हमारे देश में प्याज की मांग व उत्पादन इतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितना उसे सहेज कर रखना है, ताकि वह संकट के समय काम आ सके। आमतौर पर इसकी बोरियां खुले में रहती हैं और बारिश होते ही इनका सड़ना शुरू हो जाता है। अभी नए प्याज की आवक शुरू होगी, लेकिन दिल्ली के बाजार में फुटकर में इसके दाम चालीस रुपये किलोग्राम से नीचे नहीं आ रहे।
भारत में प्याज की लगभग 70 फीसदी पैदावार रबी में होती है, यानी दिसंबर-जनवरी में रोपाई और मार्च से मई तक फसल की आवक। खरीफ यानी जुलाई-अगस्त में बोने और अक्तूबर-दिसंबर तक आवक का रकबा बहुत कम होता है। पिछले कुछ वर्षों में प्याज के बाजार में हुई उठापटक पर गौर करें, तो पाएंगे कि जनवरी, 2018 में कम आवक का कारण महाराष्ट्र में चक्रवात, पश्चिमी समुद्री तट पर कम दबाव के क्षेत्र बनने से असामयिक बरसात के चलते शोलापुर, नासिक, अहमदनगर आदि में फसल बर्बाद हो गई थी।
नवंबर, 2019 से जनवरी, 2020 के दौरान भी प्याज के दाम बेशुमार बढ़े थे और उसका कारण भी बेमौसम और लंबे समय तक हुई बरसात को बताया गया था। फरवरी, 2021 में प्याज के आसमान छूते दाम व आयात का कारण जनवरी, 2021 में उन इलाकों में भयंकर बरसात होना था, जहां प्याज की खेती होती है।
इन दिनों मध्य प्रदेश में प्याज की बंपर फसल किसानों के लिए आफत बनी है। शाजापुर मंडी में एक सप्ताह में 27 हजार बोरा प्याज खरीदा गया। यहां आगरा-मुंबई रोड पर ट्रैक्टर-ट्रालियों की लंबी कतार नजर आई, जहां किसान माल बेचे बगैर लौट रहे हैं।
यहां पिछले साल भी किसान वाजिब दाम न मिलने के कारण आंदोलन कर चुके हैं। सनद रहे कि राज्य में हर साल लगभग 32 लाख टन प्याज होता है और उसके भंडारण की क्षमता महज तीन लाख टन यानी दस फीसदी से भी कम है।
महाराष्ट्र की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव में शनिवार को एक हजार दो सौ तैंतीस वाहनों से सत्रह हजार आठ सौ छब्बीस क्विंटल प्याज की आवक हुई और इसका अधिकतम भाव 1,600 रुपये, न्यूनतम 1,000 रुपये और औसत 2,100 रुपये प्रति क्विंटल रहा।
ये दाम बहुत कम हैं, पर मुश्किल यह है कि किसान इसे नहीं रख सकता। यदि इस समय थोड़ी भी बरसात हो गई, तो अधिकांश माल सड़ जाएगा। अनुमान है कि हर साल हमारे देश में 70 लाख टन से अधिक प्याज खराब हो जाता है, जिसकी कीमत 22 हजार करोड़ होती है।
केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने वर्ष 2022 की आर्थिक समीक्षा में बताया है कि वर्ष 2020-21 में कोई 60 लाख टन प्याज सड़ने या खराब होने का आकलन किया गया था, जो वर्ष 2021-22 में 72 लाख टन है। इस समय देश में प्याज की उपलब्धता 3.86 करोड़ टन है, जबकि 28 लाख टन आयात किया गया है। लेकिन दुर्भाग्य है कि इस स्टॉक को सहेजने के लिए पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं।
महज दस फीसदी प्याज को ही सुरक्षित रखने लायक व्यवस्था हमारे पास है। प्याज उत्पादक जिलों में कोई खाद्य प्रसंस्करण कारखाने भी नहीं हैं। किसान अपनी फसल लेकर मंडी जाता है और यदि उसे माल बेचने के लिए सात दिन कतार में लगना पड़े, तो माल-वाहक वाहन का किराया और मंडी के बाहर सारा दिन बिताने के बाद किसान को कुछ नहीं मिलता। इसीलिए आए दिन सड़क पर फसल फेंकने की खबरें आती हैं।
वर्तमान बिजली आधारित कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था सुदूर गांवों में संभव नहीं है, क्योंकि वहां एक तो बिजली की अनियमित आपूर्ति होती है, दूसरा मंडी तक आने का परिवहन व्यय अधिक है। यही नहीं, जिला स्तर पर प्रसंस्करण कारखाने लगाने, सरकारी खरीदी केंद्र ग्राम स्तर पर स्थापित करने, किसान की फसल को निर्यात लायक बनाने के प्रयास अनिवार्य हैं। किसान अपने उत्पाद के वाजिब दाम के साथ यह भी चाहता है कि उसकी फसल बर्बाद न हो।