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बदलते अमेरिका में ट्रंप

Sun, 20 Nov 2016 06:57 PM IST
तस्लीमा नसरीन
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अमेरिकी चुनाव में मैं बर्नी सैंडर्स की समर्थक थी। लेकिन बर्नी के हट जाने पर मैं चाहती थी कि हिलेरी क्लिंटन जीतें। इसका कारण यह कतई नहीं है कि मैं हिलेरी की समर्थक थी। दरअसल मैं डोनाल्ड ट्रंप को किसी भी कीमत पर जीतते हुए नहीं देखना चाहती थी। लेकिन मेरे जैसे अनेक लोगों को अवाक कर ट्रंप जीत गए। ट्रंप का जीतना बहुत कुछ ब्रेग्जिट जैसा है। मतदाता समझ ही नहीं पाए कि उन्होंने किसे वोट दिया है। और जब तक नतीजा आया, तब तक बहुत कुछ बदल चुका था।
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ट्रंप की जीत के बाद कई अमेरिकी शहरों में विरोध के जुलूस निकले और लोगों ने कहा कि ट्रंप उनके राष्ट्रपति नहीं हैं। बेशक चुनावी नतीजे में डेमोक्रेटिक पार्टी की कुछ कमजोरियां भी सामने आई हैं। वर्ना जिन इलाकों में वह ताकतवर थी, वहां वह हारी कैसे। हिलेरी की जीत अमेरिका के लिए बेशक एक ऐतिहासिक घटना के तौर पर सामने आती, लेकिन चुनाव में खुद हिलेरी की कमियां भी सामने आईं। इसके अलावा भी कुछ घटनाओं ने ट्रंप की जीत में भूमिका निभाई। जैसे,बर्नी के अनेक समर्थकों ने यह सोचकर वोट नहीं डाले कि हिलेरी तो जीत ही रही हैं। इसी तरह डेमोक्रेटिक पार्टी के उन समर्थकों ने, जिन्हें हिलेरी पसंद नहीं, यह सोचकर ग्रीन पार्टी को वोट दिया कि उनकी अपनी पार्टी तो सत्ता में आ ही रही है। ये सभी लोग अब स्तब्ध हैं।

इधर कू क्लूक्स कैन नाम के घोर वर्णवादी संगठन के एक पूर्व नेता डेविड ड्यूक ने ट्रंप की जीत का श्रेय जूलियन असांजे को देते हुए उनका आभार व्यक्त किया है। ऐसा सुनने में आया है कि असांजे को यह संदेश मिला था कि ट्रंप जीत जाते हैं, तो उन्हें माफी मिल जाएगी।
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ट्रंप हिटलर की तरह हैं। वर्णवाद ने हिटलर को सत्ता दी थी, इसी वर्णवाद ने ट्रंप को भी सत्ता सौंपी। हिटलर की तरह ट्रंप भी हजारों लोगों को अमेरिका से निकाल बाहर करना चाहते हैं। हिटलर जर्मनी की समस्याओं के लिए यहूदियों को जिम्मेदार ठहराते थे। ऐसे ही ट्रंप अमेरिका की समस्याओं के लिए आप्रवासियों को जिम्मेदार मानते हैं। हिटलर यहूदी-विरोधी थे, तो ट्रंप मुस्लिम विद्वेषी हैं। हिटलर जर्मनी को नस्लवादी आकार देना चाहते थे, ट्रंप भी एक ऐसा अमेरिका बनाना चाहते हैं, जिसमें सिर्फ श्वेत रहें।

लड़कियों को ट्रंप किस नजर से देखते हैं, यह अनेक लड़कियां जानती हैं। लड़कियों-महिलाओं को ट्रंप द्वारा दी गई गालियां बहुतों को याद होंगी। महिलाओं के दैहिक सौंदर्य को ही ट्रंप उनका एकमात्र गुण मानते हैं। यह बात उन्होंने कई बार कही भी है। अपनी बेटी इवांका के संबंध में ट्रंप ने कहा था कि अगर वह मेरी बेटी नहीं होती, तो मैं उसके साथ डेट पर जाता। अमेरिकी स्तर पर भी देखें, तो यह एक घटिया टिप्पणी है, क्योंकि स्त्री स्वाधीनता के बावजूद वहां पारिवारिक जीवन मूल्यों का सम्मान किया जाता है।

