इस महीने की शुरुआत में अमेरिका के न्यूयॉर्क में आई बाढ़ की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए कुछ भारतीयों ने तंज किया कि वैश्विक महाशक्तियां भी पानी में डूब जाती हैं, लेकिन न्यूयॉर्क की इस बदहाली का मजाक उड़ाने के बजाय हमें इससे गहरे सबक लेने की जरूरत है। अगर न्यूयॉर्क के हालात बदतर हुए, तो इसका कारण यह है कि वहां की पुरानी जल निकासी व्यवस्था को आधुनिक बारिश के हिसाब से तैयार नहीं किया गया था। यही बात भारत के शहरी बुनियादी ढांचे पर भी लागू होती है। ज्यादातर आबादी अनियोजित ढंग से बने आवासों में निवास करती है, इसलिए वे ज्यादा असुरक्षित हैं।
भारतीय शहर विकास के इंजन हैं। वे देश की जीडीपी में 63 फीसदी का योगदान देते हैं, जिसके वर्ष 2050 तक 75 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है। उस समय तक मौजूदा शहरी आबादी का दोगुना यानी 95.1 करोड़ लोग शहरों में रहने लगेंगे। वे 70 फीसदी नई नौकरियां पैदा करेंगे व दुनिया के तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप ईकोसिस्टम की मेजबानी करने वाले नवाचार का केंद्र होंगे, लेकिन वे तीव्र जलवायु तनाव का भी सामना करेंगे।
बरसाती बाढ़ में जब जल निकासी की व्यवस्था चरमरा जाती है। घटती हरियाली और शहरों के अनियंत्रित फैलाव के चलते भारी बारिश से जलभराव की समस्या पैदा होती है। विश्व बैंक की नई रिपोर्ट, ‘टुवार्ड्स रिजिल्यंट एंड प्रॉस्परस सिटीज इन इंडिया’, जिसे केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने तैयार किया है, स्पष्ट रूप से बताती है कि अभी शहरी बाढ़ की वजह से प्रतिवर्ष करीब चार अरब डॉलर का नुकसान होता है। 2070 तक यह नुकसान बढ़कर 14 से 30 अरब डॉलर पहुंच सकता है और करीब 4.6 करोड़ लोग मुसीबत में पड़ सकते हैं। और ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। मुंबई में बाढ़ संभावित क्षेत्रों का किराया बीस से पच्चीस फीसदी कम है, जो गरीब परिवारों के जीवन को संकट में डालता है। कोलकाता में आधे से ज्यादा नागरिक सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं। एक तूफान सब कुछ तबाह कर सकता है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट में बताया गया है कि ‘शहरी बाढ़ शहर के सड़क नेटवर्क पर गहरा असर डालती है। यहां तक कि सिर्फ दस या बीस फीसदी सड़कें जलमग्न होने पर कुछ शहरों की आधी से ज्यादा यातायात व्यवस्था गड़बड़ा जाती है। भारतीय शहर पहले से ही जलापूर्ति, सार्वजनिक परिवहन, पार्क, सीवरेज, आवासीय संकट तथा ठोस कचरा संग्रहण और उसके निष्पादन की बढ़ती मांग को पूरा करने की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। खराब वायु गुणवत्ता और गहराता जल संकट शहरों को प्रभावित करने वाली अन्य महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं। कई शहरों में बड़े पैमाने पर नया शहरी विकास शहर के बाहरी इलाकों में हो रहा है, जिससे लचीली सेवाओं और बुनियादी ढांचे का समन्वय और वितरण चुनौतीपूर्ण हो रहा है।’
ऐसे में काम पर जाना या अस्पताल पहुंचना मुश्किल होता है। फिर भी, कुछ उम्मीदें बाकी हैं। कुछ शहर इन समस्याओं को पीछे धकेल रहे हैं। अहमदाबाद का हीट एक्शन प्लान पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करता है और बाहरी श्रम कार्यक्रमों को समायोजित करता है। कोलकाता ने शहर स्तर पर बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली शुरू की है। इंदौर ने अपने कचरा प्रबंधन में सुधार कर पर्यावरण संरक्षण के साथ ही नए रोजगार पैदा किए हैं। चेन्नई की जलवायु कार्य योजना विस्तृत जोखिम आकलन के जरिये अनुकूलन और निम्न-कार्बन विकास को लक्ष्य बनाती है। ये प्रयास दर्शाते हैं कि जलवायु कार्रवाई शहरी स्तर पर संभव है और प्रभावी भी।
हालांकि, भारत का अभी काफी शहरीकरण होना बाकी है, जिसका मतलब है कि हमारे पास अब भी बेहतर करने का अवसर है। बाढ़ प्रभावित और शहर के बाहरी इलाकों में अनियोजित विकास जोखिम बढ़ा रहा है। वर्ष 1985 से 2015 के बीच बरसाती बाढ़ में 131 फीसदी की वृद्धि देखी गई। कभी कम जोखिम वाले शहर (हैदराबाद, बंगलूरू, इंदौर) अब नियमित रूप से बाढ़ का सामना कर रहे हैं। नदियों के किनारे बसे दिल्ली और सूरत जैसे शहरों में बाढ़ का पानी निचले इलाके में जाने से छोटे शहरों में जोखिम बढ़ रहा है। जाहिर है, इससे निपटने में ऊंची दीवारें और गहरी नालियां काम नहीं आएंगी। भविष्य की चरम स्थितियों के बारे में डॉ. कोल की चेतावनी जलवायु-स्मार्ट शहरी डिजाइन की मांग करती है : पानी निकासी योग्य फुटपाथ, दलदली भूमि की वापसी और हरियाली का विस्तार। जल निकासी प्रणालियों को उन्नत करने की जरूरत है और हमें बाढ़ क्षेत्रों में निर्माण कार्य रोकना होगा।
अभी जो स्मार्ट सिटी अभियान और हीट एक्शन प्लान चल रहे हैं, उन्हें और समृद्ध करने की जरूरत है। अनौपचारिक बस्तियां-जहां 6.55 करोड़ लोग रहते हैं-की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये क्षेत्र अक्सर उच्चतम जोखिम वाले होते हैं। बुनियादी ढांचे को उन्नत करना सिर्फ समानता लाना नहीं है, बल्कि उस कार्यबल को सुरक्षित करना है, जो शहरी भारत को ताकत प्रदान करता है। आर्थिक दृष्टि से यह एक जीत है, शहरों को बाढ़ से बचाने से अरबों रुपये की बचत होती है और विकास का इंजन चलता रहता है।
मानसून हमें प्रकृति की शक्ति और उसे सहने की हमारी क्षमता की याद दिलाता है। भारतीय शहर चौराहे पर खड़े हैं। जलवायु परिवर्तन में या तो हम अपने शहरी सपनों को डूबने दे सकते हैं, या फिर ऐसे लचीले शहरों का निर्माण कर सकते हैं, जो बारिश में भी आगे बढ़ते रहें। हमें कैसा शहर चाहिए, यह हमें ही तय करना है, लेकिन हमारे पास समय कम है। भारत को ऐसे शहरों का निर्माण करने की जरूरत है, जो मानसून में न सिर्फ बचे रहें, बल्कि फलते-फूलते भी रहें।