साधो, दरवाजे पर दस्तक हुई। बेटे ने बताया कि सीबीआई के लोग हैं। आप छत से किसी और घर की तरफ निकल जाइए। पकड़ कर ले जाएंगे, तो मुहल्ले में बदनामी होगी। मैं ऊपर जाकर पानी की टंकी में घुस गया। चार लोग अंदर आकर मेरी अलमारियां तलाश करने लगे। जिस रैक में क्रांतिकारी साहित्य रखा था, उसकी छानबीन की गई। वे बोले, चालीस किताबों के लेखक की तिजोरी कहां है?
बेटे ने अनभिज्ञता जाहिर की, तो वे रॉयल्टी का हिसाब-किताब मांगने लगे। एक बोला, लेखक जन्म से बेईमान होता है। दूसरे की अनुभूतियां चुरा लेता है। हम अनुभूति घोटाले की भी जांच करेंगे। बेटे ने कहा, यह सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। तत्काल दूसरे ने कहा, तो बताओ कि इस मकान की लागत कितनी है? सोफा किस कीमत का है? फ्रिज खरीदा है या प्रकाशक ने भेंट की है? हिंदी के लेखक की हैसियत नहीं कि इतने महंगे डबल बेड पर सो सके। वैसे भी जनता के लेखक को इस तरह की अय्याशियों में नहीं रहना चाहिए।
बेटे ने कहा, आप जांच अधिकारी हैं या उपदेशक? इस पर सीबीआई वाले बोले, किसी अंग्रेजी लेखक के घर छापा पड़ा होता, तो अब तक देसी घी की मिठाई और नमकीन से स्वागत होता। पर हिंदी के इस कलमघिसुए की रसोई में चीनी और चाय की पत्ती तक नहीं है। बेटे ने कहा, बहुत दिनों से पारिश्रमिक नहीं आया, इसलिए दिन कड़क चल रहे हैं। एक ने पूछा, सच बताओ, अखबारों और किताबों से कितना मिलता है? बेटा सकपका गया। वह बोला, अभी पापा को बुलाता हूं। वह टंकी के अंदर छिपे हैं।
सीबीआई वालों ने बेटे को शाबासी दी कि वह सत्य का पुजारी है। दो अधिकारी मुझे टंकी से निकालने आए। एक ने मेरा गला दबोचते हुए कहा, नकदी और जेवर का पता बताओ। मैंने कहा, क्या यादव सिंह समझ रखा है? हिंदी का लेखक धनकुबेर नहीं होता। मेरी आंख खुलते ही बेटे ने ताना मारा, पापा, क्या यादव सिंह-यादव सिंह बक रहे हो। मैंने सपने की बात बेटे को नहीं बताई।