जिन महिलाओं ने ट्रंप को वोट दिया, क्या वे नहीं जानतीं कि ट्रंप घनघोर नारी-विरोधी हैं? यह इसलिए भी आश्चर्यजनक है, क्योंकि कुछ महिलाओं ने नहीं, आंकड़ों के अनुसार, 53 प्रतिशत महिलाओं ने ट्रंप को वोट दिया था। अमेरिकियों ने अश्वेत को राष्ट्रपति बनाया है, पर काबिलियत के बावजूद महिला को उन्होंने इस पद तक पहुंचने नहीं दिया।

मैंने यह तो सुना था कि अमेरिका में अज्ञानी और अशिक्षित लोगों की बड़ी आबादी रहती है, पर उनकी संख्या इतनी ज्यादा है, इसका पता अब जाकर चला है। जिन अमेरिकियों ने विषमता के खिलाफ खड़े, समता और समानाधिकार में विश्वास करने वाले एक अफ्रीकी-अमेरिकी बराक ओबामा को राष्ट्रपति के तौर पर चुना, उन्हीं लोगों ने आठ साल बाद एक घोर नस्लवादी और नारी विद्वेषी को राष्ट्रपति बनाया है!

ट्रंप की जीत से पूरी दुनिया के मुस्लिम-विरोधी भी खुशियां मना रहे हैं। वे इसलिए खुश हैं कि उनकी तरह खुद ट्रंप भी मुसलमानों के विरोधी हैं। अब ट्रंप अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए अमेरिका से मुस्लिमों को बाहर करने की पूरी कोशिश करेंगे, उनका जीना मुहाल कर देंगे और मुस्लिमों को अमरिका में घुसने नहीं देंगे। जो लोग ट्रंप की जीत से खुश हैं, वे शायद ही समझ पा रहे कि अमेरिका के नए राष्ट्रपति विभिन्‍न मुद्दों पर अड़ियल रुख अपनाकर लोगों में विवाद और विवाद पैदा करेंगे तथा अपने ही देश को नए तरह के आंतरिक संघर्ष में झोंक देंगे। वैसे भी वह अपने देश में एक दूसरे के खिलाफ घृणा का माहौल पैदा करने में सफल हो गए हैं। श्वेत समुदाय में दूसरे समुदायों के प्रति घृणा और अविश्वास की जो भावना अब तक सुषुप्तावस्था में थी, ट्रंप उसे जगाने और आंदोलित करने में सफल हुए हैं।

लोगों का मजाक उड़ाने, उन्हें अपमानित करने, उन्हें टुच्चा बताने में ट्रंप का सानी नहीं है। देश की चिंता करने या देशवासियों के में सोचने वाले राजनेता वह नहीं हैं। वह दरअसल रियलिटी टीवी से जुड़े आदमी थे, वह रियल एस्टेट के कारोबारी रहे हैं। राजनीति का अनुभव उन्हें नहीं है। न ही वह दूसरे अमेरिकी राष्ट्रपतियों की तरह शिक्षित, सभ्य और चरित्रवान हैं। इसके बावजूद चुनाव में उनका जीत जाना अमेरिका के लिए एक त्रासदी ही है। पता यह चलता है कि ट्रंप ने उप-राष्ट्रपति के तौर पर जिन्हें चुना है, माइक पेन्स नाम के वह सज्जन भी नारी-विद्वेषी और विज्ञान-विरोधी एक कट्टरवादी ईसाई हैं। ऐसे में, अमेरिका अब किस दिशा में चलेगा, यह शीशे की तरह साफ है।

अमेरिका में ट्रंप की जीत का मतलब है पूरी दुनिया में चरम दक्षिणपंथी, वर्णवादी, जातीयतावादी,रक्षणशील दलों की जीत। ऐसा लगता है, जैसे विकास का पहिया एकाएक सौ वर्ष पीछे घूम गया है।
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