अक्तूबर, 1962 के दो बेहद तनावपूर्ण हफ्तों के दौरान, दुनिया परमाणु तबाही के बिल्कुल करीब पहुंच गई थी। शीत युद्ध के दौरान हथियारों की होड़ में अमेरिका और सोवियत संघ एक-दूसरे से आगे निकलने की जबर्दस्त कोशिश कर रहे थे। जब अमेरिका ने इटली और तुर्किये में परमाणु मिसाइलें तैनात कीं, तो सोवियत संघ ने भी अपने ऊपर पहले हमला होने के भय से क्यूबा में अपने परमाणु हथियार तैनात करने की कोशिश की। फिर, दो हफ्ते तक तनावपूर्ण गतिरोध चला, जिसे ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ कहा जाता है। यह संकट लगभग परमाणु युद्ध में ही बदलने वाला था, लेकिन दोनों पक्ष युद्ध के मुहाने से पीछे हट गए।
डार्टमाउथ में नेशनल सिक्योरिटी और इंटरनेशनल रिलेशंस के जानकार और राजनीतिक वैज्ञानिक विलियम वोल्फोर्थ बताते हैं कि उस मुश्किल ने दोनों तरफ के नेताओं की सोच बदल दी। हालांकि, अमेरिका और सोवियत संघ कट्टर दुश्मन बने रहे। लेकिन, एक साझा हित के मुद्दे पर (यानी मानवता को खत्म न होने देने पर) वे साथ मिलकर काम करने पर राजी हुए। आज एक बार फिर वैसी ही स्थितियां हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उद्योग के विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि एआई कंपनियां और जिन देशों में वे स्थित हैं, वे एक तरह की होड़ में फंसे हुए हैं। कई लोगों का मानना है कि इसके नतीजे उतने ही विनाशकारी हो सकते हैं, जितना कि वह परमाणु युद्ध, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी और सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने टाला था। बेशक, इनमें कुछ अहम अंतर हैं। एआई मॉडल परमाणु बम नहीं हैं, भले ही उनका इस्तेमाल सैन्य कामों में किया जा सकता है। बाजार में बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रही कंपनियां, वैश्विक वर्चस्व के लिए लड़ रही महाशक्तियों जैसी नहीं हैं। लेकिन, असल में, एआई की होड़ उसी सवाल की ओर इशारा करती है, जो शीत युद्ध के समय भी अहम था: आर्थिक और भू-राजनीतिक दबदबे के लिए मुकाबला करते हुए भी, विरोधी देश दुनिया को सुरक्षित रखने के लिए कैसे सहयोग कर सकते हैं?
एमआईटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और जाने-माने गेम थ्योरिस्ट ड्रू फुडेनबर्ग और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर व गूगल डीपमाइंड के शोध वैज्ञानिक एंड्रयू कोह का एक नया आधार पत्र, एआई की होड़ को धीमी और सुरक्षित रफ्तार पर लाने का एक संभावित तरीका बताता है। इसके लिए जरूरी है कि प्रतिस्पर्धा कर रही कंपनियां और सरकारें अपनी प्रगति से जुड़ी जानकारी साझा करें तथा इस बात पर सहमत हों कि एआई से खतरा कब और कैसे पैदा हो सकता है। हालांकि, व्हाइट हाउस में तकनीकी कंपनियों के बीच हुए स्वैच्छिक समझौते के बावजूद, अभी तक इन दोनों शर्तों पर अमल नहीं हो पाया है। एआई की दौड़ में शामिल कंपनियों की संख्या व विविधता की वजह से ऐसा करना मुश्किल हो सकता है।
प्रोफेसर कोह और फुडेनबर्ग एक सीधी-सी बात से अपनी बात शुरू करते हैं: हर कोई बड़ी तबाही को टालने में दिलचस्पी रखता है, चाहे वह कितना भी स्वार्थी क्यों न हो। साथ ही, एआई कंपनियों पर वर्चस्व के लिए एक-दूसरे से मुकाबला करने का जबर्दस्त दबाव है। ये कंपनियां बाजार हिस्सेदारी और अरबों डॉलर का निवेश पाना चाहती हैं, जो सबसे उन्नत मॉडल से मिल सकता है। मुकाबले का यह दबाव उन्हें खतरनाक तरीके से तबाही के कगार की ओर दौड़ने के लिए उकसाता है।
