आय से अधिक संपत्ति के मामले में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता को सजा होना न सिर्फ राजनीति के लिहाज से, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार कम करने के प्रयास के रूप में भी एक ऐतिहासिक घटना है। बड़ा सवाल अब अन्नाद्रमुक की रणनीति का है। हालांकि पार्टी ने ओ पन्नीरसेल्वम को नया मुख्यमंत्री चुन लिया है। मगर 2016 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव में नए नेतृत्व के बूते अन्नाद्रमुक फिर से सत्ता में आ जाएगी, यह कहना काफी मुश्किल है। असल में, पार्टी की संरचना ऐसी है, जिसमें जयललिता ने किसी दूसरे नेता को मजबूती से उभरने नहीं दिया। पर्याप्त बहुमत के कारण अन्नाद्रमुक सरकार को अभी खतरा नहीं है, लेकिन वह अगले चुनाव तक सत्ता में बनी रहेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
पिछले 47 वर्षों (1967 के चुनाव) से तमिलनाडु की राजनीति द्रविड़ पार्टियों के प्रभुत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है, पहले संयुक्त द्रविड़ मुनेत्र कषगम, फिर पार्टी में विभाजन होने के बाद बारी-बारी से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के इर्द-गिर्द। तब से कांग्रेस कभी अपने बल पर वहां सत्ता में नहीं लौट पाई और उसका चुनावी प्रदर्शन हमेशा दो प्रमुख द्रविड़ पार्टियों में से किसी एक के साथ गठजोड़ पर निर्भर रहा है। अन्य पार्टियां भी, जिनकी राज्य के कुछ हिस्सों में मामूली उपस्थिति है, इन्हीं दो में से एक के साथ गठजोड़ करती रही हैं। दो कम्युनिस्ट पार्टियां भी बारी-बारी से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के खेमे में शामिल होती रही हैं। भाजपा ने 1998 में अन्नाद्रमुक के साथ गठजोड़ करके राज्य में तीन सीटें जीती थीं। पर उसके बाद 2014 में उसे एक ही सीट मिल पाई। इस जीत की मुख्य बात यह थी कि भाजपा किसी द्रविड़ गठबंधन में शामिल नहीं थी, बल्कि कुछ अन्य छोटी पार्टियों के साथ उसने तीसरे मोर्चे का गठन किया था। जयललिता को मिली सजा ने भाजपा के लिए पैठ बनाने और एक प्रमुख ताकत बनने की संभावना पैदा कर दी है।
मगर यह काफी हद तक इस पर निर्भर करेगा कि तमिलनाडु की जनता पिछले सैंतालीस वर्षों से चल रही राजनीतिक व्यवस्था का अंग बने रहना चाहती है या नहीं। अगर वह इसी राजनीति को बरकरार रखना चाहती है, तो इसका मतलब यह होगा कि 2011 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में शिकस्त के बावजूद भविष्य में द्रमुक के पुनरुद्धार की संभावना है।
द्रमुक पहले ही अलागिरी और स्टालिन के समर्थकों में विभाजित हो चुकी है, लेकिन हाल के सप्ताहों में स्टालिन ने जोर देकर कहा है कि वह मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते। हालांकि ये शुरुआती दिन हैं, इसलिए अभी अन्नाद्रमुक के खत्म हो जाने की भविष्यवाणी करना बुद्धिमानी नहीं होगा। लेकिन जयललिता को मिली सजा का आम जनता पर व्यापक असर पड़ेगा, क्योंकि भारतीय राजनीति में वर्षों से भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। इसलिए खासकर तमिलनाडु के लोग इस फैसले को नजरंदाज नहीं कर पाएंगे। अगर यह कहा जा रहा है कि जयललिता को हुई सजा के बाद तमिलनाडु की राजनीति द्रमुक और अन्नाद्रमुक से आगे जा सकती है, तो इसकी एक वजह यह है कि हाल के वर्षों में दोनों पार्टियों की वैचारिकता में ठहराव आया है। बीसवीं शताब्दी में द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत प्रबल ब्राह्मण विरोधी और अनीश्वरवादी भावनाओं की बुनियाद पर हुई थी। द्रमुक नेता खुद को स्वयंभू अनीश्वरवादी मानते थे।
हालांकि अनीश्वरवाद के प्रति जयललिता की प्रतिबद्धता बहुत पहले खत्म हो चुकी थी, और पिछले काफी समय से वह मंदिर-राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं। इसके विपरीत, करुणानिधि व्यक्तिगत तौर पर अनीश्वरवाद में ही विश्वास करते रहे। हालांकि उनके बेटे अनीश्वरवाद के प्रति इतने अटल नहीं हैं। कुछ सप्ताह पहले स्टालिन ने विनायक चतुर्थी की शुभकामना देते हुए एक ट्वीट किया था, जिस पर भारी विवाद हुआ था। जब विवाद बहुत बढ़ गया, तब स्टालिन ने यह बहाना बनाते हुए पीछा छुड़ाया कि उनके कार्यकर्ताओं ने उनके आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से गलती से ट्वीट कर दिया था। इसके बावजूद विवाद थमा नहीं और यह सवाल उठा था कि भविष्य में द्रमुक की तर्कवादी राजनीति का क्या होगा।
लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में भाजपा की कमोबेश सफलता के पीछे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और व्यक्तिगत छवि का योगदान था। अगर भविष्य में भाजपा को यहां सफलता हासिल करनी है और एक मजबूत राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरना है, तो न सिर्फ खुद मोदी को वहां राजनीतिक अभियानों को दिशा-निर्देश देना होगा, बल्कि श्रीलंका के तमिलों को राजनीतिक शक्ति देने के मामले में श्रीलंका के प्रति आक्रामक रवैया अख्तियार करना होगा। यह बेहद संवेदनशील मामला है और चुनाव अभियानों के दौरान मोदी ने आश्वस्त किया था कि विदेश नीति तय करते हुए राज्यों के नजरिये को भी शामिल किया जाएगा। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने इस मुद्दे पर अभी तक कुछ नहीं कहा है। लेकिन यह उदासीनता उनके लिए वरदान साबित हुई है, क्योंकि अब वह जरूरत के मुताबिक उसी नीति पर चल सकते हैं, जो तमिलनाडु में भाजपा की संभावना को मजबूत करने में सहायक हो।
तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा इसकी संभावना बनी रहती है कि भाजपा के नए सहयोगी या तो द्रमुक से जा मिलें या उनके नेताओं से मेलजोल बढ़ाएं। पीएमके के संस्थापक एस रामादौस अपनी पोती की शादी का निमंत्रण देने हाल ही में द्रमुक के मुखिया करुणानिधि से मिले थे। इससे इन दोनों राजनीतिक पार्टियों के एक साथ होने का संकेत नहीं मिलता, पर इस दिशा में संभावना तो बनती है। जयललिता को सजा मिलने के बाद से भाजपा ने इस मुद्दे पर प्रतिकिया देने में सावधानी बरती है, क्योंकि वह अम्मा के समर्थकों को नाराज नहीं करना चाहती। लेकिन जयललिता के जेल जाने के बाद तमिलनाडु में उसकी एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने की संभावना बन रही है। यानी दशकों तक एक निश्चित ढर्रे पर चलने के बाद तमिलनाडु की राजनीति अब एक नए चरण में प्रवेश करने जा रही है।
(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)