीकरण और गर्मी से थकावट आम है। उनके घोंसले ज्यादा गरम होने से चूजे मर सकते हैं। कई सरीसृप एक्टोथर्मिक होने के बावजूद, ज्यादा गरम हो सकते हैं और अगर उन्हें छाया नहीं मिलती, तो वे मर जाते हैं। हाथी और बाघ जैसे बड़े स्तनधारी भी आवास, भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों के करीब आ जाते हैं, जिससे मानव-जीव संघर्ष बढ़ जाता है। विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों में भी वन्यजीवों को गंभीर कष्ट का सामना करना पड़ता है।


मनुष्यों की तरह ही वन्यजीवों के संरक्षण के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग होना चाहिए। जरूरी है कि वन्यजीवों पर गर्मी के दीर्घकालिक प्रभावों को समझने और शमन रणनीतियों को विकसित करने के लिए विस्तृत अध्ययन और सर्वेक्षण किया जाए। स्थानीय समुदायों को चरम मौसमी घटनाओं के दौरान वन्यजीवों की मौतों की रिपोर्ट करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि एक व्यापक डाटाबेस बनाया जा सके। वन्यजीव अभयारण्यों के भीतर जल स्रोतों का निर्माण और रखरखाव जरूरी है। वन्यजीवों के पर्यावास के लिए पेड़ लगाना जरूरी है। अत्यधिक गर्मी के दौरान समय पर हस्तक्षेप के लिए वन्यजीव स्वास्थ्य और व्यवहार की निरंतर निगरानी होनी चाहिए।

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