प्रोफेसर कोह और फुडेनबर्ग का सुझाव है कि अगर प्रतिस्पर्धी अपनी तकनीकी प्रगति और सुरक्षा की सीमा के कितने करीब हैं, इस बारे में जानकारी साझा करें, तो स्थितियां बदल सकती हैं। इस पत्र का तर्क है कि अगर एआई कंपनियां यह देख पाती हैं कि कोई भी खतरनाक रास्ते पर आगे नहीं बढ़ रहा है, तो उन्हें खुद ऐसा करने की प्रेरणा कम मिलेगी। उन्होंने इस स्थिति की तुलना शीत युद्ध के दौरान ‘जवाबी हमले’ की क्षमता से की। प्रोफेसर कोह ने कहा, ‘इसी बात ने तब पहले हमले करने से रोका होगा।’ उनका कहना है कि यही तर्क एआई के मामले में भी लागू हो सकता है। फिलहाल, कंपनियां अपनी प्रगति और सुरक्षा से जुड़ी जानकारी साझा नहीं कर रही हैं। अगर वे स्वतंत्र विशेषज्ञों को निगरानी की जिम्मेदारी और उन्हें जरूरी जानकारी साझा करने की अनुमति दें, तो आपसी भरोसा बढ़ सकता है। फिलहाल, ऐसी सुरक्षा जांच स्वैच्छिक व अनियमित है, लेकिन इसे एक व्यवस्थित रूप दिया जा सकता है। ट्रंप चाहते हैं कि सरकारें इस मामले में सीधे दखल न दें। उन्होंने जिस समझौते पर हस्ताक्षर किया, उसमें जोखिमों की तीसरे पक्ष से निगरानी का समर्थन तो किया गया, पर ऐसा नहीं लगा कि इससे कोई ठोस जिम्मेदारी तय हुई हो। प्रोफेसर कोह ने कहा कि इस समझौते से प्रोत्साहन से जुड़ी मौजूदा समस्या के हल होने की संभावना कम ही है। इसमें कंपनियों की अंदरूनी क्षमताओं के बारे में पारदर्शिता शामिल नहीं है और अमेरिका-चीन के बीच प्रतिस्पर्धा का सवाल भी अनसुलझा ही रह जाता है।
शीत युद्ध के समय, परमाणु हथियारों का खतरा साफ और ठोस था। अभी एआई का खतरा वैसा नहीं है, और इस बात पर सबकी राय एक नहीं है कि असल में तबाही की हद कहां है। बहुत-से लोगों को एआई से जुड़ी तबाही की बातें साइंस फिक्शन जैसी लगती हैं। विशेषज्ञों, एआई कंपनियों और नीति निर्धारकों के बीच भी इस बात पर काफी मतभेद हैं कि जोखिम क्या हैं और वे उस ओर कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं। प्रमुख एआई कंपनियों के कुछ कर्मचारियों का तर्क है कि इस तकनीक से अगले दशक में सभी लोगों के मारे जाने का बड़ा खतरा है। कुछ लोग मानते हैं कि जोखिम एआई कंपनियों की लापरवाही और अकुशलता तथा दूसरे उद्योगों द्वारा एआई-आधारित टूल्स के खिलाफ अपनी सुरक्षा को मजबूत न कर पाने की वजह से है। फिर, राष्ट्रपति ट्रंप जैसे एआई समर्थक भी हैं, जिन्होंने कहा कि जो लोग सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं, वे ऐसी बातें कर रहे हैं, जो कभी नहीं होंगी। उन्होंने साफ कर दिया है कि एआई ऐसा खेल है, जिसमें जीतने वाला ही सिकंदर है। ट्रंप का मकसद ‘व्यावहारिक राजनीति’ वाला नहीं है। उनका मकसद अमेरिकी दबदबा बनाए रखना, चुनाव के नजदीक होने पर शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था को संभालना तथा अपने परिवार के इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो को बढ़ाना है। इन सभी बातों से अनिश्चितता और बढ़ जाती है, तथा चीनी सरकार का रुख भी इसमें एक अहम भूमिका निभाता है। बीजिंग के किसी भी निगरानी व्यवस्था के लिए सहमत होने की संभावना नहीं है, जो अमेरिका तक पहुंचने की उसकी क्षमता को खतरे में डालती हो।
प्रोफेसर कोह ने कहा कि एआई से जुड़े खतरों को लेकर अलग-अलग राय होने से सुरक्षा के मामले में तालमेल बिठाने में दिक्कत आती है। यह समझौता बाध्यकारी नहीं है और सिर्फ कुछ ही कंपनियों तक सीमित है। ज्यादा सहमति बनाने का एकमात्र तरीका खतरों से जुड़े सबक सीखना हो सकता है। जैसा कि क्यूबा मिसाइल संकट के समय परमाणु तबाही के असली खतरे का एहसास हुआ था। लेकिन, इस उद्योग से जुड़ी गोपनीयता संभावित खतरों से मिलने वाले सबक को छिपाए हुए है।
हाल ही में, यह बात सामने आई कि ओपनएआई के एजेंट्स ने ऑस्ट्रेलियाई सरकार के सर्वर्स को हैक किया था। इस बीच एआई की दौड़ जारी है और किसी को नहीं पता कि कंपनियां अपने एआई को बुद्धिमान बनाने की होड़ में कितना आगे जा चुकी हैं। ओपनएआई के शोधकर्ता डैनियल सेल्सम ने हाल ही में एक लेख में लिखा है कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब ‘ये मॉडल शायद लोगों को यकीन दिला देंगे कि सब कुछ ठीक है और अब इन्सानों को उन्हें सत्ता सौंप देनी चाहिए।’