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शराब भी ले रही झूठ का सहारा: स्वाद से लेकर उम्र तक के दावे पर सवाल, लेबल की सच्चाई कितनी?

विवेक एस अग्रवाल
Updated Thu, 17 Sep 2026 06:58 AM IST

सार

मिलावटी खाने की खबरें तो आम हैं, पर जब शराब के स्वाद, रंग और उम्र तक को कृत्रिम तरीके से गढ़ा जाए, तो यह उपभोक्ताओं की सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है।
 
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शराब (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स


बीते कुछ दिनों में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा देशभर के विभिन्न प्रतिष्ठित शराब निर्माताओं से लिए गए नमूनों की जांच से प्रकट तथ्य आंखें खोलने वाले हैं। ये नमूने शराब के सभी प्रकारों से एकत्रित किए गए थे। शराब का जायका लेने वालों के लिए यह सदमे जैसा होगा कि अधिकांश नमूनों में मिलावट के तौर पर कृत्रिम फ्लेवरिंग का इस्तेमाल पाया गया। यही शराब की उम्र को लेकर किए जाने वाले दावों के पीछे की भी कहानी है।


शराब में फ्लेवर का मिश्रण प्रतिबंधित नहीं है, किंतु कोई भी मिश्रण या उम्र का दावा खाद्य सुरक्षा एवं मानक (अल्कोहलिक पेय) नियमन, 2018 की परिधि में सीमित होना चाहिए। नमूनों एवं निर्माण प्रक्रिया की जांच से यह भी जाहिर हुआ है कि कुछ ही निर्माता ऐसे हैं, जो मुख्य रूप से न्यूट्रल अल्कोहल या एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल से पेय पदार्थ बनाते हैं। इनमें मानक अल्कोहलिक ड्रिंक्स जैसा विशिष्ट स्वाद नहीं होता, इसलिए बाद में कृत्रिम फ्लेवर मिलाया जाता है, ताकि उनमें वही खास स्वाद और सुगंध विकसित की जा सके। निर्माता इस मिलावट के जरिये शराब बनाने की जटिल प्रक्रिया, जिसमें फर्मेंटेशन, डिस्टिलेशन और लंबे समय तक भंडारण शामिल है, को दरकिनार कर उत्पाद को सीधे बाजार में उतार देते हैं। इससे समय व उत्पादन की जटिलताएं घटती हैं और मुनाफा बढ़ता है।


नियमों के अंतर्गत इस प्रकार के छद्म अल्कोहल पेय की बिक्री उनके मूल नामों के स्थान पर उसके समान फ्लेवर्ड की तरह की जानी चाहिए, अन्यथा वह दंडनीय अपराध है।  विश्लेषण से पता चला कि लेबल पर शराब की उम्र को लेकर ऐसे भ्रामक दावे किए गए थे, जो ब्लेंड में इस्तेमाल की गई सबसे कम उम्र की स्पिरिट की वास्तविक उम्र से भी मेल नहीं खाते। नतीजतन, उपभोक्ता तथाकथित पुरानी शराब के नाम पर अधिक कीमत चुकाता है। कई मामलों में निर्माता थोड़ी मात्रा में पुरानी स्पिरिट मिलाकर पूरे मिश्रण को अधिक पुराना बताकर बाजार में बेचते हैं।


दावों में शराब को जौ जैसे अनाज या फलों से तैयार किया जाना बताया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे काफी अलग है। इसी तरह, इसकी निर्माण प्रक्रिया में इसे ओकवुड, यानी बलूत या बांज की लकड़ी में गलाकर तैयार करने की बात कही जाती है, जबकि वास्तव में ओक की लकड़ी का इस्तेमाल मुख्यतः शराब में विशेष स्वाद और सुगंध लाने के लिए किया जाता है। प्रचलित नियमों के तहत शराब को परिपक्व (मैचर्ड) घोषित करने के लिए उसे उपयुक्त लकड़ी के वैट या बैरल में, अथवा ओक चिप्स के साथ कम से कम एक वर्ष तक रखना आवश्यक है। अल्कोहलिक पेय में आमतौर पर ग्लिसरीन, कैरेमल कलर, ओक का चूरा या अर्क और शक्कर मिलाई जाती है। इनका इस्तेमाल स्वाद और टेक्सचर बदलने के साथ पेय को लंबे समय तक बैरल में रखने और डिस्टिलेशन से मिलने वाली विशेषताओं जैसा प्रभाव देने के लिए किया जाता है। इससे पेय में शक्कर और कैलोरी की मात्र भी अनावश्यक रूप से बढ़ जाती है। ग्लिसरीन शराब को मुंह में अधिक मुलायम एहसास देती है और अल्कोहल की तीखी जलन को कम कर देती है। कैरेमेल मिलाने से शराब का रंग गहरा हो जाता है, जिससे वह कई वर्षों तक बैरल में परिपक्व की गई शराब जैसी दिखाई पड़ती है।


शराब की अपनी खामियों के मध्य, इन गैर-कानूनी मिलावटों के कारण दुष्प्रभाव कई गुना बढ़ जाते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शराब उपभोक्ता अक्सर लेबल पर दी गई जानकारी पर ध्यान नहीं देते, जिससे उन्हें निर्माण में इस्तेमाल वास्तविक सामग्री का पता नहीं चल पाता। वहीं, निर्माता भी इस धारणा से परिचित हैं कि शराब का सेवन अक्सर बिना उसकी संरचना पर गौर किए किया जाता है। नियमों के तहत शराब की बोतल पर अवयवों के अतिरिक्त उसके दुष्प्रभाव, उपभोग अवधि, भंडारण तापमान आदि भी अंकित किए जाने चाहिए, लेकिन व्यवहार में इन पर विरले ही ध्यान दिया जाता है।


अतः उपभोग की जाने वाली वस्तु चाहे शराब ही क्यों न हो, उसकी शुद्धता के बारे में सजगता अत्यंत आवश्यक है। अनभिज्ञता का दंड न सिर्फ जेब, बल्कि स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। खरीद से पहले लेबल को भलीभांति देखना ही समझदारी है।
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