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इस हम्माम में सब नंगे हैं

Sun, 20 Nov 2016 07:01 PM IST
तवलीन सिंह
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तवलीन स‌िंह
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नोटबंदी के कारण आम जनता को जरूर परेशानी हो रही है, लेकिन सबसे ज्यादा परेशान हुए हैं हमारे राजनेता। शायद ही कोई राजनेता होगा, जिसने अपने घर में थोड़ा बहुत काला धन छिपाकर नहीं रखा होगा। यह धन चुनाव के समय बटोरा जाता है, क्योंकि चुनाव आयोग ने प्रचार की सीमा बांध रखी है, जिसमें काम चलता नहीं है। सो हमारे राजनेताओं को उद्योगपतियों के पास झोली फैलानी पड़ती है। जितने बड़े राजनेता, उतनी ही गहरी उसकी झोली। उधर उद्योगपति देखते हैं कि चुनावी हवा का रुख किस तरफ है। उसी के अनुपात में वे काला धन बांटते हैं। यह धन काला इसलिए होता है, क्योंकि इसका हिसाब आयकर वालों को नहीं दिया जा सकता और न ही कंपनी की किताबों में इसका हिसाब रखा जा सकता है। सो अगर वास्तव में अरविंद केजरीवाल के पास ऐसे दस्तावेज हैं, जो साबित करते हैं कि प्रधानमंत्री को बिरला समूह से तब पैसे मिले थे, जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तो यह बात चमत्कार से कम नहीं है। ऐसे दस्तावेज कभी रखे नहीं जाते।
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मामूली सांसद भी अपना चुनाव प्रचार करने के लिए काला धन इकट्ठा करते हैं, और चुनाव समाप्त होने के बाद जो पैसा बच जाता है, उसे ऐसी चीजों पर खर्च किया जाता है, जिनमें काला धन आसानी से छिप जाता है, जैसे-जमीन, कोठियां, जेवर, विदेशों में छुट्टियां, डिजाइनर कपड़े,जूते और बैग।

अब जब अचानक प्रधानमंत्री ने विगत आठ नवंबर की रात को एलान किया कि बारह बजे के बाद न हजार रुपये के नोट चलेंगे और न ही पांच सौ के, तो यह सोचकर हमारे जन प्रतिनिधियों के पसीने छूट गए कि अब उनके खजानों का क्या होगा। उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव इतने पास आ गए हैं कि राजनेताओं के घरों में काफी धन इकट्ठा हो चुका होगा। यह धन अब पूरी तरह रद्दी बन चुका है, क्योंकि न इसे बैंक में जमा किया जा सकता है, न ही जमीन-जायदाद खरीदने के काम आ सकता है। सुना है, पिछले कुछ दिनों में मंदिरों में काफी दान हुआ है। काला धन छिपाने का शायद यही तरीका रह गया था।
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लेकिन दान करने के बाद राजनेताओं की परेशानियां कम नहीं हुई होंगी, सो खूब हल्ला मचाने में लग गए हैं सब। दिल्ली के एक आम जलसे में अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री पर आरोप लगाए कि उन्होंने यह चाल सिर्फ इसलिए चली है, क्योंकि वह जनता से पैसा हड़प कर अपने अमीर दोस्तों को देना चाहते हैं। इसी तरह का आरोप राहुल गांधी ने भी लगाया, यह भूलते हुए कि कांग्रेस के दौर में उनके बहनोई के क्या कारनामे सामने आए थे।

जनता का पैसा धीरे-धीरे जनता को मिल ही जाएगा। इसमें कुछ असुविधा होगी। लेकिन जिनके पास काला धन था, वह वापस मिलने वाला नहीं है, सो खूब हंगामा हुआ है और होता रहेगा। संसद के अंदर हंगामा किया सांसदों ने और संसद के बाहर दिल्ली के मुख्यमंत्री ने। भ्रष्टाचार आंदोलन के इस सरदार ने अन्ना हजारे के नेतृत्व में अपनी भूख हड़ताल की याद दिलाई, पर यह नहीं बताया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने प्रचार में एक साल में पांच सौ करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर डाले हैं। क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? उन्होंने यह भी नहीं बताया कि पंजाब और गोवा में उनका जो चुनाव प्रचार शुरू हुआ है, उसके लिए इतना पैसा कहां से आ रहा है। न ही ममता बनर्जी ने बताने की कोशिश की कि चुनावों में क्या वह पैसे का रंग देखकर खर्च करती हैं। इस हम्माम में सब नंगे हैं, लेकिन इसका राजनीतिक खामियाजा नरेंद्र मोदी को भुगतना पड़ेगा।
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