महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कदम वाशिंगटन में भारत की गहन कूटनीतिक पहल के बाद उठाया गया। भारत ने तकनीकी प्रमाणों के साथ विस्तृत डोजियर प्रस्तुत किया है, जो टीआरएफ के डिजिटल पदचिह्नों, वित्तपोषण और नेतृत्व को पाकिस्तान के डीप स्टेट और लश्कर-ए-ताइबा से जोड़ते हैं। यह भारत की खुफिया जानकारी में बढ़ते वैश्विक विश्वास को दर्शाता है। भारत ने पश्चिमी सहयोगियों को दी गई जानकारी में पहलगाम आतंकी घटना को प्रमुखता से उठाया और इसे स्थानीय कानून-व्यवस्था का मुद्दा न मानकर, बल्कि जम्मू-कश्मीर को अस्थिर करने की आईएसआई की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बताया।
फिर भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रत्याशित यू-टर्न लेते हुए अपनी नवीनतम टिप्पणियों और नीतिगत संकेतों में पाकिस्तान को असाधारण प्राथमिकता दी है, जिससे अमेरिकी मंशा पर गंभीर संदेह पैदा हो गया है। दबाव बनाए रखने के बजाय, ट्रंप का झुकाव एक ऐसे मुल्क को पुरस्कृत करने का जोखिम उठाता है, जो आतंकवादियों की फैक्टरी के रूप में काम करता है। भारत के लिए स्थिति स्पष्ट है: वाशिंगटन द्वारा टीआरएफ की सार्वजनिक निंदा के बाद अब व्हाइट हाउस ने इस्लामाबाद को खुश करने की इच्छा दिखाई है, चाहे वह अल्पकालिक सामरिक लाभ पाने के लिए हो या अन्य भू-राजनीतिक सौदों की तलाश के लिए। यह दोहरा मापदंड न केवल अमेरिका के आतंकवाद-रोधी रुख की विश्वसनीयता को कमजोर करता है, बल्कि पाकिस्तान को अपने छद्म युद्ध को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित भी करता है। इससे पता चलता है कि वैश्विक कूटनीति के उच्च मंच पर रणनीतिक सुविधा अक्सर नैतिक स्पष्टता पर भारी पड़ती है। भारत को दृढ़ता और प्रमाण, दोनों के साथ इसका मुकाबला करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
हालांकि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र की कार्रवाई से पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौती बढ़ गई है। हाल ही में एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट से बाहर आने के बाद, इस्लामाबाद अब नए सिरे से निगरानी का जोखिम उठा रहा है। ये कदम वैश्विक निगरानी संस्थाओं को आतंकवाद के वित्तपोषण पर पाकिस्तान के रिकॉर्ड की फिर से जांच करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे, लेकिन ट्रंप एक बार फिर पाकिस्तान के रक्षक साबित हो सकते हैं।
पिछले दो वर्षों में, भारत ने चुपचाप और लगातार टीआरएफ और उसके सहयोगी संगठनों जैसे पीएएफएफ, यूएलएफजेके और गजनवी फोर्स के खिलाफ मामला बनाया है। विदेश मंत्रालय ने इन नए आतंकी संगठनों पर लगातार ध्यान केंद्रित किया है और अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, यूएई और संयुक्त राष्ट्र निकायों को विश्वसनीय सुबूत सौंपे हैं।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के वैश्विक मंचों पर तीखे हस्तक्षेपों ने कश्मीर के बारे में धारणाओं को नया रूप दिया है। पाकिस्तान के दोहरे खेल—आतंकवादियों को पनाह देते हुए अंतरराष्ट्रीय मदद लेना—पर उनके लगातार बयान ने लोगों को प्रभावित किया है। अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र की कार्रवाई इसका प्रमाण है कि भारत का वैश्विक संदेश झूठे आख्यानों को खत्म कर रहा है।
टीआरएफ को बचाने की पाकिस्तान की शुरुआती कोशिशें (पहले संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों से उसका नाम हटाकर और फिर आधे-अधूरे मन से खंडन जारी करके) उलटी पड़ गई हैं। एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को पनाह देने से लेकर हाफिज सईद और मसूद अजहर का खुलकर समर्थन करने तक, इस्लामाबाद की आतंकी चालबाजियों को अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय बर्दाश्त नहीं कर रहा है। यहां तक कि पाकिस्तान के रणनीतिक हलकों में भी घरेलू आलोचक प्रॉक्सी पर निर्भरता की व्यवहार्यता पर सवाल उठाने लगे हैं, खासकर तब, जब इसकी लागत (आर्थिक, प्रतिष्ठा संबंधी और कूटनीतिक) बहुत अधिक है।
अतीत में, चीन ने मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों को संयुक्त राष्ट्र में सूचीबद्ध करने के भारत के प्रयासों को बाधित किया था। लेकिन टीआरएफ के खिलाफ अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की कार्रवाई पर बीजिंग की चुप्पी कुछ और ही संकेत देती है। यह भारत के साथ व्यापारिक हितों, पाकिस्तान की बिगड़ती वैश्विक छवि और हर तरफ से आलोचनाओं का सामना कर रहे पाकिस्तान को बचाने की थकान के कारण एक नए संतुलन का संकेत हो सकता है। यह बदलाव बहुपक्षीय मंचों पर संरक्षण के लिए चीन पर पाकिस्तान की पूर्ण निर्भरता को भी कमजोर करता है।
भारत को अब इसका लाभ उठाकर अन्य पाकिस्तानी आतंकी संगठनों-पीएएफएफ, यूएलएफजेके और गजनवी फोर्स-को निशाना बनाना चाहिए, जो सभी एक ही रणनीति (झूठी ब्रांडिंग, डिजिटल जिहाद और आईएसआई नियंत्रण) से काम करते हैं। नई दिल्ली को संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद निरोधक समिति से आगे की सूची की मांग करनी चाहिए, तथा इन समूहों की वित्तीय और सैन्य सहायता में कटौती करने के लिए रूस, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ संयुक्त कार्रवाई शुरू करनी चाहिए। इसके अलावा भारत को इस मौके का फायदा उठाकर बहुपक्षीय सहमति बनानी चाहिए और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को और अलग-थलग करना चाहिए। इस्लामाबाद के पास विकल्प कम हैं- या तो वह आतंकवाद के बुनियादी ढांचे को ध्वस्त करे या अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार का सामना करे।